Register To Recieve Latest Poems On Your Email or Mobile

Enter your email address:

Click Here To Subscribe On Mobile Bookmark and Share

शनिवार, 17 दिसंबर 2011

ना कब्र खुदी ना कफ़न में लपेटा गया


ना खून  निकला
ना जान निकली
ना कब्र खुदी
ना कफ़न में लपेटा
गया
फिर भी जीते जी
मर गया
मोहब्बत में धोखा
खाया
ग़मों के बोझ तले
दब गया
ना काम का रहा
ना काज का  रहा
गुमसुम ज़िन्दगी
काटता रहा
डा.राजेंद्र तेला"निरंतर",
15-12-2011
1863-31-12
डा.राजेंद्र तेला"निरंतर

जब देख ही लिया,ज़रा सा मिल भी लो


जब देख ही लिया
ज़रा सा मिल भी लो
चंद बातें हम से भी कर लो
आँखों को दी राहत तुमने
थोड़ी सी दिल को भी दे दो
वक़्त मुश्किल से गुजरता
सारा जहां दोजख सा लगता
थोड़ा सा वक़्त ज़न्नत में 
गुजारने दो
एक अहसान और कर दो
चंद यादें ऐसी भी दे दो
जिनके सहारे ज़िन्दगी
सुकून से काट लें
15-12-2011
1862-30-12

शुक्रवार, 16 दिसंबर 2011

ना जाने ऐसा ये क्यों हो रहा है?


ये ज़मीं रो रही है 
ये आसमां रो रहा है
इंसान से इंसान
नफरत कर रहा है
माँ बाप से बच्चों का
मोह भंग हो रहा है
ये दिल रो रहा है
ये मन रो रहा है
ना जाने ऐसा
ये क्यों हो रहा है?
भाई बहन में प्यार
ख़त्म हो रहा है
रिश्तों में खटास
पैदा हो रहा है
ये ज़मीं रो रही है
ये आसमां रो रहा है
ना जाने ऐसा
ये क्यों हो रहा है?
प्यार भाईचारे का
नामोंनिशाँ ख़त्म
हो रहा है
अपनों का अपना
,पराया समझ रहा है
दोस्त की पीठ में
दोस्त छुरा भौंक रहा है
बड़े छोटे में फर्क कम
हो रहा है
हर शख्श अपने लिए
जी रहा है 
ये दिल रो रहा है
ये मन रो रहा है
ना जाने ऐसा
ये क्यों हो रहा है?
दिलों में निरंतर रंज
घर कर रहा है
हर शख्श 
चेहरे पर चेहरा 
लगा कर घूम रहा है
दुनिया को दिखाने को
हंस रहा है
पल पल मर रहा है
जीने का नाटक
कर रहा है
ये ज़मीं रो रही है
ये आसमां रो रहा है
ये दिल रो रहा है
ये मन रो रहा है
ना जाने ऐसा
ये क्यों हो रहा है?
ना जाने ऐसा
ये क्या हो रहा है ?
14-12-2011
1861-29-12

तेरी बराबरी कैसे करूँ?


निरंतर सोचता हूँ
दर्द-ऐ-दिल
दुनिया को सुनाऊँ
बीते लम्हों  का
अफ़साना बताऊँ
जुबां खोलते हुए
डरता हूँ
ज़िक्र तेरा भी करना
होगा
तेरी बेवफाई का
आलम बताना पडेगा
तुझे बदनाम होना
पडेगा
उसे कैसे छुपाऊँ?
अधूरी हसरतों से
नकाब कैसे हटाऊँ?
बेफफायी का बदला
बेवफाई से क्यों दूं  ?
दिल से चाहा है तुझे
तेरी बराबरी कैसे करूँ?
इस लिए खामोश
रहता हूँ
चुपचाप सहता हूँ
14-12-2011
1860-28-12

गुरुवार, 15 दिसंबर 2011

कल फिर से हँसेंगे हम

रास्ते सभी बंद हो गए
तो क्या
हमारा ज़ज्बा हमारे साथ है
लोग बेदिल हो गए
तो क्या
हमारा दिल हमारे साथ है
उठा दिया लोगों ने महफ़िल से 
तो क्या 
नयी महफ़िल बनायेंगे हम
छोड़ गए अपने साथ हमारा
तो क्या
परायों को अपना बनायेंगे हम
आज अश्क बह रहे आँखों से
तो क्या
कल फिर से हँसेंगे हम
हिम्मत से लड़ते रहेंगे
मोहब्बत से जीना ना
छोड़ेंगे हम
13-12-2011
1859-27-12

ज़िन्दगी करवटों में गुजरती रही


सर्दी गर्मी बरसात
फुटपाथ पर रहता था
बचपन से बुढापा
फुटपाथ पर ही कटा था
रात को
सोने की कोशिश करता
कोई ना कोई सोने
नहीं देता
कभी गाडी का तेज़ हौर्न
कभी शराबियों की
गाली की आवाज़
कभी कुत्तों के
भोंकने की आवाज़
नींद को दूर भगाती
कभी पड़ोस के मकानों में से
किसी एक की खिड़की खुलती
आवाज़ आती ,
सर्दी में कहीं मर ना जाए
बरसात में भीग कर बीमार
ना हो जाए
खिड़की जितनी देर से
खुलती
उतनी ज़ल्दी बंद हो जाती
उसे सोने नहीं देती
कभी एक पोटली की
जायदाद कोई ले ना जाए
इस चिंता में उड़ जाती
कोई एक रात
बिना शोर के आती
तो शोर की आदत भी
सोने नहीं देती
निरंतर नींद से
आँख मिचोली चलती
रहती
रात गुज़रती भी नहीं
सुबह हो जाती
बरसों हो गए
नींद के इंतज़ार में उम्र
गुजर गयी
नींद रूठी की रूठी ही रही
ज़िन्दगी करवटों में
गुजरती रही
शायद नींद को भी
फुटपाथ पर
सोने की मजबूरी कभी
समझ नहीं आयी
लगता है
उसे भी नर्म बिस्तर की
आदत पड़ गयी
डा.राजेंद्र तेला,निरंतर  
13-12-2011
1858-26-12

बुधवार, 14 दिसंबर 2011

हँसमुखजी बोले नेताओं से अच्छा हूँ (हास्य कविता)


हँसमुखजी
अनशन पर बैठे
तीन घंटे में पेट के चूहे
उछल कूद मचाने लगे
हँसमुखजी उनसे बोले
दो दिन तो सब्र करो
मेरी तरह अनशन करो
पेट के चूहे बोले
पहले खूब खाते हो
आदत बिगाड़ते हो
फिर भूखे मारते हो
हँसमुखजी बोले
नेताओं से अच्छा हूँ
लुभावनी बातों से
तुम्हारा  पेट नहीं
भरता हूँ
मेहनत करता हूँ
खुद खाता हूँ
तुम्हें भी खिलाता हूँ
खुल कर डकार लेता हूँ
नेता बिना काम करे
निरंतर हज़ारों का
अकेले ही खाते हैं
जनता के खाने पर
डाका डालते हैं
फिर भी डकार नहीं
लेते हैं
13-12-2011
1858-26-12

ना ज़मीं तेरी ना आस्मां तेरा ,तूं इक मुसाफिर यहाँ

ना ज़मीं तेरी
ना आस्मां तेरा
तूं इक मुसाफिर यहाँ
फिर क्यूं करता है
तेरा मेरा
देखता है सपने हज़ार 
निरंतर 
रखता है इच्छाएं अपार
पालता है  बैर मन में
जताता है प्यार
जीवन भरजोड़ तोड़ में 
लगा रहता है 
 करता नहीं आराम
छोड़ जाता हैं 
यहाँ का यहीं पर
फिर क्यों नहीं करता है
ध्यान 
गर इसी में डूबा रहा
तेरे जाने के बाद 
लेगा नहीं नाम तेरा कोई 
करना है तो कुछ ऐसा कर
तूं काम इंसान के आये 
जोड़ना है तो 
जोड़ लोगों का प्यार
तेरे जाने के बाद भी
लोग करें तुझ को याद  
ना ज़मीं तेरी
ना आस्मां तेरा
तूं इक मुसाफिर यहाँ
डा.राजेंद्र तेला,निरंतर 
13-12-2011
1857-26-12

मंगलवार, 13 दिसंबर 2011

दहशत ने शक दिल में बसा दिया


मैंने समझा
तुम भी ग़मज़दा हो
मेरी तरह
तुम्हें भी कोई साथ
चाहिए
अंदाज़ मेरा गलत
निकला
तुम ग़मज़दा भी हो
खौफज़दा भी हो
लगता है
खूब भुगता है तुमने
लोगों की फितरत  को  
नतीजतन दोस्ती की
इल्तजा को ठुकरा दिया
बेदिलों  की भीड़ में
मुझे भी
शामिल कर दिया
बेगुनाह को गुनाहगार
करार दे दिया
दहशत ने शक 
दिल में बसा दिया 
12-12-2011
1856-24-12

किस किस से दिल लगाऊँ ?


हर शहर में दीवाने मेरे
किस शहर में घर
बसाऊँ ?
बहुत चाहने वाले मेरे
किस किस से दिल
लगाऊँ ?
इसी कशमकश में उम्र
गुजर गयी
ज़िन्दगी वीरान ही
रही
दिल की प्यास अधूरी 
रह गयी
12-12-2011
1855-23-12

अपनों का खार सहता रहा


अपनों का
खार सहता रहा
दूसरों पर
मोहब्बत लुटाता रहा
अश्कों को हंसी से
छुपाता रहा
दिल में रोता रहा
सुकून की तलाश में
निरंतर भटकता रहा
ना वफ़ा मिली
ना सुकून मिला
उम्मीद में
वक़्त गुजारता रहा
ना शिकवा
ना शिकायत किसी से
जो लिखा था किस्मत में
भुगतता रहा
ग़मों से
दोस्ती निभाता रहा
,तन्हाई में जीता रहा 
12-12-2011
1854-22-12

सोमवार, 12 दिसंबर 2011

बड़ी शिद्दत से दर्द-ऐ-दिल सुनते हैं लोग


बड़ी शिद्दत से
दर्द-ऐ-दिल सुनते हैं
लोग
दिलासा भी देते हैं
लोग
हाथ पकड़ते हैं
पर थाम कर रखते
नहीं लोग
निरंतर रिश्ते बनाते हैं 
फिर भूल जाते हैं लोग
ना जाने क्यूं साथ
निभाते नहीं लोग
या तो हम से ही 
कुछ खता होती होगी 
या फिर ज़माने का
दस्तूर 
निभाते होंगे लोग
डा.राजेंद्र तेला,निरंतर 
11-12-2011
1852-20-12

रविवार, 11 दिसंबर 2011

गुजरे वक़्त का जब भी ख्याल आये

वक़्त का जब भी
ख्याल आये
उजड़े चमन में बहार
आये
सूखे लबों पे मुस्कान
छाये
यादों में खो जाऊं
दर्द सारे भूल जाऊं
हसरतों की दुनिया में
लौट जाऊं
ज़िंदा रहने की 
ख्वाइश करने लगूं
10-12-2011
1851-19-12