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मंगलवार, 21 फ़रवरी 2012

ना रुका हुआ हूँ, ना चल रहा हूँ

ना रुका हुआ हूँ
ना चल रहा हूँ
जीवन के चक्रव्यूह में
फंसा हुआ हूँ
रुक कर विश्राम
करना चाहता हूँ
तो कोई करने नहीं देता
आगे बढ़ने के लिए
धक्का दिया जाता
आगे बढना चाहता
तो पीछे से
खींच लिया जाता
विचित्र झंझावत में
फंसा हुआ हूँ
अपनों के मोह से
बंधा हुआ हूँ
सोचता हूँ सब्र से
काम लूं
चुपचाप सहता रहूँ
जब सब थक कर
बैठ जायेंगे
तब तय
कर लूंगा
आगे जाऊं या रुक कर
विश्राम करूँ
10-02-2012
135-46-02-12  

14 टिप्‍पणियां:

  1. जीवन चलने का नाम ... बहुत सुन्दर भावाभिव्यक्ति ...सादर

    उत्तर देंहटाएं
  2. chalna hai ya rukna hai keval apne man ki aavaj ko sunna chahiye.bahut achcha likha hai,kai baar hum moh maya ki janjeeron me is tarah jakde hote hain ki sangya shoonya ho jaate hai man ki aavaj dab jati hai.

    उत्तर देंहटाएं
  3. जब सब थक कर
    बैठ जायेंगे
    तब तय कर लूंगा
    आगे जाऊं या रुक कर
    विश्राम करूँ

    आप तो बस चलते रहिए ... सुंदर भाव

    उत्तर देंहटाएं
  4. बहुत ही बढि़या ।

    कल 22/02/2012 को आपकी यह पोस्ट नयी पुरानी हलचल पर लिंक की जा रही हैं.आपके सुझावों का स्‍वागत है !
    '' तेरी गाथा तेरा नाम ''

    उत्तर देंहटाएं
  5. सोचता हूँ सब्र से
    काम लूं
    चुपचाप सहता रहूँ
    जब सब थक कर
    बैठ जायेंगे
    तब तय कर लूंगा
    आगे जाऊं या रुक कर
    विश्राम करूँ

    काश तय करना आसान होता…………चलना विवशता है और रुकना मूर्खता …………शायद तभी हम इस उहापोह मे फ़ंसे रहते हैं।

    उत्तर देंहटाएं
  6. वर्तमान स्थिति पर उलाहना देती जिन्दगी..

    उत्तर देंहटाएं
  7. आपका लिखा सुन्दर लगा और यह एक सर्वत्र चलती कश्मकश की तस्वीर है जो हर किसी के मन को छू जाएगी.

    उत्तर देंहटाएं
  8. आगे बढ़ने के लिए
    धक्का दिया जाता
    आगे बढना चाहता
    तो पीछे से
    खींच लिया जाता

    सचमुच.... उत्कृष्ट रचना...
    सादर बधाई...

    उत्तर देंहटाएं
  9. हमारे मोह और जिम्मेदारियां ही वह गुंजलक है जो हमें जकड़े है ....हूबहू सच ! भावपूर्ण रचना

    उत्तर देंहटाएं