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मंगलवार, 7 फ़रवरी 2012

दिल टूट कर कुछ इस तरह बिखर गया

बेरहमी से
दिल से निकाला गया
उसकी मुस्काराहट  से
भरमाता रहा
निरंतर नए ख्वाब
बुनता रहा
हकीकत से बेफिक्र
उसके नशे में मदहोश
जीता रहा
खुद के लिए मौत का
सामान
इकट्ठा करता रहा
होश आया तो अकेले
खडा था
दिल टूट कर कुछ
इस तरह बिखर गया
सिवाय मौत के
कोई चारा भी ना था  
दफनाने  के लिए
कोई कंधा देने वाला भी  
बचा ना था
डा.राजेंद्र तेला,निरंतर 
30-01-2012
88-88-01-12

6 टिप्‍पणियां:

  1. बढ़िया शब्द संयोजन अच्छी रचना है ! आपकी एक रचना पहले भी वटवृक्ष पत्रिका का में
    पढ़ी है ! आभार मेरे ब्लॉग तक आने के लिये !

    उत्तर देंहटाएं
  2. बेहद सुन्दर अभिव्यक्ति! इस उम्दा रचना के लिए बधाई!

    उत्तर देंहटाएं
  3. dard ko shabd de diya .jajbato ko khubsurti se piroya hai .
    waqt kharab nikal jata hai .
    jeevan me intihan bar -bar aata hai .

    उत्तर देंहटाएं
  4. बहूत सुंदर अभिव्यक्ती है ..

    उत्तर देंहटाएं