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बुधवार, 22 फ़रवरी 2012

क्या ख़ाक बयाँ करूँ


क्या ख़ाक बयाँ करूँ
कैसे बीतता है वक़्त
इंतज़ार में
समझता है वही
जो गुजरा है उस
मुकाम से
की नहीं मोहब्बत
जिसने
कभी लगी नहीं आग
जिसके दिल में
देखे नहीं ख्वाब जिसने
रात में
वो क्या ख़ाक समझेगा
हाल-ऐ-दिल इंतज़ार में

डा.राजेंद्र तेला,निरंतर
10-02-2012
138-49-02-12

4 टिप्‍पणियां:

  1. बड़ा कठिन हो जाता जीवन,
    प्रेम डगर जो राह दिखी गर..

    उत्तर देंहटाएं
  2. सच है..
    पराई पीर कौन जानता है...
    भुक्त भोगी ही समझे...

    सादर..

    उत्तर देंहटाएं
  3. इंतज़ार की दास्ताँ..
    kalamdaan.blogspot.in

    उत्तर देंहटाएं
  4. woh bhi kya log hae jo gujir dete hae Zindagi kisi ki intjar men,
    bhool jate hae Zindagi ka sabab es intjar men

    उत्तर देंहटाएं