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गुरुवार, 5 जनवरी 2012

मन के उद्यान में

मन के उद्यान में 
स्नेह,प्रेम से वंचित
भावनाओं के वृक्ष
 अनमने भाव से
निस्तेज खड़े हुए
ना कुम्हलाये
ना मुरझाये
ना ही सूखे
स्नेह के फल ,
प्रेम के फूलों की
चाहत में
फिर भी जीवित
आशा में
आकुलता से देख रहे
प्रतीक्षारत हैं
उसके लिए
जो अथक प्रयास के
बाद भी
उन्हें कभी मिला नहीं
 आशा उनकी
अभी भी जीवित
निरंतर व्याकुल
प्रेम भरे दो शब्द
सुनने के लिए
घ्रणा और स्वार्थ के
बादल छंट जाएँ
भावनाओं के आकाश में
प्रेम,स्नेह सम्मान की
किरणें प्रकट हो
मन के उद्यान को
फिर बहारों से
सुसज्जित करे
अपनों से रिश्तों पर
आस्था,विश्वास को
बनाए रखें

© डा.राजेंद्र तेला,निरंतर
29-12-2011
1899-67-12

11 टिप्‍पणियां:

  1. शुक्रवार भी आइये, रविकर चर्चाकार |

    सुन्दर प्रस्तुति पाइए, बार-बार आभार ||

    charchamanch.blogspot.com

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  2. आपको एवं आपके परिवार के सभी सदस्य को नये साल की ढेर सारी शुभकामनायें !

    उत्तर देंहटाएं
  3. बहुत ही खूबसूरत आशा के बीज न मुरझाते .न कुम्हलाते ..
    जरा सी प्यार की हवा से पुनः खिल जाते
    मन में फिर आशा के दीप जलाते ..........ह्रदय से बधाई
    कविता मन में समायी ..फिर खिली धुप आई .........:):):):)

    उत्तर देंहटाएं
  4. बहुत प्यारी रचना...
    बधाई.
    शुभकामनाएँ.

    उत्तर देंहटाएं
  5. गहन लेखनी,आशा-स्नेह से भरी सुंदर प्रस्तति।

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  6. कोमल अभिव्यक्ति सुन्दर रचना

    उत्तर देंहटाएं
  7. अपनो से रिश्तों पर,आस्था,विश्वास बनाएं रखें—सही कहा,प्रेम टिका ही है,आस्था और विश्वास पर.

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