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शनिवार, 19 नवंबर 2011

संतुष्टी से जीवन जीता जाता

सर्दी,गर्मी या हो
वर्षा का मौसम
एक तारा लिए
एक साधू निरंतर
मेरे घर पर आता
एकाग्रचित्त हो 
मन -लगन और सहज 
भाव से
लोक गीत सुना कर
मंत्रमुग्ध करता
कोई दान दक्षिणा दे दे
सहर्ष स्वीकार कर लेता
नहीं दे तो मुंह नहीं
बिचकाता
ना पाने की इच्छा
ना कुछ खोने का भय
बहते पानी सा 
बहता रहता 
सबकी खुशी में
अपनी खुशी समझता
कुछ नहीं पास उसके
फिर भी संतुष्टी से
जीवन जीता जाता
19-11-2011
1801-72-11-11

क्षणिकाएं -5





मंजिल

मंजिल की तलाश में
ज़िन्दगी गुजर जाती
मिलती किसी को नहीं
*****
चिंतन

चिंतन
बिना जीवन नहीं
जीवन
बिना चिंतन नहीं
एक आगे आगे
दूजा पीछे पीछे
*****

सत्य सुनना


दूसरों का
सत्य सब सुनना
चाहते
खुद का सत्य
छुपा कर रखना
चाहते
*****
सत्य कहना

सत्य जानते हैं
कहने से पहले

तोलते हैं
कहूँ ना कहूँ
के भंवर में

डोलते हैं
*****
बच्चे- बड़े

बच्चे चाहते
बड़े हो जाएँ
बड़े चाहते
बच्चे बन जाएँ
*****
बचपन-बुढापा

बड़े बचपन को
भूल नहीं पाते
बच्चे बुढापे को
समझ नहीं पाते
*****
19-11-2011
1800-71-11-11

ख्वाईशें दम तोडती रही


जब भी मिलते
निरंतर कहते हम से
किसी दिन
फुरसत में बात करेंगे
उनकी
फ़ुरसत के इंतज़ार में
उम्र बीत गयी
ना उन्हें फुरसत मिली
ना हमारी हसरतें
पूरी हुयी
ख्वाईशें
दम तोडती रही
दिल की बात
दिल में रह गयी
19-11-2011
1799-70-11-11

जीने का मकसद


सब को पसंद
खूबसूरत चेहरे
कितनी आसानी से
दिल को भूल जाते
मुझे चेहरों से
ज्यादा खूबसूरत
दिल पसंद है
निरंतर
जीने का मकसद
जो देता
18-11-2011
1798-69-11-11

शुक्रवार, 18 नवंबर 2011

क्षणिकाएं -4


जीवन-म्रत्यु
म्रत्यु क्या है ?
जीवन का अंत
जीवन क्या है ?
म्रत्यु का इंतज़ार
ओस
ओस
की बूँद जब तक
पिघलती नहीं
चमकती रहती
जीने का अर्थ
समझाती रहती
*******
मैं
हम अब
 "मैं"में 
सिमट गए हैं 
दिल-ओ-दीमाग के
दरवाज़े 
बंद हो गए हैं 
*******
रिश्वत
रिश्वत देना पाप है
लेना मजबूरी
वक़्त के साथ
चलना ज़रूरी है
*******
नींद
नींद नहीं होती
तो कोई सोता नहीं
रातों को जागता नहीं
*******
व्यस्तता
महीनों हो गए
पड़ोसी से मिले हुए
शहर के
लोगों से मिलने में
व्यस्त थे
******
18-11-2011
1797-68-11-11

असंतुष्ट


सदा कहता था
जो मिलना चाहिए था
नहीं मिला
जो नहीं मिलना चाहिए था
वो मिला
परमात्मा की इच्छा का
कभी सम्मान नहीं किया
जीवन भर
दुखड़ा रोता रहा
परमात्मा को कोसता रहा
निरंतर असंतुष्ट रहा
असंतुष्ट ही चला गया
18-11-2011
1796-67-11-11

गुरुवार, 17 नवंबर 2011

हम राहगुजर तो नहीं


हम
राहगुजर तो नहीं
निगाहें उठा कर भी
ना देखो हमको
धूल का गुबार भी नहीं
मुंह छुपाओ हमसे
ये बात जुदा है
तुम खफा हुए हमसे
दूर हो गए हमारी 
ज़िन्दगी से
कम से कम इंसान तो
समझो हमको
देख कर
मुंह तो ना फिराओ
कम-स-कम
इंसान की तरह तो
पेश आओ हमसे
डा.राजेंद्र तेला,निरंतर
17-11-2011
1795-66-11-11

बुधवार, 16 नवंबर 2011

ठहरे पानी को आइना समझ लिया


ठहरे पानी को
आइना समझ लिया
बड़ी हसरत से 
उसमें अपना अक्स
देखने लगा
एक कंकर गिरा
आइना टूट गया 
सपना चूर चूर
हो गया
मैं जहां था वहीँ
खडा रह गया
उनकी
मुस्काराहट को
मोहब्बत का आगाज़
समझ लिया 
16-11-2011
1795-66-11-11

क्षणिकाएं -3


जीवन
जीना है तो
लड़ना है
लड़ना है तो
चोट भी खाना है
जीवन का अंत
ऐसे ही होना है
आज कल
आज कल
ना सुन सकते
ना कह सकते
बस चुप रह
सकते
लेना-देना
देनेवाले बहुत हैं
लेने वाला चाहिए
दिल-ओ-दिमाग के
दरवाज़े
निरंतर खुले होने
चाहिए
जिज्ञासा
कौन क्या करेगा?
किसी को नहीं पता
पर हर शख्श
सवाल ज़रूर पूछेगा
दुनिया
मैं हँसूं
तो सब हँसें
मैं रोऊँ तो
कोई ना रोये
संशय
कैसे कहूँ ?
किस से कहूँ ?
कहूँ या ना कहूँ ?
व्यथा
कोई क्या कहेगा ?
कोई क्या सोचेगा ?
प्रशंसा
प्रशंसा अच्छी लगती है
बुराई कानों में चुभती है
सच महत्वहीन हो जाता
16-11-2011
1794-65-11-11

मंगलवार, 15 नवंबर 2011

ऐ ज़िन्दगी इतना भी ना झंझोड़ जीने का अर्थ ही ना जान पाऊँ


ऐ ज़िन्दगी
इतना भी ना झंझोड़
जीने का अर्थ ही
ना जान पाऊँ
संसार में आया हूँ
जब से
हिम्मत से लड़ता
रहा हूँ
समझ नहीं सका
अब तक
कैसे हँसते मन से ?
अब तो थम जा
मुझे भी हँसा
थोड़ा सा
जीने का अर्थ
मैं भी समझ जाऊं
कहीं ऐसा ना हो
लड़ना ही भूल जाऊं
समय से पहले ही
थक ना जाऊं
ऐ ज़िन्दगी
इतना ना झंझोड़
जीने का अर्थ ही
ना जान पाऊँ
© डा.राजेंद्र तेला,निरंतर
15-11-2011
1793-64-11-11

हम जानते तुम्हारी तकलीफ क्या है


हम जानते तुम्हारी
तकलीफ क्या है
निरंतर मुस्काराता
चेहरा मुरझाया हुआ
क्यूं है ?

दर्द-ऐ दिल से परेशाँ
हो तुम
अपने साहिल से दूर
हो तुम

हम भी गुजर रहे इसी
मुकाम से
दूर हैं अपने साहिल से

फर्क इतना सा है
हमें पता है
हमारे साहिल का
तुम अनजान उस से हो

अब देख नहीं सकते
तुम्हें बदहाली में
बताना ही पडेगा
राज़-ऐ-दिल तुम्हें

तुम्ही मंजिल
तुम्ही साहिल हमारे

जब जान ही गए हो
रंजों गम दूर कर लो
हमें कबूल कर लो
15-11-2011
1792-63-11-11

देवता से लगते सबको ,गर नाक सीधी होती तुम्हारी (हास्य-प्रेरणास्पद कविता)


ना करो बुराई 
किसी की
ना दिखाओ आइना
गर कह दिया किसी को
नाक टेढ़ी उसकी
हो जाएगा नाराज़ तुमसे
फिर भी रह ना पाओ
कहना चाहो
तो समझ लो कैसे कहो
नाक टेढ़ी उसकी
ललाट चौड़ा ,काया 
कंचन सी
केश काले ,रंग गंदुमी ,
चाल ढाल राजाओं की
चेहरा अभिनेताओं सा
लगता तुम्हारा
देवता से दिखते सबको
गर नाक सीधी होती 
तुम्हारी
(काने को काना मत कहो ,काना जाएगा रूठ
बस चुपके से पूछ लो ,कैसे गयी थी फूट )

© डा.राजेंद्र तेला,निरंतर

{शारीरिक कमी,कुदरत की देन होती है,इस पर कटाक्ष करना उचित नहीं  }
15-11-2011
1791-62-11-11