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रविवार, 19 फ़रवरी 2012

कोई खुश नहीं किसी से



इस झूठ
प्रपंच की दुनिया में
कोई खुश नहीं किसी से
हर मन में प्रश्न
हर ह्रदय व्यथित
दूसरों के कार्यकलापों से
सुनना नहीं चाहता
सच कहना चाहता
क्या है मन में कह ना पाता
चुप हो जाता
कहीं रुष्ट ना हो जाए
सोच कर प्रपंच करता
कहता वही बात जो
दूसरे के मन को भाये
चेहरे से मुस्काराता
ह्रदय में आग बसाता
घूमता रहता हर चेहरा
चेहरे पर चेहरा चढ़ाए
काट रहा जीवन मन में
असीम पीड़ाएं बसाए
हर मन में प्रश्न
हर ह्रदय व्यथित
इस झूठ प्रपंच की दुनिया में
कोई खुश नहीं किसी से
डा.राजेंद्र तेला,निरंतर
प्रपंच,झूठ,जीवन 
डा.राजेंद्र तेला,निरंतर
09-02-2012
130-41-02-12

4 टिप्‍पणियां:

  1. इस सार्थक पोस्ट के लिए बधाई स्वीकार करें.

    उत्तर देंहटाएं
  2. हम अपने आप से खुश रहें...यही काफी है..

    उत्तर देंहटाएं
  3. सत्य कथन
    बेहतरीन रचना...:-)
    --

    उत्तर देंहटाएं
  4. aisa nahin hai...
    hamari jo man:sthiti hoti hai..
    vaise hi sab lagne lagta hai kabhi kabhi...!!

    उत्तर देंहटाएं