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गुरुवार, 26 जनवरी 2012

कोई ज्यादा हँसता



कोई ज्यादा हँसता 
तो अजीब सा लगता
जहन में ख्याल आता
वाकई खुश है या
गम पी पी कर के
दिखाने को हंस रहा
या फिर मेरे ग़मों का
मज़ाक बना रहा
मैं भी क्या करूँ
जिधर नज़र उठाता हूँ
कोई खुश नज़र
नहीं आता
हर शख्श ग़मों का
बोझ लेकर जीता
दिखता
निरंतर चेहरे पर
चेहरा लगाए
दिखता
17-01-2012
53-53-01-12

7 टिप्‍पणियां:

  1. वाह.!!
    बहुत खूब लिखा है .
    गणतंत्र दिवस की शुभकामनायें ..जय हिंद !!
    kalamdaan.blogspot.com

    उत्तर देंहटाएं
  2. कुछ खुशियाँ सच्ची भी होती हैं..
    अच्छी रचना..

    उत्तर देंहटाएं
  3. यही तो दुविधा है निरंतर जी
    हम निरंतर इस दुविधा में फंसे रहते हैं.

    उत्तर देंहटाएं
  4. बहुत सुन्दर!
    63वें गणतन्त्रदिवस की शुभकामनाएँ!

    उत्तर देंहटाएं
  5. गहन,सुंदर भावाभिव्यक्ति।

    उत्तर देंहटाएं
  6. पर कभी कभी किसी की हँसी ...रियल भी होती हैं

    उत्तर देंहटाएं