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मंगलवार, 14 फ़रवरी 2012

रिश्तों पर कविता -रिश्तों को पेपर नैपकिन मत समझो

रिश्तों को
पेपर नैपकिन मत
समझो
काम में लिया
कूड़ेदान में फैंक दिया
रिश्तों को
गहने भी मत समझो
शादी समारोह में पहना
लॉकर में बंद कर दिया
आवश्यकता पडी तो
याद कर लिया नहीं तो
दिमाग के कोने में
बंद कर दिया
रिश्तों को जूता भी
मत समझो
कई दिनों तक
गंदा ही पड़े रहने दो
पहनना हो तो
पोलिश लगा कर
चमका दिया
पहनना नहीं हो तो भी
चमका कर रखो
रिश्तों को सेफ्टी पिन
जैसा भी न समझो
वैसे कद्र नहीं करो
कपड़ा फट जाए तो
ढूंढते रहो
रिश्तों को नाखून भी
न समझो
खराब लगने लगें तो
काट कर फैंक दिया
रिश्तों को
कीमती आभूषण समझो
गंदे हो जाए तो साफ़ कर
फ़ौरन पहन लो
रेशम का सुन्दर
रुमाल सा समझो
गन्दा होने लगे
तुरंत साफ़ करो
करीने से
सम्हाल कर रखों
अपने बालों सा रखो
बार बार संवारते रहो
खुद के चेहरा सा
खूबसूरत बना कर रखो
रोज़ साफ़ करो
प्यार की क्रीम
विश्वास का पाऊडर लगाओ
अच्छे व्यवहार से
उसका मेकअप करो ,
उन्हें और सुन्दर बनाओ
रिश्तों को
मोबाइल फ़ोन समझो
प्रेम से चार्ज करते रहो
नहीं करोगे तो डिस्चार्ज हो कर
बंद हो जाएगा

किसी काम का नहीं रहेगा
© डा.राजेंद्र तेला,निरंतर
06-02-2012
111-22-02-12

2 टिप्‍पणियां:

  1. रिश्तों को समझ पाना ,सभी के बस की बात नहीं ..
    सुन्दर सार्थक रचना..
    kalamdaan.blogspot.in

    उत्तर देंहटाएं