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शनिवार, 3 दिसंबर 2011

क्षणिकाएं -9


छुपाना
क्या क्या छुपाऊँ ?
कब तक छुपाऊँ?
किस किस से छुपाऊँ ?
झूठ का आवरण
ना हटाऊँ ?
मन की व्यथा बढाऊँ
चैन ना पाऊँ
****
मसले
अगर झगड़ने से
मसले हल हो जाते
लोग प्रेम का
नाम नहीं जानते
****
 ढूंढ रहे थे
हम उन्हें शहर की
गलियों में ढूंढ रहे थे
वो हमारे घर में बैठे
इंतज़ार कर रहे थे 
****
मोहब्बत का मतलब
वो निरंतर हमें
मुस्कारा कर देख रहे थे
इशारे से
अपने पास बुला रहे थे
हम शब्दकोष में
मोहब्बत का मतलब
ढूंढ रहे थे
****
वो हमें
शक से देखते हैं
कसूर उनका नहीं
वो मर्दों से घबराते हैं
उनके
किस्सों से डरते हैं
****
नाराजगी 
नाराजगी क्यों हुयी ?
समझ में नहीं आयी
नाराजगी हुयी
ये समझ आ गयी
****
रोते रहते
बीते समय को
याद कर
रोते रहते
वर्तमान ,
भविष्य दोनों को
नष्ट करते
****
हँसी- खुशी
जीवन

हँसी खुशी से गुजरे

अच्छा लगता
कष्ट में गुजरे
बोझ लगता

तन्हाई
अब तन्हाई से
दोस्ती हो गयी
ज़िन्दगी की हकीकत
समझ आ गयी
****
धोखा
जिसने बार बार
धोखा खाया
वो दहशत में जीता है
जिसने भुगता
वही समझता है
****
मसीहा
लोगों को
रास्ते से हटाते रहे
मसीहा बनने के
ख्वाब देखते रहे
01-12-2011
1833-98-11-11

शुक्रवार, 2 दिसंबर 2011

जिसके जलन होती उसका दर्द वही जानता (हास्य कविता)


राह चलते हँसमुखजी को
आँसू बहाते
एक महिला दिख गयी
उनसे  देखा ना गया
उसके पास जाकर दिलासा
देते हुए कहने लगे
हिम्मत और सब्र से काम लो
तुम्हारे दुःख दूर हो जायेंगे
रोते ,भन्नाते हुए  महिला बोली
क्या ख़ाक हिम्मत रखूँ
एक हफ्ते में पांचवी बार
आँखों में मिर्ची गिर गयी
जलन के मारे
मेरी जान निकल रही है
तुम्हें सब्र की पडी है
उसने हँसमुखजी
के आँख में मिर्ची झोंक दी
अब तुम सब्र से काम लेना
हिम्मत से
दर्द और जलन सहना
कहते  हुए
उनका बैग लेकर भाग गयी
हँसमुखजी
अब किसी भी महिला को
रोते देखते हैं
उसे दिलासा ज़रूर देते हैं
पर साथ में कहते हैं
निरंतर हिम्मत और सब्र से
जलन कम नहीं होती
जिसके जलन होती
उसका दर्द वही जानता
30-11-2011
1832-97-11-11

राधा बोली मीरा से


राधा बोली मीरा से
कान्हा संग रहती हूँ
निरंतर रास रचाती हूँ
लाख प्रेम में डूबो उनके
चाहे जितना प्रयास 
कर लो 
कान्हा तो बस मेरे हैं
मीरा ने
उत्तर दिया राधा को
कान्हा तो प्रेम के भूखे हैं
संसार के
कण कण में बसते
ना मेरे हैं,ना तुम्हारे हैं
जो भी ह्रदय में बसाए 
कान्हा को
कान्हा तो बस
उसके  हैं
30-11-2011
1831-96-11-11

बेगुनाह को गुनाहगार करार देते हैं


वादा कर के भी
वो नहीं आये
हमने सोचा नाराज़
हो गए
हम मन में कुढ़ते रहे
निरंतर
हकीकत जाने बिना
कयास लगाते रहे
उन्हें
भला बुरा कहते रहे
शर्म से गढ़ गए
जब पता चला
वो हादसे में घायल
हो गए थे
अस्पताल में
मौत से लड़ रहे थे
अब सोचते हैं
क्यों इंसान
हकीकत जाने बिना
अंदाज से 
ख्याल बनाते हैं
बेगुनाह को 
गुनाहगार करार 
देते हैं
30-11-2011
1830-95-11-11

गुरुवार, 1 दिसंबर 2011

आसां नहीं किसी अनजान पर यकीन करना


आसां नहीं
किसी अनजान पर
यकीन करना
उसकी
मीठी बातों से
बचना
दिल में छुपी
हकीकत को जानना
सलाम उनको जो
ना जानते हुए भी
हिम्मत से
यकीन कर लेते
निरंतर
अपने खुदा पर
ऐतमाद रखते
दगा के डर से
नए रिश्ते नहीं
बनाते
अनजान से भी
अपनेपन से मिलते
30-11-2011
1829-94-11-11
 (ऐतमाद=Faith,Confidence)

बुधवार, 30 नवंबर 2011

इश्वर भक्ती में डूबा रहा


प्यासे को
पानी नहीं पिलाया
भूखे को
भोजन नहीं कराया
निरंतर
इश्वर भक्ती में डूबा रहा
स्वर्ग के
सपने देखता रहा
परमात्मा ने
भक्ती का प्रसाद दिया
मरणोपरांत उसे
नरक में बसा दिया
29-11-2011
1828-93-11-11

क्या मुझ से पूछ कर तुमने मुझे जन्म दिया ?


क्या मुझ से पूछ कर
तुमने मुझे जन्म दिया ?
दुनिया में लाने से पहले
तुमने किस से पूछा
बेटे ने ,पिता से
क्रोध में प्रश्न किया
व्यथित पिता से
रहा ना गया
आँखों में आंसू लिए
सहमते हुए उत्तर दिया
जब राम,कृष्ण,बुद्ध,
महावीर के पिता ने
किसी से नहीं पूछा
मैं किस से पूछता ?
मैंने केवल संसार के
नियम का पालन किया
परमात्मा की
इच्छा का सम्मान किया
अगर मुझे पता होता
तुम्हारे जैसी
संतान का पिता
कहलाना पडेगा
संतान के हाथों निरंतर
प्रताड़ित होना पडेगा
परमात्मा के नियम को
तोड़ देता
विवाह के बंधन में
कभी नहीं बंधता
इस तरह
अपने खून के हाथों
हर दिन तिल तिल कर
ना मारा जाता
तुम अपनी संतान से
पूछ कर उसे जन्म देना
वो पूछे तो
खुशी से सुन लेना
उत्तर में
उसे शाबाशी देना

डा.राजेंद्र तेला,निरंतर
29-11-2011
1827-92-11-11

मंगलवार, 29 नवंबर 2011

क्षणिकाएं -8


बड़े अरमानों से
बड़े अरमानों से
हमने उन्हें फूल
भेंट किये
भोलेपन से वो
पूछने लगे
कहाँ से खरीदे ?
हमें भी किसी
ख़ास को देने हैं
बहुत शिद्दत से
बताने लगे
****
अन्धेरा
लोग घरों को रोशन
करते हैं
दिल-ओ-दिमाग में
अन्धेरा रखते हैं
****
मैं चाहूँ तो हो जाए
मैं चाहूँ हो जाए
कोई और चाहे
तो क्यों हो जाए
****
ज्यादा देने के लिए
ज्यादा देने के लिए
कम लेना सीखो
जो मिले उसे
खुशी से कबूल
कर लो
****
कुर्सी के लिए
सब कुर्सी के लिए
लड़ते
उससे कोई नहीं
पूछता
उस पर बैठने वाला
कैसा होना चाहिए
****
प्रेम की परिणीति
प्रेमियों के
प्रेम की परिणीति
प्रेमी प्रेमिका
दोनों की बेचैनी
****
देता इश्वर है
देता इश्वर है
खाते,पचाते,
भोगते,हम हैं
फिर कहते
हमारा है
****
सहानभूती
सहानभूती के
दो शब्द दिल को
राहत देते हैं
उसमें भी लोग
कंजूसी करते हैं
****
दुविधा
दुविधा मैं पैदा हुआ
दुविधा में जीता रहा
दुविधा में मर गया
करूँ ना करूँ
के जाल में फंसा रहा
****
सामंजस्य बिठाओ 
सामंजस्य बिठाओ 
नहीं तो विद्रोह करो
या फिर सहन करो

29-11-2011
1826-91-11-11

हमसे रहा ना गया

हमसे रहा ना गया
उनकी तारीफ़ में
एक शेर पढ़ दिया
उन्होंने उसे
इज़हार-ऐ-मोहब्बत
समझ
हमसे मुंह फिरा लिया
कैसे समझाऊँ उन्हें ?
इज़हार-ऐ-मोहब्बत नहीं
इज़हार-ऐ-इज्ज़त थी
इज्ज़त बख्शना भी
गुनाह हो गया
हकीकत बयान करना
दर्द-ऐ-दिल बन गया
27-11-2011
1823-88-11-11

सोमवार, 28 नवंबर 2011

क्यों कहते हो ? मुझसे वादा करो


क्यों कहते हो ?
मुझसे वादा करो
कभी ना छोड़ोगे मुझको
मरते दम तक साथ दोगे
क्यूं बहम रखते हो?
हमारी मोहब्बत पर
यकीन रखो
फिर भी दिल ना माने तो
दुआ खुदा से करो
साथ देंगे तुम्हारा
जब तक खुदा चाहेगा
गर फैसला कर लिया
उसने
दुनिया से जाना हमको
सुकून हमें भी नहीं
मिलेगा
दिल हमारा भी रोयेगा
निरंतर
तुमसे मिलने का इंतज़ार
करता रहेगा
27-11-2011
1823-88-11-11