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रविवार, 1 जनवरी 2012

ग़मों का सैलाब भरा है दिल में



दिल में
ग़मों का सैलाब भरा है 
बाहर निकलने से
रोके कोई
गर बाहर निकल गया
चूर चूर हो कर
फिर सिमट ना पाऊंगा 
ऐसा बिखर जाऊंगा
कोई मिल जाए
मेरे दर्द को समझ ले 
टूटने से पहले बचा ले
मुझ को
फिर से हँसना सिखा दे
खिजा को बहार में
बदल दे
निरंतर नए लोगों से
मिलता हूँ
कोई अपना सा
मिल जाए
तलाश में भटकता हूँ
डा.राजेंद्र तेला"निरंतर"
26-12-2011
1890-58-12

3 टिप्‍पणियां:

  1. आप तथा आपके परिवार के लिए नववर्ष की हार्दिक मंगल कामनाएं
    आपके इस सुन्दर प्रविष्टि की चर्चा कल दिनांक 02-01-2012 को सोमवारीय चर्चा मंच पर भी होगी। सूचनार्थ

    उत्तर देंहटाएं
  2. सुन्दर प्रस्तुति .नव वर्ष मुबारक .साल की हर सुबह शाम मुबारक .

    उत्तर देंहटाएं
  3. "gam ki syahi se gila kar ke likha hai shayad...
    tbhi to har lafj me gam ko uker dala hai.."
    ..atyant sundar rachna..nav varsh ki haardik badhai..aap hi ke raasto par chal rahe is nausikhiye ko margdarshan dene kabhi kabhar mere yahan bhi aate rahen...

    उत्तर देंहटाएं