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सोमवार, 9 जनवरी 2012

आवाज़ देता हूँ

आवाज़ देता  हूँ
दिल से बुलाता हूँ
तुम आती नहीं हो
या तो पहुँचती नहीं
मेरी आवाज़ तुम तक
या मजबूर हो
ज़माने से डरती हो
घबराती हो
कहीं टूट ना जाए
दिल का रिश्ता हमारा
खामोशी से सहती हो
दिन रात तड़पती हो
खुद आकर ले जाऊं
निरंतर 
इस इंतज़ार में
बैठी हो
02-01-2012
07-07-01-12

3 टिप्‍पणियां:

  1. दिल की आवाज़ ....जाने अनजाने कोई तो सुन कर समझ ही लेगा

    उत्तर देंहटाएं
  2. बहुत सटीक लिखा है आपने!
    आपकी इस प्रविष्टी की चर्चा कल मंगलवार के चर्चा मंच पर भी होगी!
    सूचनार्थ!

    उत्तर देंहटाएं