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शुक्रवार, 24 फ़रवरी 2012

ना कोई समझा ना ही जाना हमें

ना कोई समझा
ना ही जाना हमें
हँसने की चाह ने
इतना रुलाया हमें
जीना ही भूल गए
हमदर्दी की आस में
दर्द गले लगाते रहे
ना बची कोई चाह
ना किसी से कोई आस
हर शख्श से
खौफ खाने लगे हम 
फिर ज़ख्म खाने से
डरते हैं हम
अब सोच लिया हमने
खामोशी से सहते रहेंगे
नहीं कहेंगे अपने दर्द
अब किसी से
इक दिन दुनिया से
चले जायेंगे 
यूँ ही रोते रोते

© डा.राजेंद्र तेला,निरंतर
11-02-2012
148-59-02-12

2 टिप्‍पणियां:

  1. हँसने की चाह ने..इतना हमें रुलाया है...
    कोई हमदर्द नहीं..दर्द मेरा साया है...

    सुन्दर...

    उत्तर देंहटाएं
  2. समझना, समझाना जीवन की आवश्यकता बन चुका है।

    उत्तर देंहटाएं