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मंगलवार, 24 जनवरी 2012

अब आँखों में आंसू भी नहीं आते


अब आँखों में
आंसू भी नहीं आते
सूख गए रोते रोते
अब दर्द भी नहीं होता
अपनों से ज़ख्मखाते खाते
इतना सह चुके हैं
इतना टूट चुके हैं
अब फर्क नहीं पड़ता
कोई कुछ भी कहे
कोई कुछ भी करे
पहले अपनों के लिए
जीते थे
अब खुद के लिए भी
जी नहीं पाते
किसी तरह खुद को
ज़िंदा रखते हैं
निरंतर कुछ ना कुछ
लिखते रहते हैं
दिल के गुबार निकालते
रहते हैं
कोई समझ ले हमको
उसे ढूंढते रहते हैं
© डा.राजेंद्र तेला,निरंतर
15-01-2012
45-45-01-12

5 टिप्‍पणियां:

  1. आपके इस उत्‍कृष्‍ट लेखन के लिए आभार ।

    उत्तर देंहटाएं
  2. इससे उत्तम तरीका कोई नहीं...
    लेकिन जितना जियें,
    ख़ुशी के साथ जियें....

    उत्तर देंहटाएं
  3. कब तक किसी और के के लिए जियेंगे ..जिनके पास हमारे लिए समय नहीं है ..उन्हें बेवजह दिल में रखने का क्या फायदा..
    kalamdaan.blogspot.com

    उत्तर देंहटाएं
  4. आसान नहीं है ऐसा कोई ढूँढना...
    सुन्दर रचना..

    उत्तर देंहटाएं