ADVERTISEMENT

Bookmark and Share

Register To Recieve Latest Poems On Your Email or Mobile

Enter your email address:

Click Here To Subscribe On Mobile Bookmark and Share

शुक्रवार, 6 जनवरी 2012

इसे मेरी चाहत कहूँ


इसे मेरी चाहत कहूँ
किसी रिश्ते का नाम दूं
या फिर मेरी फितरत कहूं
कुछ तो हैं जो मुझे
दूर नहीं होने देता उनसे
रह रह कर याद आते
जब भी मिलते हँस कर
मिलते
दिल को गुदगुदाते
कुछ वक़्त के लिए गुम
हो जाते
खिले फूल को मुरझाते
उनका अंदाज़ निरंतर
हैरान करता
ना जाने  ऐसा क्यूं करते ?
दूर रहकर भी पास लगते
दिल के किसी कौने में
छुपे रहते
इसे मेरी चाहत कहूँ
किसी रिश्ते का नाम दूँ
या फिर मेरी फितरत कहूँ
02-01-2012
02-02-01-12

2 टिप्‍पणियां:

  1. नमस्कार राजेंद्र जी
    वाह क्या खूब लिखा ..........
    दिल के एक कोने में फूल सदैव महकते है
    वह पास हो या न हो
    दिल में सदा रहते है ......! बहुत खूब प्यारा सा अंदाज ......:)

    उत्तर देंहटाएं
  2. चाहत को किसी रिश्ते में बाँधना ज़रूरी तो नहीं,चाहत किसी रिश्ते से कम तो नहीं...
    बहुत ही प्यारी सुंदर रचना।

    उत्तर देंहटाएं