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शनिवार, 24 दिसंबर 2011

आज याद आयी तो आँखों में आंसूं आ गए

आँखों में आंसूं
आ गए
कभी मुस्काराते
रहते थे
अब खामोश हो गए
वो साथ
निभाते निभाते
चले गए
हम होश खोते रहे
शक में बैठे रहे
उन्हें बदनाम करते रहे
खुद के हाथों से
खुद को
जिबह करते रहे
निरंतर
ग़मों को न्योता
देते रहे
20-12-2011
1875-43-12

मनों में बैर था


मनों में बैर था
एक दूजे को देखना भी
सुहाता ना था
एक दूर खडा
किसी से बात कर
रहा था
दूसरे की तरफ देख कर
मुस्कारा देता
दूसरे ने समझा
उसी की बात कर रहा है
हंसी उड़ा रहा है
मन के बैर ने 
दिल में शक पैदा
कर दिया
क्या बुराई कर रहा ?
जानने को बेचैन
होने लगा
क्रोध में आग बबूला
होने लगा
लड़ने के लिए
पहले की तरफ बढ़ चला
लड़ाई का सिलसिला
निरंतर जीवन भर
चलता रहा
जीना हराम हो गया
दोनों में से कोई 
फिर कभी खुशी से
जी ना सका
20-12-2011
1874-42-12

शुक्रवार, 23 दिसंबर 2011

हँसमुखजी की बन्दर से नौक झोंक (हास्य कविता)


हँसमुखजी को
मूंगफली और अमरुद बहुत
पसंद थे
सर्दी के दिन थे
अमरुद ,मूंगफली खाने
धूप सेकने बालकनी में
बैठे ही थे 
सामने पेड़ पर बैठे बन्दर ने
देख लिया
उसका भी मन
अमरुद ,मूंगफली खाने के लिए
मचलने लगा
फ़ौरन उछल कर बालकनी में
आ धमका
हँसमुखजी से अमरुद मूंगफली
मांगने लगा
हँसमुखजी ने उसे दुत्कार कर
भगा दिया
बन्दर को क्रोध आया 
मौक़ा ताड़ कर
मूंगफली की थैली लेकर
भाग कर पेड़ पर चढ़ कर
हँसमुखजी को
किलकारियों से चिढाने लगा
हँसमुखजी से
बन्दर का दुस्साहस बर्दाश्त
नहीं हुआ
गुस्से में ,मारने के लिए
अमरुद उठा कर बन्दर पर
फैंक दिया
बन्दर ने अमरुद कैच कर लिया
फिर हँसते हुए कहने लगा
हँसमुखजी
अमरुद तो पहले भी ले
सकता था ,
पर एक हाथ में अमरुद
दूसरे में मूंगफली की थैली लेकर
पेड़ पर नहीं चढ़ सकता था
मुझे पता है
आप को छेड़ने से
आप पूरी तरह छिढ़ जाओगे
बिना सोचे समझे अमरुद भी
फैंक दोगे
अब मैं अमरुद मूंगफली
खाऊंगा
आप को चिढाऊंगा
आप देखते रहना
आइन्दा से
अकेले मज़े मत उड़ाया करो
मिल बाँट कर खाया करो
20-12-2011
1873-41-12

हँसने की आदत थी हमारी


हँसने  की
आदत थी हमारी
अब मुस्कारने में भी
दिक्कत होती है
रोने की फितरत
नहीं थी हमारी
अब बहुत ज़ल्द आँखें
नम होती हैं
अलमस्त घूमते थे कभी
अब घर से
बाहर निकलने की
इच्छा भी नहीं करती
ऐसा नहीं
कमज़ोर हैं हम
क्या करें
उस दौर की यादें तंग
करती हैं
हँसते चेहरे पर
मायूसी लाती हैं
डा.राजेंद्र तेला,निरंतर
20-12-2011
1872-40-12

गुरुवार, 22 दिसंबर 2011

चलो अच्छा हुआ ,कल होता आज हो गया (हास्य कविता)


हँसमुखजी का
तकिया कलाम था
चलो अच्छा हुआ ,
कल होता आज हो गया
हर बात में
चलो अच्छा हुआ ,
कल होता आज हो गया
कहना उन्हें कई बार
आफत में डालता
दोस्त से चार दिन तक
नहीं मिलने का कारण पूछा
दोस्त बोला पत्नी को
बिच्छू ने काट लिया था
हँसमुखजी बोले
चलो अच्छा हुआ ,
कल होता आज हो गया
दोस्त को बुरा लगा
दोस्त
फिर पांच दिनों बाद मिला
उन्होंने फिर कारण पूछा
दोस्त बोला बच्चे का
एक्सीडेंट हो गया था
हँसमुखजी बोले ,
चलो अच्छा हुआ ,
कल होता आज हो गया
दोस्त को क्रोध आया
पर चुप रहा
अगली बार दोस्त
पंद्रह दिन बाद मिला
उन्होंने फिर कारण पूछा
दोस्त ने जवाब दिया
पिताजी गुजर गए थे
हँसमुखजी बोले
चलो अच्छा हुआ ,
कल होता आज हो गया
इस बार दोस्त
बर्दाश्त नहीं कर सका
क्रोध में
हँसमुखजी के गाल पर
चमाट जमा दिया
हँसमुखजी
बिलबिलाते हुए बोले
थप्पड़ क्यों मारा ?
दोस्त बोला
चलो अच्छा हुआ ,
कल होता आज हो गया
अब हँसमुखजी ने पुराना
तकिया कलाम छोड़ दिया
नया शुरू कर दिया
आज कल
हर बात पर कहते हैं
जो हुआ बहुत बुरा हुआ
पूरी उम्मीद है
इसका भी नतीजा उन्हें
एक दिन भुगतना पडेगा
जब होना होगा हो
जाएगा
19-12-2011
1871-39-12

हाथ की लकीरें

दिहाड़ी मज़दूर की कहानी
==============
सुबह नींद खुलती हैं
रोज़ की तरह
आशाओं से भरी दृष्टि
हथेलियों पर पड़ती
हाथों की लकीरों
वैसी की वैसी दिखती
हथेली अधिक खुरदरी
चमड़ी कल से अधिक
मोटी लगती
समझ गया आज भी
कुछ नया नहीं होगा
निरंतर सोचता था
क्यों परमात्मा ने
हाथों में लकीरें बनायी ?
क्यों उन्हें भाग्य से जोड़ दिया
जब लकीरें नहीं बदलती
तो किस्मत कैसे बदलेगी
कितनी भी मेहनत
मजदूरी कर लो
हालत वैसी ही रहेगी
हो सकता है
परमात्मा ने आशा
बनाए रखने के लिए
हाथों में लकीरें बनायी होगी
चलो कम से कम
निराशा तो कम होती है
लकीरें कभी तो बदलेगी
सोचते सोचते उठ कर
रोज़ की तरह मजदूरी
पर निकल पडा
डा.राजेंद्र तेला,निरंतर
19-12-2011
1871-39-12

मज़दूर,गरीब,जीवन,ज़िंदगी, 

बुधवार, 21 दिसंबर 2011

क्षणिकाएं -11


अच्छा- बुरा
मैं किसी के लिए
बुरा
कोई मेरे लिए
अच्छा
फिर शिकायत
किस बात की
*
आडम्बर
खुद के आडम्बर का
पता नहीं चलता
दूसरों का बुरा लगता
*
जब मन रोता
जब मन रोता
आँसूं भी नहीं निकलते
अन्दर ही अन्दर
मनुष्य को खोखला
कर देते
कितना धन आवश्यक
खुदा
बहुत बड़ा अहसान
करता
अगर पैदा होते ही
बता देता
कितना धन आवश्यक
होगा
*

कल की चिंता
कल की चिंता में
घुलते हैं
आज बर्बाद करते हैं
*
हमदर्दी
लोग
हमदर्दी में भी
कंजूसी करते
हमदर्दी की उम्मीद
करते
*
राजनीति के राज़
राजनीति
के राज़
आम आदमी से
छुपे रहते
जिनके नाम पर
नेता
राजनीति करते
*
करूणा
करूणा का
करुण सत्य
कई बार दिखाने के
लिए की जाती
*
जिन्हें जानते नहीं
जिन्हें जानते नहीं
उन्हें जानने की इच्छा
रखते हैं
जानने के बाद
याद रखें या भूल जाएँ
सोचते रहते हैं
*
खुद जीते तो
खुद जीते तो
काबलियत
दूसरा जीते तो
किस्मत
*
गम-खुशी
उनका गम मेरी खुशी
मेरा गम उनकी खुशी
*
सुना था
परमात्मा
सर्वत्र होता
ढूंढा मंदिर
मस्जिद में जाता
*
आशीर्वाद
मुँह मुंबई की तरफ
जाना दिल्ली चाहते
काम दानवों का करते
आशीर्वाद भगवान्
का चाहते
*
गाली
का जवाब
गाली से दिया
उसमें
तुम में क्या फर्क
रहा
19-12-2011
1870-38-12

मंगलवार, 20 दिसंबर 2011

कल तक खूब चहकते थे


कल तक
खूब चहकते थे
खूब बहकते थे
दिलों में
आग लगाते थे
हुस्न के
गरूर में बेहोश थे 
महफ़िल-ऐ-जान
होते थे
उम्र ने नहीं बख्शा
अपना जलवा दिखा
दिया
उन्हें हकीकत से
रूबरू करा दिया
चेहरे का नूर कम
हो गया
आज एक सूरत भी
मयस्सर नहीं
उन्हें देखने के लिए
एक कंधा भी नहीं
रोने के लिए
झूंठी दिलासा ही 
देने के लिए
18-12-2011
1869-37-12

चेहरा दिखाकर छुप जाते हैं लोग


चेहरा दिखाकर छुप जाते हैं लोग
जब भी चाहते भूल जाते हैं लोग

दिल लगाने को बातें करते हैं लोग
हँसा हँसा कर फिर रुलाते हैं लोग

ना जाने कौन सा बदला लेते हैं लोग
हसीं ख्वाब दिखा कर तोड़ते हैं लोग

 यादों  के लम्हे छोड़ जाते हैं लोग
निरंतर इंतज़ार में तडपाते हैं लोग

ग़मों का बोझ छोड़ जाते हैं लोग 
जिला जिला कर मारते हैं लोग
18-12-2011
1868-36-12

सोमवार, 19 दिसंबर 2011

हँसमुख जी का फैसला (हास्य कविता)


मोहल्ले में रामू श्यामू को
को लड़ते देख
हँसमुखजी से रहा ना गया
फ़ौरन बीच
बचाव करने के लिए
पहुँच गए
झगडे का कारण पूछने लगे
रामू बोला
श्यामू ने मुझे नेता कहा
श्यामू बोला
हँसमुखजी रामू ने
पैसे उधार लेकर लौटाए नहीं
कहता है जब होंगे तो दे दूंगा ,
अपने वादे से मुकर गया
आप ही फैसला करो
अगर इसे नेता कहा
तो क्या गुनाह किया
हँसमुखजी ने सोचा फिर बोले
क्योंकी रामू
धूर्त.मक्कार भ्रष्ट और दोहरे
चरित्र का नहीं है 
इसलिए इसे नेता कहना
उचित नहीं है
तुमसे पैसे उधार लिए
इमानदारी से मान रहा है
अभी होंगे नहीं
इसलिए लौटा नहीं
पा रहा है
16-12-2011
1867-35-12

अंजाम क्या होगा ?


दिल को लाख
मगर रुका नहीं
मनाया तो माना नहीं
उनको देखते ही
मचलने लगा
उसे मंजिल का पता
चल गया
सपनों की दुनिया में
खो गया
दिल बेचारा गुलाम
हो चुका था
मोहब्बत के जाल में
फंस चुका था
अंजाम क्या होगा ?
सिर्फ खुदा को पता था
उसे तो निरंतर
रातों को जागना था
इंतज़ार में जीना था
16-12-2011
1866-34-12

रविवार, 18 दिसंबर 2011

अपराध बोध (काव्यात्मक लघु कथा)


घंटों से स्कूल के बाहर लगे
नीम के पेड़ के नीचे
व्याकुल चेहरे पर खुशी झलकती
निरंतर आतुरता कम होती
पांच छ वर्ष का बालक दरवाज़े से
बाहर आता
दौड़ कर उसके पास जाता
वो स्नेह से सर पर हाथ फिराता
कभी खाने के लिए चाकलेट
कभी खेलने के लिए खिलोना देता
कभी पढने के लिए पसंद की
कॉमिक देता
ज्यादा बात नहीं करता
परमात्मा तुम्हें लम्बी उम्र दे
कह कर चला जाता
बालक वृद्ध की बातों और व्यवहार को
समझ नहीं पाता
पर वो भी उसे चाहने लगा 
रोज़ उससे मिलने का इंतज़ार करता 
बरसों स्नेह का आदान प्रदान चलता रहा
वो अधिक बूढा और बालक बड़ा हो गया
चलना फिरना भी दूभर हो गया
बीमार रहने लगा
पर छुट्टी के समय किसी तरह स्कूल
अवश्य पहुंचता
एक दिन वो भी बंद हो गया
तीन चार दिन गुजर गए
उसका नहीं आना बालक को
व्यथित करने लगा
किसी तरह पता मालूम कर
उसके घर पहुँच गया
देखा तो वृद्ध बिस्तर पर बीमारी से
झूझ रहा था
बगल में हूबहू बालक से मिलती जुलती
माला से सुसज्जित तस्वीर लगी थी
उसे समझ नहीं आया
कुछ पूछता उससे पहले ही
वृद्ध ने आँखें खोली
बालक को सामने देखते ही चेहरे पर
खुशी दिखाई देने लगी
इशारे से उसे पास बुलाया ,
स्नेह से हाथ सर पर रखा
दो आंसू ढलकाए
आँखें बंद हो गयी,गर्दन लुडक गयी
हाथ नीचे गिर गया
उसके प्राण निकल चुके थे
बालक कुछ देर रुका
फिर आंसू बहाते हुए चला गया
उसने खाना पीना छोड़ दिया
गुमसुम रहने लगा
फिर बीमार पड गया
माता पिता को कारण समझ नहीं आया
कुछ दिन बाद कारण जानने के लिए
किसी तरह दोनों वृद्ध के घर पहुंचे
वृद्ध की विधवा से पता चला
कुछ वर्ष पहले वृद्ध की गाडी से
दुर्घटना में एक बालक की
जान चली गयी थी
तब से उसका पती
निरंतर अपराध बोध में जीता रहा
खुद को उसकी मौत का
जिम्मेदार मानने लगा
एक दिन स्कूल से निकलते हुए
आपके पुत्र को देखा तो दंग रह गया
उसकी सूरत हूबहू दुर्घटना में
मृत बालक से मिलती थी
तब से बिना नागा उससे
मिलने जाने लगा
किसी तरह मृत बालक की तस्वीर
प्राप्त कर घर में लगाई
हर दिन उसकी पूजा करता
जिस दिन बालक उसे नहीं मिलता
घंटों तस्वीर के पास गुमसुम बैठ जाता
आंसू बहाता रहता
परमात्मा से माफी माँगता
आपके पुत्र के लम्बे जीवन
के लिए प्रार्थना करता
अदालत ने तो उसे माफ़ कर दिया था
लेकिन खुद को कभी माफ़ नहीं कर सका
सोचता था आपके पुत्र को प्यार देने से
मृत बालक की आत्मा को शांती मिलेगी
आपके पुत्र पर स्नेह की वर्षा करता रहा
माता पिता की आँखों से आंसूं बह निकले
कैसे पुत्र को सब बताएँगे ?
कैसे वृद्ध के स्नेह की पूर्ती करेंगे ?
सोचते सोचते भारी ह्रदय के साथ 
बिना कुछ कहे उठे 
और घर की ओर प्रस्थान 
कर दिया
15-12-2011
1864-32-12