Register To Recieve Latest Poems On Your Email or Mobile

Enter your email address:

Click Here To Subscribe On Mobile Bookmark and Share

सोमवार, 31 दिसंबर 2012

दुनिया से जाने के बाद भी



दुनिया से 
जाने के बाद भी 
मेरे चाहने 
न चाहने वालों से 
मिलूंगा ज़रूर
चाहे ख़्वाबों में मिलूँ 
ख्यालों में आऊँ 
जो भी कहता हूँ 
जो भी लिखता हूँ 
याद दिलाऊंगा ज़रूर 
भले ही बुझ जाए 
मेरी ज़िन्दगी के 
चिराग की रोशनी 
पर मेरे ख्यालों की 
रोशनी ज़हन में 
ज़लाऊंगा ज़रूर 
मेरे ख्याल ही कहते हैं 
मुझसे 
आज मेरी बात मानों 
न मानों 
चाहे आज पढो ना पढो 
पर बात कहूंगा ज़रूर 
चाहे मेरे जाने के बाद 
ही सही 
एक दिन सोचने पर 
मजबूर करूंगा ज़रूर

© डा.राजेंद्र तेला,निरंतर
871-55-28-11-2012
विचार,ख्याल, सोच

क्या होता है सत्य ,किसी कहते हैं ईमान



आज तक
समझ नहीं सका
क्या होता है सत्य
किसी कहते हैं ईमान
कैसा होता है इश्वर
कैसी होती है आस्था
बहुत पूछा बहुत खोजा
एक ही
उत्तर मिला मुझको
सब के अपने मायने
सब के अपने पैमाने
जैसा सिखाया समझाया
उनके बड़ों ने उनको
जो पढ़ा ग्रंथों में उन्होंने
वही बन गए
पैमाने मायने उनके
जो एक के लिए ठीक
वही दूसरे के लिए गलत
कहलाने लगे
© डा.राजेंद्र तेला,निरंतर
870-54-28-11-2012
सत्य,ईमान,आस्था,इश्वर,

रविवार, 30 दिसंबर 2012

आराम से सोये तो तीन आ जाएँ ,कसमसाकर सोना हो तो चार



आजादी से आज तक 
===========
आराम से सोये
तो तीन आ जाएँ
कसमसाकर सोना हो तो चार
ठूंस ठांस कर सोना हो तो पांच
पर गरीब की झोंपड़ी थी
आजादी से आज तक
उतनी ही है
चार पांच हाड मांस के पुतले
उसमें ज़िंदा रहते
कोई रात भर खांसता,
कोई जुखाम में नाक
सुड़कता रहता
बाकी बचे लोग ना रुकने वाली
आवाजों के कारण जागते रहते
सवेरे अधसोए अधजगे उठते
पेट भरने के लिए
काम पर निकल पड़ते
रात को थक चूर कर
पहले से अधिक कमज़ोर लौटते
इसी झोंपड़ी में एक से दो हुए
फिर दो से तीन,चार,पांच हुए
कुछ साल में
कभी एक कम हो जाता
तो कभी एक नया जुड़ जाता
झोंपड़ी में
आजादी के बाद बिजली का
एक मरियल सा लट्टू
अवश्य लटक गया
जिसने रात के अँधेरे को तो
कम कर दिया
पर ज़िन्दगी के अँधेरे को
कम ना कर सका
ज़िन्दगी आजादी के पहले भी
लडखडाती थी
लूले लंगड़े प्रजातंत्र में
आज भी लडखडा रही है
देश में और कुछ
बदला ना बदला हो
गरीब की झोंपड़ी नहीं बदली
ऐतहासिक धरोहर सी
अब भी आजादी से पहले की
याद दिलाती है

© डा.राजेंद्र तेला,निरंतर 
869-53-28-11-2012
व्यंग्य,आज़ादी ,आजादी,देश,गरीबी,भुखमरी,प्रजातंत्र


शनिवार, 29 दिसंबर 2012

अब अपनी ही परछाई से घबराने लगा हूँ (व्यंग्य)



(एक चुके हुए भ्रष्ट नेता और सरकारी अफसर की मन की व्यथा पर -व्यंग्य )
अब अपनी ही
परछाई से
 घबराने लगा हूँ
कहीं मेरा सच ना बता दे
डरने लगा हूँ
जब तक था बाहों में दम
जेब में अथाह धन
साथ में पद का ऊंचा कद
हर काम करता था
सच को गलत कहता था
अब बुढा गया हूँ
पद से हट गया हूँ
ना सत्ता में मेरा कोई बचा
ना ही मैं सत्ता में रहा
कभी ख्याल भी नहीं आया
अहम् की उड़ान भरता रहा
सत्य ईमान को बकवास
समझता रहा
परमात्मा को धोखा देता रहा
अब हर पल परमात्मा
याद आने लगा है
कर्मों की सज़ा के डर से
दम निकलने लगा है
कैसे छुपा रह जाए मेरा सच
इस कोशिश में
मस्तिष्क उलझा रहता है
अब अपनी ही
परछाई से घबराने लगा हूँ
कहीं मेरा सच ना बता दे
डरने लगा हूँ
868-52-28-11-2012
भ्रष्ट,भ्रष्टाचार ,

इच्छाओं,आकांशाओं के समुद्र से निकल जाऊं



इच्छाओं और 
यथार्थ के बीच के सभी 
पुल ढहते जा रहे हैं
जैसे किसी फलदार
पेड़ से कच्चे फल
बिन पके ही 
गिरते जा रहे हैं
आकांशाओं के
आसमान धूल धूसरित
होते जा रहे हैं
अब सोचने लगा हूँ
इच्छाओं आकांशाओं के
समुद्र से निकल जाऊं
यथार्थ के रेगिस्तान में
ही चैन ढूंढ लूं
स्वयं को परमात्मा के 
हाथों में सौंप दूं
कर्म में विश्वास रखूँ
डा.राजेंद्र तेला,निरंतर

867-51-28-11-2012
आकांशाओं,इच्छाओं,यथार्थ,कर्म

मंजिल न पा सका



घर तो मिल गया
मगर घर का
दरवाज़ा नहीं मिला
उम्मीद में घर के
बाहर ही
वक़्त काटता रहा
आवाज़ तो सुन ली
मगर घूंघट से ढका
चेहरा नहीं दिखा
मंजिल के
पास हो कर भी
मंजिल न पा सका
866-50-28-11-2012
शायरी,उम्मीद, मंजिल

शुक्रवार, 28 दिसंबर 2012

आकाश को नापने की चाह लिए



आकाश को नापने की
चाह लिए चिड़िया 
निरंतर
आकाश में उडती रही
भूल गयी
कितना भी उड़ लो
आकाश की 
थाह नहीं मिलती
मन की सारी इच्छाएं
पूरी नहीं होती
थक हार कर भूखी प्यासी
असंतुष्ट ही काल के
गाल में समा गयी
© डा.राजेंद्र तेला,निरंतर
865-49-28-11-2012
इच्छाएं, संतुष्ट,संतुष्टी

जात पांत धर्म की राजनीति में देश कुरुक्षेत्र बन गया



जात पांत धर्म की
राजनीति में
देश कुरुक्षेत्र बन गया
प्यार भाईचारा
रक्त रंजित हो गया
हर दिन इतिहास
खून से लिखा जा रहा
भाई भाई की जान ले रहा
अपना पराया हो गया
दिलों में अन्धकार
घर कर गया
कब जलेगा प्यार
भाईचारे का दीपक
कब बुझेगी दिलों में
नफरत की आग
कब इंसानियत
बन जायेगी जात
धर्म बनेगा प्यार
कब कुरुक्षेत्र  में
रक्तपात ख़त्म होगा
इंतज़ार में हर
समझदार इश्वर से
प्रार्थना कर रहा
© डा.राजेंद्र तेला,निरंतर
864-48-23-11-2012
जात,पांत, धर्म ,राजनीति,देश

उचित -अनुचित



जीवन भर
सब को बताता रहा
क्या उचित
क्या अनुचित है 
उम्र के
सांय काल में आ कर
मंथन किया
तो पता चला जो भी
 जैसा भी सोचा था
अब तक
ना सब उचित था
ना अनुचित था
समय ने सिखाया मुझको
अनुभवानुसार
सोच और मान्यताएं
बदलती रहती
अब निर्णय कर लिया
मैं जो सोचता हूँ
वही उचित,अनुचित है
मानना छोड़ दूंगा
उचित अनुचित का
निर्णय करने से पहले
दूसरों के विचारों को भी
महत्त्व दूंगा
विषय पर विवेक से
गूढ़ मंथन करूंगा
उसके बाद ही अपना
निश्चित मत प्रकट
करूंगा
863-47-23-11-2012
उचित,अनुचित,जीवन,ज़िन्दगी,सोच,मान्यताएं ,अनुभव,

गुरुवार, 27 दिसंबर 2012

मैंने तो चाहा था सवेरा बन कर ही जीऊँ




मैंने तो चाहा था
सवेरा बन कर ही जीऊँ
शाम कभी देखू ही नहीं
सपना तो पूरा नहीं हुआ
इतना अवश्य समझ गया
शाम देखे बिना सवेरे का 
महत्व नहीं समझ पाता
जीवन का हर पहलु 
जान नहीं पाता
जीवन के हर रूप को
दिखाने के पीछे
इश्वर के मंतव्य को 
कभी समझ नहीं पाता 
© डा.राजेंद्र तेला,निरंतर
862-46-23-11-2012
जीवन,ज़िन्दगी,सवेरा,शाम,इश्वर,मंतव्य

बुधवार, 26 दिसंबर 2012

कैसी ये दुनिया,कैसे ये लोग



कैसी ये दुनिया
कैसे ये लोग
कभी नाराज़ हो जाते हैं
उन बातों पर
जिन पर नाराज़ नहीं
होना चाहिए
कभी नाराज़ नहीं होते हैं
उन बातों पर जिन पर
नाराज़ होना चाहिए
अव्वल तो नाराज़
होना ही नहीं चाहिए
फिर भी
होना हो तो हो जाएँ
उन बातों पर जिन पर
नाराज़ होना चाहिए
पर रिश्ते तो नहीं बिगाडें
मगर अफ़सोस
लोग रिश्ते बिगाड़ लेते हैं
उन बातों पर
जिन पर नाराज़ भी
नहीं होना चाहिए
862-46-23-11-2012
दुनिया,लोग,नाराजगी,नाराज

जब बीमार की सांस रुकने लगी



जब बीमार की सांस
रुकने लगी
दिल की धड़कन बंद
होने लगी
पास बैठे अपने पराये
बीमार की चिंता छोड़ कर
खुद की चिंता करने लगे
कभी उनके साथ भी
ऐसा ही होगा
सोच कर घबराने लगे
परमात्मा से
लम्बे जीवन की 
प्रार्थना करने लगे
अपने दुष्कर्मों की क्षमा
मांगने लगे
अगले दिन बीमार ने
संसार छोड़ दिया
परमात्मा ने
क्षमा कर दिया होगा
सोच कर लोगों ने
चिंता करना छोड़ दिया
फिर से वही करने लगे
जिसके लिए
कल क्षमा मांग रहे थे
© डा.राजेंद्र तेला,निरंतर
861-45-23-11-2012
जीवन,ज़िन्दगी,मौत,चिंता,प्रार्थना,परमात्मा

मंगलवार, 25 दिसंबर 2012

मैं नहीं कहता मेरा सोच ही सही है



मैं नहीं कहता
मेरा सोच ही सही है
दूसरे भी वैसे ही सोचें
जैसे मैं सोचता हूँ
ऊन्हें भी हक है
अपने तरीके से सोचने का
फिर भी
अगर मेरा सोच सही है
तो लोग मेरी बात को
समझेंगे
मेरे तरीके से सोचेंगे
कोई एक भी
मेरे जैसे ही सोचने लगेगा
तो साथ में जुड़ जाएगा
कारवाँ बनने लगेगा
मैं रहूँ ना रहूँ
साथ जुड़ने वाला कोई तो
मेरे सोच को आगे ले
जाएगा
दुनिया को बता देगा
मेरा सोच सही था
कोई साथ नहीं जुड़ेगा
तो किसी को दोष नहीं दूंगा
समझूंगा
मैं भीड़ से अलग था
डा.राजेंद्र तेला,निरंतर
860-44-23-11-2012
सोच

सोमवार, 24 दिसंबर 2012

परेशान मन



परेशान मन से
सोने का प्रयत्न करता रहा
करवटें बदलता रहा
मगर नींद नहीं आयी
मन टटोला तो आभास हुआ
आज कुछ लिखा नहीं
इसलिए मन परेशान है
तुरंत उठ कर
कलम हाथ में ले ली
कविता लिखने का
प्रयास करता रहा
मगर शब्दों ने साथ
नहीं दिया
फिर भी कुछ लिखना
तो था ही
तुरंत लिख दिया
जब मन परेशान होता है
तो ना नींद आती है
ना चैन मिलता है
मन को
खुश रखने के लिए
मन का
कहा करना होता है
लिखते ही
मन प्रसन्न हो गया
मैं भी नींद की गोद में
समा  गया
859-43-23-11-2012
मन,नींद,परेशान,चैन

क्यूं दिल की परवाह करूँ



क्यूं दिल की
परवाह करूँ
दिल तो
बना ही टूटने के लिए
कभी अपनों से
कभी परायों से
कोई तोड़े नहीं तो
कभी खुद अपने हाथों से
खुद ही मार लेगा
कुल्हाड़ी अपने पैरों पर
लग जाएगा
किसी के दिल से
858-42-23-11-2012
दिल

रात आँख लगी ही थी




रात आँख लगी ही थी
टिटहरी की आवाज़ ने
जगा दिया
खिड़की में टिटहरी को
बैठे देख रात में टिटहराने का
कारण पूछ लिया
टिटहरी ने खिड़की
खुली रखने का धन्यवाद दिया
साथियों से बिछड़ गयी हूँ
नीड का रास्ता भूल गयी हूँ
कमरे की खिड़की खुली न होती,
तो रात भर भटकती रहती
उसकी बात ने मुझे झंझोड़ दिया
मैं सोचने लगा क्यों इंसान
बड़े उपकार तक भूल जाता है
© डा.राजेंद्र तेला,निरंतर 

857-41-23-11-2012
उपकार,धन्यवाद,स्वार्थ

रविवार, 23 दिसंबर 2012

ताने बाने



इच्छाओं के ,
रिश्तों के ,
मजबूरियों के
कुंठाओं के
जीवन के चारों ओर
बन जाते हैं ताने बाने
कसा रहता है,
फंसा रहता  है
मकड़ जाल सा
उलझा रहता है
इंसान
इन तानों बानों में
एक हटाता
दो बन जाते
दो हटाता
चार बन जाते
जीवन भर
हटा ना पाता
घुटता रहता है
पिसता रहता है
रोता रहता है
फिर भी
चलता रहता है
जीता रहता है
मुक्त होता है
मौत के साथ इंसान
इन तानों बानों से
तब तक 
मकड़ जाल सा
उलझा रहता है
इंसान
इन तानों बानों में
856-40-23-11-2012
जीवन,ज़िन्दगी,ताने बाने

अधिक पाने की इच्छा में



सूरज को देखता हूँ
तो मन करता है
उसके जैसे ही चमकने लगूं
दुनिया को चकाचौंध कर दूं
सोचते सोचते रुक जाता हूँ
खुद से कहने लगता हूँ
सूरज सी गर्मी नहीं
चाहता हूँ
जो जीवों को झुलसा दे
पेड़ों को सुखा दे
बिन पानी
जीवन को दूभर बना दे
परमात्मा
मुझे चाँद ही बना दे
कम रोशनी से ही
संतुष्ट हो लूंगा
चाहे अमावस को छुप जाऊं
मगर पूनम को तो
चमकूंगा
मंद रोशनी से
दुनिया को भर दूंगा
दिलों में
ठंडक पैदा कर दूंगा
कम में संतुष्ट हो
जाऊंगा
पर अधिक पाने की
इच्छा में
दूसरों को तो नहीं
झुलसाऊंगा
855-39-23-11-2012
इच्छाएं,इच्छा,संतोष,संतुष्टी,संतुष्ट

दूर आकाश से आवाज़ बुलाने लगी है



दूर आकाश से
आवाज़ बुलाने लगी है
दीपक की लौ भी कम
होने लगी है
हल्की सी हवा में भी
लहराने लगी है
दीपक में तेल कम हो गया
बाती भी छोटी हो गयी
जीवन की शाम आ गयी
काली रात भी आयेगी
जीवन की लौ को
बुझायेगी
एक दिन आकाश में
गुम हो जायेगी
फिर कहीं नया दीपक
जलेगा
उसका भी तेल ऐसे ही
कम होगा
समय के साथ
समाप्त होगा
दूर आकाश से
आवाज़ बुलाने लगी है
दीपक की लौ भी कम
होने लगी है
854-38-23-11-2012
जीवन,बुढापा,उम्र ,ज़िन्दगी

शनिवार, 22 दिसंबर 2012

अनबूझा संसार



निस्तब्ध हूँ
निश्चल हूँ
कोई पीड़ा नहीं
कोई वेदना नहीं
ना खुश हूँ
ना दुखी हूँ
भावना रहित हूँ
कोई दोस्त नहीं
कोई दुश्मन नहीं
कोई अपना नहीं
कोई पराया नहीं
कोई सोच नहीं
कोई इच्छा नहीं
कष्टों से मुक्त हूँ
धरती से दूर
एक अनबूझे
संसार में हूँ
मैं मृत हूँ
853-37-21-11-2012
जीवन ,ज़िन्दगी , अनबूझा संसार,मृत्यु,मृत,मौत