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मंगलवार, 14 फ़रवरी 2012

यादें

वही नज़ारा

वही मौसम

वही नदी का किनारा

किनारे पर लगे 

पेड़ों की झुकी डालियाँ

कल कल बहते

पानी को चूम रही है

वो अब साथ नहीं

पर उसकी खुशबू 

हवाओं में बाकी है

मछलियाँ अब भी

पानी से उचक कर

उसके तबस्सुम की

मुन्तजिर हैं

उसके दीदार को

तरसती हैं

डा.राजेंद्र तेला,निरंतर 

05-02-2012

107-17-02-12

दीदार=देखना

मुन्तजिर=उम्मीद में इंतज़ार करना

तबस्सुम – मुस्कुराहट

2 टिप्‍पणियां:

  1. दीदार=देखना
    मुन्तजिर=उम्मीद में इंतज़ार करना
    तबस्सुम – मुस्कुराहट...waah bahut khub likha ............khushbu fijaon me bhi baki hai ....:) nice

    उत्तर देंहटाएं
  2. खूबसूरत यादे ...अब भी साथ हैं ...बहुत खूब

    उत्तर देंहटाएं