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शनिवार, 31 दिसंबर 2011

व्यथित मन से मित्रों को पत्र


व्यथित मन से मित्रों को पत्र
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जन्म के साथ ही
आजादी के नाम से
मेरा परिचय हुआ
गाँधी,सुभाष,भगत सिंह
चन्द्र शेखर और देश के लिए
लड़ने वालों को जाना
संस्कारों ,मर्यादाओं
का पालन होते देखा
निस्वार्थ
सार्वजनिक जीवन जीते
नेताओं को देखा
आजादी मिली
हर देशवासी के मन में
उमंग और खुशी थी
अपने देश में
अपनों पर
अपनों का राज देखना
बाकी था
अब तक जो देखा था
उससे पूर्ण
आशा और विश्वास था
अब गरीब गरीब नहीं रहेगा
देश का धन देश में रहेगा
हर देशवासी का जीवन
सुखद होगा
प्यार भाईचारे का वर्चस्व
होगा
आज जन्म के ७० वर्ष बाद
मुझे लगता है
बचपन में जो देखा था
जो सोचा था
वैसा कुछ भी नहीं है
क्या सब भ्रम था ?
क्या अपनों से प्रेम की
आशा करना गलत था ?
क्या अपनों का
अपनों पर राज़ करना
एक दुस्वप्न था ?
अपनों के बीच
खुल कर रो भी नहीं सकता
क्या क्या केवल मैं घुटता हूँ ?
क्या केवल मैं व्यथित हूँ ?
इस प्रश्न का उत्तर खोज
रहा हूँ
मेरे मित्रों से
आग्रह पूर्वक निवेदन करता हूँ
मेरे प्रश्न का उत्तर दें
अगर सहमत हैं ,
तो मुझे बताएं
व्यथा को कम करने के लिए
व्यवस्था को बदलने के लिए
वे क्या कर रहे हैं ?

© डा.राजेंद्र तेला,निरंतर
 आज़ादी ,आजादी
26-12-2011
1890-58-12

मेरी मेहमान खाने की अलमारी में

मेरी मेहमान खाने की
अलमारी में
कई किताबें करीने से
सजी हैं
कुछ तन्मयता से 
पढी गयी
जान पहचान वालों के बीच
उनकी चर्चा की गयी
कुछ के कुछ प्रष्ठ ही  
कई ऐसी भी हैं
जिन्हें खोल कर 
देखा भी नहीं
कुछ सालों से
कुछ महीनों से 
अलमारी की
शोभा बढ़ा रही हैं
हर आने वाले को
खामोशी से मेरे
साहित्य प्रेमी  होने का
सबूत देती हैं
जिन्हें खोल कर भी 
नहीं देखा
वो किताबें
मन में व्यथित भी 
होती होंगी
सोचती होंगी
जितने मन से लेखक ने
उनका सृजन किया
उतने ही मन से
क्यों मैंने उन्हें अलमारी में
धूल खाने को सजाया
मेरे कई चेहरों में से एक
साहित्य प्रेमी होने का
चढ़ाया
जिन्हें मन से पढ़ा
वो खुश होती होंगी
मेरी बढ़ाई करती होंगी
मेरे साहित्य प्रेमी होने का
साक्ष्य देती होंगी
मेरी पढने की इच्छा ,
अनिच्छा
किताबों में द्वेष पैदा 
करती होगी
मुझे इन सब बातों से
कोई मतलब नहीं
निरंतर
नयी किताबें लिखी 
जायेंगी
जो प्रसिद्द होंगी
चाहे पढूं नहीं
पर दिखाने के लिए 
खरीदी जायेंगी
एक अलमारी भर जायेगी
दूसरी में सजा दी
जायेगी
डा.राजेंद्र तेला"निरंतर", 
26-12-2011
1889-57-12

शुक्रवार, 30 दिसंबर 2011

हमें फिर से हँसना सिखा दो

क्या हुआ गर
ज़ख्म कहीं और खाए
शिकार किसी और की
रुसवाई का हुए
हम बीमार-ऐ-इश्क हैं
तुम्हें दिल का
चारागर समझते
बड़ी उम्मीद से
वास्ते इलाज आये हैं
थोड़ा सा
अहसान हम पर कर दो
हमदर्दी का मरहम
लगा दो
दर्द-ऐ-दिल सुन लो
जो हुआ उसे भूलना
सिखा दो
मोहब्बत पर यकीं
फिर से
कायम करवा दो
हमें फिर से हँसना
सिखा दो
(चारागर =चिकत्सक,डाक्टर)
25-12-2011
1888-56-12

उनकी याद ही काफी है अब रुलाने के लिए

अब उनका 

ज़िक्र ही काफी है 

दिल जलाने के लिए 

उनकी याद ही काफी है 

रुलाने के लिए 

उनकी बेवफाई देख ली 

हँसते हँसते जान 

लेने की अदा देख ली 

वादों की कुर्बानी देख ली   

दोजख का अहसास 

कर लिया ज़मीं पर 

अब देखने के लिए

कुछ बाकी नहीं है

डा.राजेंद्र तेला,निरंतर 

24-12-2011

1887-55-12

शायरी,

गुरुवार, 29 दिसंबर 2011

हमारी खता की सज़ा उन्हें कैसे दें ?


हमारी खता की सज़ा उन्हें कैसे दें ?
========
हमारी हसरतों का 
कातिल उन्हें कैसे कहें ?
हमारी खता की 
सज़ा उन्हें कैसे दें ?
गर्दिश-ए-हालात की 
ज़िम्मेदारी उनकी नहीं
उनकी बेरुखी भी
उनकी नहीं
कुछ किस्मत ही
हमारी ऐसी थी
हम ही ना रख सके
उन्हें सम्हाल कर
अरमानों की कश्ती को 
साहिल तक न पहुंचा सके
उनके मुस्काराने को
मोहब्बत समझा था
हमने
वादों को हकीकत
माना था  हमने 
उन्हें गुनाहगार 
कैसे कहें 
डा.राजेंद्र तेला,निरंतर 
शायरी,नज़्म 
24-12-2011
1886-54-12

हाल-ऐ-दिल क्यूं बताएं?

किस्मत के हादसे 
कैसे सुनाएं ?
किस किस ने मारी ठोकरें 
कैसे बताएं?
मोहब्बत के गीत बहुत
 गाये थे
अब मातमी धुन  कैसे
 बजायें ?
दिल में उठते हैं  यादों के तूफां
किश्ती को किनारे  कैसे
लगायें?
हसरतों की कब्र निरंतर
खुदती रही
उन्हें  दफ़न होने से कैसे
बचाएं ?
तकदीर ही कुछ ऐसी थी
अब अश्क क्यूं  बहायें ?
अब खामोशी में ही सुकून है
हाल-ऐ-दिल क्यूं बताएं?
24-12-2011
1885-53-12

बुधवार, 28 दिसंबर 2011

बूँद बूँद से घडा जो भरना है


देश में
नया प्रधानमंत्री बने
या कहीं पर आग लगे
कहीं बम विस्फोट हो
किसी को खेलों में तमगा
मिला हो
कहीं तूफ़ान आये या कोई
घोटाला करे
उसे मतलब नहीं किसी
बात से
मतलब हो भी तो
चेहरे से नहीं झलकता
मन के विचार किसी को
नहीं बताता
अखबार वामपंथी हो या
दक्षिणपंथी 
किसी भी विचारधारा का हो
कोई भी मालिक हो
उसे केवल अखबार बेचने से
मतलब
ग्राहक बढाने से मतलब
अखबार की एक प्रति  पर
दस पैसे
कमीशन जो मिलता है
उसी से उसका घर चलता है
हर मौसम में
सुबह चार बजे उठ कर
घर घर जाकर अखबार बांटने
निकल पड़ता
शहर में बंद हो या जलसा
त्योंहार
दीपावली का हो या ईद का
खुद बीमार हो या घर में
कोई बीमार हो
उसे तो अपना पेट पालना है
कोई पढ़े या ना पढ़े
 हिन्दू का
 घर हो या मुसलमान का
ख़बरों को पढ़ कर कोई 
कुढ़े या खुश हो
उसे कोई मतलब नहीं
कोई उसे होली दीपावली
इनाम के तौर पर
पांच पैसे भी नहीं देता
कभी देर हो जाए तो
उल्हाना अवश्य मिलता
उसे तो सिर्फ अखबार
बांटना है
बूँद बूँद से घडा जो
भरना है
23-12-2011
1883-51-12

हर तूफ़ान के बाद चलती हैं अमन की हवाएं

हर तूफ़ान के बाद
चलती हैं
अमन की हवाएं
काली रात के बाद
जगमाती हैं
सूरज की किरनें
ज़मीं को नहलाती हैं
सुनहरी धूप
रंजो गम की दुनिया से
निकल जाओ
ज़ज्बे को टूटने ना दो
सब्र से
 वक़्त गुजरने दो
फिर से हँसने का
इंतज़ार करो
निरंतर
खुदा से दुआ करो
वो दिन भी आयेगा
जब चेहरा फिर से
मुस्कराएगा
दिल-ओ-दिमाग का
सुकून लौट जाएगा
डा.राजेंद्र तेला,निरंतर
23-12-2011
1882-50-12

उनको शिकायत है


यूँ मिले की
मुलाक़ात ना हो सकी
नज़रों से नज़रें मिली
होंठ भी काँपे
मगर बात ना हो सकी
दिल की दिल में
रह गयी
किश्ती किनारे से
दूर रह गयी
आँखें
 रोते रोते थक गयी
फिर भी
उनको शिकायत है
हमने
कोशिश नहीं करी
22-12-2011
1880-48-12
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मंगलवार, 27 दिसंबर 2011

अति से विनाश


घर के बागीचे  में
गुलमोहर का पेड़ लगाया
दिल से 
उसकी रखवाली करी
निरंतर पानी से सींचा
भर भर कर उसमें
खाद डाली
मन में खूब आशाएं 
पाली
कभी लह्केगा ,
लाल पीले फूलों से
बागीचे में रौनक 
फैलाएगा
पक्षियों को लुभाएगा
पक्षी उस पर बसेरा
बनायेंगे
चहचाहट  से
नीरस वातावरण को
मुखरित करेंगे
बामुश्किल पेड़ थोड़ा
बड़ा हुआ
अचानक एक दिन
मुरझाने लगा
अंत में सूख गया
आशा निराशा में
बदल गयी
बहुत सोचा पर
कारण नहीं समझ
पाया
जब तक किसी ने उसे
नहीं बताया
आवश्यकता से अधिक
पानी और खाद ने उसे
समय से पहले ही मुरझाया
अति से विनाश भी
हो सकता है
उसे पता चल गया 

21-12-2011
1879-47-12

शानदार तमाचा मिलेगा (हास्य कविता )


दुबले पतले हँसमुखजी
कई बीमारियों से ग्रसित थे
फिर भी कुछ ना कुछ
खाने के लिए मचलते रहते
भारी भरकम पत्नी से बोले
मुझे खाने को आइसक्रीम दे दो
पत्नी बोली
आपका गला खराब है
कुछ और खालो 
हँसमुखजी मन मसोस कर बोले
कुछ मीठा ही दे दो
पत्नी गुर्राई
ड़ाईबीटीस के मरीज हो
कुछ तो ख्याल करो
चिढ़ते हुए हँसमुखजी बोले
तो फिर नमकीन ही दे दो
बीबी झल्लाई ,
नमक ब्लड प्रेशर के लिए
ठीक नहीं होता
परेशान हँसमुखजी तंग आ गये
गुस्से में बोले
 तो फिर अंडा ही दे दो
पत्नी पलट कर
ज्यादा गुस्से में बोली
 संभव नहीं है
आज पूर्णमासी है
अंडा नहीं खाओगे
हैरान परेशान हँसमुखजी
जोर से चिल्लाये
हर बात में अपनी चलाती हो
पानी तो पिलाओगी
बीबी भी फुफकारी
चुप भी रहोगे या
कुछ ना कुछ मांगते रहोगे
इतना दिमाग तो खा लिया
 अब कुछ नहीं मिलेगा
अब और कुछ माँगा तो 
तो शानदार तमाचा
मिलेगा
पांच सात दिन खाने का
मन भी नहीं करेगा
अब जाओ
चुपचाप गम खाओ
चद्दर ओढ़ कर सो जाओ
रूआसे हँसमुखजी के पास
सिवाय
गम खाने और सोने के
कोई चारा नहीं था
23-12-2011
1884-52-12