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शनिवार, 18 फ़रवरी 2012

क्या ये ही काफी नहीं?

क्या फर्क पड़ता है ?
गर मेरे चेहरे पर  
तुम्हारा 
नाम नहीं पढता कोई
मेरे दिल में तुम्हारी 
तस्वीर नहीं देखता कोई
मेरे जहन में बसे तुम्हारे 
ख्याल को 
 समझता नहीं कोई
मेरी हर साँस से
जुडी तुम्हारी साँस का
अहसास किसी को नहीं
मेरे,तुम्हारे एक होने को
महसूस करता नहीं कोई
तुम मेरे लिए
मैं तुम्हारे लिए जीता हूँ
क्या ये ही काफी नहीं?
डा.राजेंद्र तेला,निरंतर
शायरी,मोहब्बत,प्यार,
09-02-2012
129-40-02-12

8 टिप्‍पणियां:

  1. जी हाँ काफी ही नहीं दुरस्त है.
    किसी के पढ़ने,देखने,समझने
    और महसूस करने से क्या फर्क
    पड़ता है.

    सुन्दर भावाभिव्यक्ति के लिए आभार.
    मेरे ब्लॉग पर आईएगा.

    उत्तर देंहटाएं
  2. वाह!!वाह!!

    बहुत सुन्दर

    सादर..

    उत्तर देंहटाएं
  3. इतना काफी ही नहीं बहुत ज्यादा है. यदि प्यार करने वालों को आत्मसंतुष्टि मिलती तो इससे सुंदर बात क्या होगी.

    सुंदर प्रस्तुति.
    बधाई.

    उत्तर देंहटाएं
  4. अनुपम भाव संयोजन के साथ बेहतरीन अभिव्‍यक्ति ।

    उत्तर देंहटाएं
  5. 'काफी' में बहुत कुछ कह दिया है आपने..

    उत्तर देंहटाएं
  6. क्या ये ही काफी नहीं?..............yeh line me hi sab aa gaya .sunder abhivyakti do dilo ki .

    उत्तर देंहटाएं
  7. तुम मेरे लिए
    मैं तुम्हारे लिए जीता हूँ
    क्या ये ही काफी नहीं?

    ....इसके अलावा और क्या चाहिए जीने के लिये...

    उत्तर देंहटाएं
  8. ्काफ़ी है जी और क्या चाहिये जीने के लिये

    उत्तर देंहटाएं