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गुरुवार, 12 जनवरी 2012

समाधान

वर्षों से 
 शमशान में खडा
बरगद का विशालकाय पेड़
आज कुछ व्यथित था
मन में उठ रहे 
प्रश्नों से त्रस्त था
विचार पीछा ही नहीं
छोड़ रहे थे
क्रमबद्ध तरीके से
चले आ रहे थे
क्यों उसका जन्म
शमशान में हुआ?
यहाँ आने वाला
हर व्यक्ति केवल जीवन
म्रत्यु और वैराग्य की
 बात ही करता
कोई खुशी से
उसके पास नहीं आता
उसकी छाया में
कोई सोना नहीं चाहता
ना ही आवश्यकता से
अधिक रुकना चाहता
उसे निरंतर मनुष्यों का
क्रंदन ही सुनना पड़ता
रात में मरघट की शांती
उसे झंझोड़ती रहती
नहीं चाहते हुए भी
राख के ढेर में कुत्तों को
मानव अवशेष ढूंढते
देखना पड़ता
क्यों उसे जीने के लिए
शमशान ही मिला ?
क्या वो भी मनुष्यों जैसे
पिछले जन्म के
अपराधों की सज़ा काट रहा?
क्यों उसके भाग्य में एकाकी
नीरस जीवन जीना लिखा है ?
निरंतर उदास चेहरों को देखना
उनकी दुःख भरी बातों को
हर दिन रोने बिलखने की
आवाज़ सुनना ही
उसके जीवन का सत्य है
तभी उसे नीचे बैठे वृद्ध
साधू की आवाज़ सुनायी दी
वो किसी को कह रहा था
परमात्मा ने जो भी दिया
जैसा भी दिया
जितना भी दिया
उसे शिरोधार्य करना चाहिए
निरंतर संतुष्ट रहने का
प्रयास करना चाहिए
जब तक जीना है
खुशी से परमात्मा की
इच्छा समझ जीना चाहिए
व्यर्थ ही दुखी होने से
जीवन सुखद नहीं होता
उलटे अवसाद को
निमंत्रण मिलता
जीवन
कंटकाकीर्ण हो जाता
बरगद को उसके प्रश्न का
उत्तर मिल गया
उसकी व्यथा का
समाधान हो गया
© डा.राजेंद्र तेला,निरंतर
                           05-01-2012
                             14-14-01-12

3 टिप्‍पणियां:

  1. wah! sir bargad ke madhyam se zindagi me kush aur santusht rehne ki samjhaish bade acche dhang se di hai aapne.....

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  2. बहुत ही गहन रचना,काश!इंसान भी बरगद के पेड़ की भाँति सीख ले पाता...

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