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शुक्रवार, 20 जनवरी 2012

ना जाने कितने मौसम बदलेंगे





ना जाने
कितने लोगों से
कितनी
मुलाकातें बची है?
न जाने कितने दिन
कितनी रातें बची  हैं?
ना जाने कितना रोना
कितना सहना बचा है?
कब बंद हो जायेंगी आँखें
किस को पता है?
ना जाने कितने मौसम
बदलेंगे
कितने फूल खिलेंगे?
कब उजड़ेगा बागीचा
किस को पता है?
ना जाने कितनी सौगातें
मिलेंगी?
बह्लायेंगी या रुलायेंगी
किस को पता है?
जब तक जी रहा
क्यों फ़िक्र करता निरंतर
ना तो परवाह कर
ना तूँ सोच इतना
जब जो होना है हो
जाएगा
जो मिलना है मिल
जाएगा
तूँ तो हँसते गाते जी
निरंतर
जो भी मिले
उससे गले लग कर
मिल निरंतर
© डा.राजेंद्र तेला,निरंतर
12-01-2012
38-38-01-12

9 टिप्‍पणियां:

  1. कहते है किस्मत का ऊंट कब किस और बैठेगा कुछ पाता नहीं मगर ज़िंदगी ,वक्त ,किस्मत शायद एक ही परिवार का हिस्सा है और जैसा आपने लिखा जीवन उस ही का नाम है ज़िंदगी यूँ हीं चला करती है "निरंतर"...समय मिले कभी तो आयेगा मेरी पोस्ट पर आपका सवागत है http://mhare-anubhav.blogspot.com/

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  2. तूँ तो हँसते गाते जी
    निरंतर
    जो भी मिले
    उससे गले लग कर
    मिल निरंतर....jivan ke prti skaaratmak soch darshati kavita....bdhai sweekaren...

    उत्तर देंहटाएं
  3. आप हमेशा ही बहुत उम्दा लिखते हैं डॉ साहब।
    जो मिलना है मिल जाएगा
    तूँ तो हँसते गाते जी निरंतर
    जो भी मिले
    उससे गले लग कर मिल निरंतर...:)

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  4. fir se apne ek achchhi si kavita likha hai.....nirantarta yoon hi banaye rakhiye...shubhakamnaye

    उत्तर देंहटाएं
  5. हमेशा की तरह ...एक और अच्छी सोच

    उत्तर देंहटाएं
  6. आज में जीना चाहिए ..अच्छी प्रस्तुति

    उत्तर देंहटाएं
  7. हँसते हुए जो मिले उसी को ले लें बस,सुंदर भाव।

    उत्तर देंहटाएं
  8. बहुत सुन्दर..आज कौन खराब करें......कल की सोच कर..
    सार्थक अभिव्यक्ति सर..
    सादर.

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