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रविवार, 15 जनवरी 2012

मुझे हक तो नहीं फिर भी नाराज़ हूँ


मुझे हक तो नहीं
फिर भी नाराज़ हूँ
तुमसे
रिश्तों की दुहाई दूं
साथ गुजारे वक़्त की
याद दिलाऊँ
वजह कुछ भी हो
तुम जानती हो तुम्हारी
बेरुखी वाजिब नहीं
मेरी वफाई पर कोई
दाग नहीं
तुमने ही उकता कर
किनारा कर लिया
इलज़ाम बेरुखी का
लगा दिया
ये भी ना सोचा
तुम्हारे खातिर ही 
खामोश रहते थे हम
बदनाम ना हो जाओ
मिलने की कोशिश नहीं
करते थे हम
डा.राजेंद्र तेला"निरंतर"
07-01-2012
19-19-01-12

2 टिप्‍पणियां:

  1. तुमने ही उकता कर
    किनारा कर लिया
    इलज़ाम बेरुखी का
    लगा दिया
    ये भी ना सोचा
    तुम्हारे खातिर ही
    खामोश रहते थे हम
    बदनाम ना हो जाओ
    मिलने की कोशिश नहीं
    करते थे हम


    wow....
    khamoshiyan hi bahut kuchh kah jati hain..

    उत्तर देंहटाएं
  2. thanx....
    ki mujhe aapne apne ghar tak pahuncha diya..
    kyun ki itne darvaje hain...mujhe pravesh pana mushkil ho raha tha....
    do ko to dekh rahi hun..baki fir sahi...lekin aapki rachnaaon ko 'nirantar' padhti rahti hun....!!
    ek baar fir se shukriya Dr.Saheb..!!!

    उत्तर देंहटाएं