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गुरुवार, 5 जनवरी 2012

क्षणिकाएं -12


मैं हारा


मैं हारा
तो क्यों हारा
दूसरा जीता
तो क्यों जीता

*
माँ

माँ
की नहीं मानते 
माँ के लाल 
माँ फिर भी 
उनके लिए बेहाल

मन-दिल

मन बूढा नहीं
होता
सोच हो जाता है
दिल बूढा नहीं
होता
इकरार का तरीका
बदल जाता है

*
मन मिलना

या तो वो थोड़े
बड़े होते
या मैं थोड़ा
छोटा होता
फिर भी क्या पता ?
मन मिलते या
ना मिलते

*
मुश्किल

कहना भी मुश्किल
चुप रहना भी
मुश्किल
सहना भी मुश्किल
जीना भी मुश्किल

*
मुलाक़ात

उनसे
मुलाक़ात तो हुयी
मगर
बात नहीं हुयी
नींद ज़रूर
हराम हो गयी
बैठे ठाले जान की
आफत हो गयी

*
"मैं "

दबी हुयी कुंठा की
अभिव्यक्ती

*
मन की पीड़ा

बहुतों को चाहता हूँ
कहते हुए डरता हूँ

*
सलाह

सलाह देने का
शौक सबको
लेना पसंद नहीं
किसीको

*
जब सहना ही है

जब सहना ही है
तो रोना क्यों?
31-12-2011
1901-69-12

4 टिप्‍पणियां:

  1. वाह राजेंद्र जी..
    सभी क्षणिकाएं लाजवाब...
    बहुत खूब.

    उत्तर देंहटाएं
  2. शब्‍द कम मगर बातें बड़ी.....खूब है क्षणि‍काएं

    उत्तर देंहटाएं
  3. sundar kshanikayein !! Padh kar acchha laga .Dhanyawaad .

    उत्तर देंहटाएं