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गुरुवार, 26 जनवरी 2012

वो आज फिर

वो आज फिर नज़रें
झुकाए
मेरे घर के सामने से
निकल गयी
डर रही थी
मेरी नज़रों से उसकी
नज़रें जो मिल गयी
ज़िन्दगी भर के लिए
क़ैद हो जायेगी
शायद उसे
मेरी चाहत का पता
नहीं था
मैं बैठा सोच रहा था
उसकी नज़र गर मेरी
नज़र से मिल गयी
उसकी आँखों का
काजल बन
ज़िन्दगी भर के लिए
उसकी आँखों में बस
जाऊंगा
मझधार में फंसी
किश्ती को किनारे
लगा दूंगा
17-01-2012
51-51-01-12

3 टिप्‍पणियां:

  1. सुन्दर लिखा है ..
    गणतंत्र दिवस की शुभकामनायें ..जय हिंद !!
    kalamdaan.blogspot.com

    उत्तर देंहटाएं
  2. ये आना जाना यूँ ही लगा रहे

    गणतंत्र दिवस की शुभकामनायें....

    उत्तर देंहटाएं
  3. जो सोचते हैं सब,बस वही हो नहीं पाता।

    उत्तर देंहटाएं