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शनिवार, 10 दिसंबर 2011

शुक्रिया आपका


एक नया
अहसास दिया आपने
जहन से पर्दा उठाया 
ज़िन्दगी जीने का
मकसद समझाया
आपने
फिर से हँसने का
रास्ता दिखाया
ग़मों में डूबे रहने का
सबब बताया
आपने
गिर कर उठने का
तरीका सिखाया
आपने
शुक्रिया आपका
सूखे लबों को फिर से
थिरकाया आपने
निरंतर रोते हुए को
हँसाया आपने 
09-12-2011
1848-16-12

शुक्रवार, 9 दिसंबर 2011

क्षणिकाएं -10


सोलहवां साल
सोलहवां साल का
अल्हड़पन
दिल-ओ-दिमाग में
चढ़ता
सोलहवां साल भी
ख़त्म होगा
सोलहवें साल में
याद नहीं रहता

सूने नयनों से
सूने नयनों से
आंसूं मोती बन कर
बहते
मन की पीड़ा
दर्शाते

सपना
सपना तो भ्रम
होता
विचारों में पलता
बंद आँखों से भी
दिखता है
एक पूरा होता
दूसरा दिखता

सुनना
सब
सुनाना चाहते
सुनना
कोई ना चाहता

सज़ा- पूजा
दुष्कर्म करो
फिर पूजा करो
सज़ा से बचो

समय
हर काम के लिए
फिर भी समय नहीं
परमात्मा के लिए
समय
नहीं शरीर के लिए
क्योंकी ?
समय नहीं

सच्ची सहेलियां
दिल की धड़कन
शरीर की सांसें
साथ घटती,बढ़ती

सवाल - जवाब
सवाल
सब के साथ
इमानदारी
क्या हर समय
संभव है ?
इमानदार जवाब
संभव नहीं है

सत्य -असत्य
खुद के बारे में कहा
कटु सत्य हो
या असत्य हो
दोनों शूल से चुभते
गहराई तक घाव
करते

प्रेमियों के दिल
प्रेमियों के
दिल शीशे के होते हैं
ज़रा सी
ठेस से टूट जाते हैं

दो पागल
प्रेमिका के प्रेम में
प्रेमी पागल
प्रेमी के प्रेम में
प्रेमिका पागल
प्रेम क्या ख़ाक करेंगे
दो पागल

दुःख
दुःख की
कोई सीमा या
परिभाषा
नहीं होती
दुःख
दुःख होता है
08-12-2011
1847-15-12

हँसमुखजी का निशाना (हास्य कविता)


हँसमुखजी पोते के साथ
क्रिकेट खेल रहे थे
गेंदबाजी कर रहे थे
गेंद कभी विकेट के
तीन फीट दायें
कभी तीन फीट बायें से
निकल रही थी
पोता परेशान हो गया
कहने लगा
दादाजी आप झूठ
बोलते हैं
एक भी गेंद विकेट पर
सीधे ड़ाल नहीं सकते
लेकिन डींग हांकते हो
आपने जवानी में कई शेर
सटीक निशाने से मारे
हँसमुखजी बोले
तुम आधा गलत
आधा ठीक कहते हो
शेर तो मैंने ही मारे
पर निशाना तब भी
ऐसा ही था
डर नहीं लगे इसलिए
शिकार पर जाने से पहले
जम कर शराब पीता था
नशे में
शेर होता कहीं और था
दिखता कहीं और था
दिखता तीन फीट बायें
होता तीन फीट दायें
शेर को निशाना लगाता
गोली सीधी शेर को
जाकर लगती
तीन फीट का हिसाब
अभी भी चल रहा है
पीना छोड़ दिया है
इसलिए
लाख कोशिशों के 
बाद भी 
गेंद विकेट पर नहीं
 लगती
07-12-2011
1846-14-12

हँसमुखजी ने प्रेमपत्र लिखा (हास्य कविता)


हँसमुखजी ने प्रेमपत्र लिखा (हास्य कविता)
===================
हँसमुखजी का
हाथ हिंदी में तंग था
फिर भी प्रेमिका को
हिंदी में प्रेम पत्र 
लिख दिया
तुम मेरी दिल लगी  हो
स्वर्गवासी अप्सरा सी
लगती हो
तुम्हारे लिए चाँद तारे
तोड़ कर ला सकता हूँ
कोई नज़रें उठा कर
तुमको देखे ले तो
यमराज की तरह
जान भी ले सकता हूँ
प्रेमिका ने भी प्रेमपत्र का
जवाब प्रेम से दिया
ओ मेरे दिल के चौकीदार
मुझे पाना है तो
तुम्हें भी 
स्वर्गवासी होना पडेगा
चाँद तारों को तोड़ने से
पहले
उन्हें छोटा कर पेड़ पर
लटकाना होगा
किसी की जान लेने से 
पहले
यमराज सा दिखना 
होगा
विवाह के लिए
भैंसे पर बैठ कर आना
पडेगा
अगला प्रेम पत्र लिखो
उसके पहले हिंदी को
सुधारना होगा
डा.राजेंद्र तेला"निरंतर",
07-12-2011
1845-13-12
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गुरुवार, 8 दिसंबर 2011

सिर्फ गधे क्यों रेंक रहे हैं ?(हास्य कविता)

पशु मेले का 
उदघाटन करने 
नेताजी पधारे
उनके आते ही सारे गधे
ढेंचू ढेंचू करने लगे
नेताजी चकरा गए
चमचे से पूछने लगे
बाकी जानवर चुप हैं
सिर्फ गधे क्यों रेंक
रहे हैं ?
चमचे ने अपने ज्ञान का
परिचय दिया
खुशी खुशी बताने लगा
हुज़ूर गधे
बिरादरी का रिवाज़
निभा रहे हैं
कोई भी जाति भाई
दिखता  है
तो स्वागत में निरंतर
रेंक कर अपनत्व का
परिचय देते हैं
खुशी में रेंकते हैं
06-12-2011
1844-12-12

तुम नाराज़ क्यों हो?


तुम नाराज़ क्यों हो?
क्या कहा मैंने,
क्या करा मैंने?
जिसने तुम्हें खामोश
कर दिया
तुम्हारी नाराजगी को
ज़ाहिर कर  दिया
क्यातुम्हें अच्छा कहना
जुर्म हो गया?
या स्नेह भरे लफ़्ज़ों से
ख़त में
तुम्हारी तारीफ़ ने
तुम्हारे मन में मेरे
इरादों पर
शक पैदा कर दिया
क्या रिश्ते पाक नहीं
हो सकते?
क्या अच्छी बात को
अच्छा नहीं कह सकते ?
तुम्ही बताओ कोई कद्रदां
जिनको चाहता
कैसे अपनी बात उस तक
पहुंचाए ?
कसूर तुम्हारा भी नहीं
तुम मुझे जानती भी नहीं
मुझसे कभी मिली भी नहीं
वैसे भी आजकल
अच्छे बुरे का पता कहाँ
चलता है
सच ही तो है
मुस्काराते चेहरों के पीछे
हवस का शैतान छिपा
होता है
चलो कोई बात नहीं
मैं अपनी जगह
तुम अपनी जगह ठीक
सोचती हो
जब मन करे मुझे
आजमां लेना
मुझे तुम्हारे क्रोध से
कोई नाराजगी नहीं
ना ही मन में कोई रंज है
शायद तुम्हारी जगह
मैं होता तो यही करता
तुम्हारी
नाराजगी के बाद भी
बड़े होने के नाते
सच्चे दिल से
स्नेह और आशीर्वाद
सदा देता रहूँगा
तुम्हारी खुशी के लिए
दुआ करता रहूँगा
इस ख़त को
मेरी इमानदारी की
अभिव्यक्ती मत
समझना
मेरे निश्छल मन की
पीड़ा समझना
एक बार गहनता से
सोचना
क्या सबको एक लाठी से
हांकना ठीक होता ?
क्या बुरों के कारण
अच्छों को सज़ा देना
उचित होता ?
तुम्हारे जवाब का
इंतज़ार तो नहीं करूंगा
पर जिस दिन तुम्हारी
चुप्पी टूट जायेगी
खुद समझ जाऊंगा
तुम नाराज़ नहीं हो
06-12-2011
1843-11-12

बुधवार, 7 दिसंबर 2011

नेता सफ़ेद कपडे ही क्यों पहनते (हास्य कविता)


नेता सफ़ेद कपडे ही क्यों पहनते (हास्य कविता)
=====================
हँसमुखजी
बहुत परेशान थे
समझ नहीं पा रहे थे
उनके देश में नेता सफ़ेद
कपडे ही क्यों पहनते
अपनी परेशानी का ज़िक्र
अपने नेता मित्र से किया
नेता मित्र ने
हँसते हुए जवाब दिया
बड़े भोले हो
इतना भी नहीं समझते
कॉमन सैंस काम में लो 
कारण जान लो
हमारे दिल काले,धंधे काले
कारनामे काले,इरादे काले
ज़िन्दगी में
कोई और रंग भी होना
चाहिए
इसलिए कपडे सफ़ेद पहनते
अपने कालेपन को
निरंतर सफ़ेद कपड़ों से
छुपाने की कोशिश करते
डा.राजेंद्र तेला"निरंतर",
06-12-2011
1842-10-12

मंगलवार, 6 दिसंबर 2011

मेरा जूता एक दिन बोला मुझ से


मेरा जूता
एक दिन बोला मुझ से
मेरी प्रार्थना सुन लो
मेरे कष्ट थोड़े कम कर दो
कब तक घिसोगे मुझको
सहने के लिए एक
साथी दे दो
जूते की एक और जोड़ी
खरीद लो
चलते चलते थक गया हूँ
कीचड,गोबर में
सनते,सनते उकता गया हूँ
धूल,मिट्टी से भरता हूँ
उफ़ करे बिना
पथरीले सफ़र पर
चलता हूँ
सर्दी,गर्मी,बरसात में
निरंतर मुझे  घसीटते हो
कभी क्रोध दिखाने के लिए
नेताओं पर उछालते हो
कोई झगडा करे तो
निकाल कर मारते हो
मुझे खुश करने के लिए
थोड़ी सी पोलिश लगाते हो
बदबूदार
मोज़े सूंघते सूंघते
आत्म ह्त्या का मन
करता
मेरी छाती जैसा तला
गम में फट ना जाए
उससे पहले थोड़ा सा
रहम कर दो
जूते की एक और जोड़ी
खरीद लो
सहने के लिए एक
साथी दे दो
04-12-2011
1840-08-१२
डा.राजेंद्र तेला,निरंतर 
जीवन,जूता 

तेरी शादी किसी गधे से कर दूंगा (हास्य कविता)

हँसमुखजी ने
बड़े शौक से गधा पाला
थोड़े दिनों तक तो बहुत
प्यार से रखा
फिर धीरे धीरे उससे
मोह कम हो गया
निरंतर उसे मारने
पीटने लगे
खाने को भी कम देते ,
घर से बाहर निकाल देते
गधा भी ढीठ था
प्रताड़ित होता रहता
भूखा रहता
पर जाने का नाम
ना लेता
पड़ोसी के घोड़े से
देखा ना गया
एक दिन
उसने गधे से कहा
क्यों निरंतर मार 
खाते हो ?
यहाँ से कहीं चले 
क्यों नहीं जाते ?
गधा बोला मन तो
मेरा भी करता है
यहाँ से चला जाऊं
पर हँसमुखजी दिल के
बहुत अच्छे इंसान हैं
क्रोध तो
अपनी लडकी पर भी
करते हैं
उसे कहते हैं
तेरी शादी किसी गधे से
कर दूंगा
बस किसी दिन ज्यादा
भड़क जाएँ
क्रोध में मुझ से
अपनी लडकी की शादी
करवा दें
इसी इंतज़ार में
जाते जाते रुक जाता हूँ
04-12-2011
1839-07-12