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शनिवार, 12 नवंबर 2011

एक लम्हा वफ़ा का दे दे कोई

दिल में आरजू बसी
एक लम्हा वफ़ा का
दे दे कोई
बीमार -ऐ-दिल को
दवा दे दे कोई
मोहब्बत का जवाब
मोहब्बत से दे दे कोई
मेरी तरफ नज़रें  कर ले
टूटे दिल को जोड़ दे कोई 
किश्ती को मंझधार से 
किनारे लगा दे 
दिल को सुकून दे दे कोई 
इल्तजा सुन ले
दिल की धड़कन को 
खुद के दिल की  
धड़कन बना ले कोई 
तन्हाईयों को 
सदा दे दे कोई   

****
डा.राजेंद्र तेला,निरंतर
12-11-2011
1784-55-11-11
शायरी,आरज़ू.तन्हाई,वफ़ा,मोहब्बत,दिल

आशाओं का संसार


घर के आँगन में
एक पौधा उगा
चेहरा
मुस्कान से भरा
मन में आशाओं का
संसार जगा
एक दिन
फूलों से लदेगा
सारा घर महकेगा
निरंतर
अतिवृष्टी ने हाहाकार
मचाया
पौधा सह ना पाया
समय से पहले
काल कवलित हुआ
मन निराशा में
डूब गया 
भूल गया
हर सपना पूरा
नहीं होता
आशा निराशा का
साथ होता
आवश्यकता से
अधिक मिलना
विनाशकारी होता
12-11-2011
1783-54-11-11

लोग बदलते रहे हम ना बदल सके


लोग बदलते रहे
हम ना बदल सके
लोग मिलते रहे
हम सच कहते रहे
लोगों को नाराज़
करते रहे
लोग नफरत करते रहे
हमें छोड़ते रहे
गालियाँ देते रहे
हम सुनते रहे
निरंतर हँसते रहे
मोहब्बत में डूबे रहे
हम ना छोड़ सके
किसी को
अपना सा ढूंढते रहे
लोग बदलते रहे
हम ना बदल सके
12-11-2011
1782-53-11-11

क्षणिकाएं--1



पहल

आमने सामने
बैठे थे
दोनों चुप थे
पहल कौन करे
सोच में डूबे थे
******

डर

रात के डर से
दिन का उजाला
बर्बाद करते रहे
ज़िन्दगी भर
रोते रहे
******

असमंजस

असमंजस
ना जीने देता
ना मरने देता
फैसला
नहीं होने देता
******

आँसूं

शरीर का 
अतरिक्त पानी
आँखों से बह कर
दिल और दिमाग का
बोझ हल्का 
करता
******

निरंतर

रुके तो रुका रहे
चले तो चलता रहे
जीवन यूँ ही काटता रहे
******
हँसी

हँस तो लिए
हँसाया क्यों नहीं ?
ये भी सोचा कभी
******

12-11-2011
1781-52-11-11

मेरी तन्हाई मुझसे कहने लगी


मेरी तन्हाई
मुझसे कहने लगी
क्यों हँसना भूल गए ?
क्या निरंतर रोते
रहोगे ?
कब तक ग़मगीन
चेहरा लेकर बैठे
रहोगे ?
मुझे ग़मों में ना
डुबाओ
तुम तो मेरे आगोश में
गम हल्का कर लेते हो
मैं कहाँ जाऊंगी ?
थोड़ा मेरा भी
ख्याल करो
डा.राजेंद्र तेला"निरंतर", 
12-11-2011
1780-51-11-11

शुक्रवार, 11 नवंबर 2011

मेरी कुंठा


मेरी कुंठा
बदहजमी करती
उल्टी सी
बाहर निकलने को
मचलती रहती
तड़पती रहती
कलम के जरिये
कह सुन कर
प्रेम से,क्रोध से
सोचे,बिना सोचे
मेरी भी कोशिश
निरंतर चलती रहती
पर क्या करूँ ?
बामुश्किल
एक निकलती
दूसरी घर बनाती
ख़त्म होने का नाम
ना लेती
मेरे व्यक्तित्व को
तार तार करती
मुझे उलझाए
रखती
11-11-2011
1778-49-11-11

गर तूँ बेदिल होता


निरंतर
तेरा ये हाल
ना होता
गर तूँ बेदिल होता
तेरा दिल किसी को
देख कर ना धड़कता
ना किसी पर जाँ
निसार करता
ना बेकरार रहता
ना यादों में खोता
ना रातों को जागता
ना दिल से दिल
लगाता
ना बार बार टूटता
बिना मोहब्बत करे
जीता रहता
ज़िन्दगी का मकसद
भूल जाता
खुशकिस्मत समझ
खुद को
तूँ मोहब्बत की कीमत
समझता
11-11-2011
1777-48-11-11

कभी हम खुद को ही बहला लिया करते


कभी हम खुद को ही
  बहला लिया करते
शीशे में
 अपना अक्स देख कर
खूब मुस्कराया करते
अपने
खूबसूरत चेहरे पर
इतराया करते
जो खुले आम नहीं
कह पाते
निरंतर अकेले में
कह लिया करते
खुद की नादानियों पर
खुद को
डांट दिया करते
चाहने वालों को
 ख़्वाबों में देख लिया
करते
दिल के अरमान
ख़त में लिख कर
खुद ही पढ़ लिया करते
कभी हम खुद को ही
  बहला लिया करते
डा.राजेंद्र तेला"निरंतर", 
11-11-2011
1775-43-11-11

वक़्त इतना बेरहम क्यूं हो गया ?



वक़्त इतना
बेरहम क्यूं  हो गया?
खुदा जाने
दुआ भी करता हूँ ,
इबादत भी करता हूँ
ना जाने फिर भी 
क्यों नहीं सुनता?
खुदा जाने
कब तक हैरान करेगा 
मर मर कर जिलाएगा
खुदा जाने
कब तक रुलाएगा
कब चेहरे पर मुस्कान
लाएगा
खुदा जाने
निरंतर सब्र रख रहा हूँ
सब्र का सिला
 देगा भी या नहीं
खुदा जाने
कब तक इम्तहान लेगा
खुदा जाने
कब तक मेरी नियत ना
समझेगा
मुझे ना पहचानेगा 
खुदा जाने 
मुझे यकीन अपने
 ईमान पर 
एक दिन ज़रूर पहचानेगा 
कब पहचानेगा ये भी
खुदा जाने
11-11-2011
1774-42-11-11

गुरुवार, 10 नवंबर 2011

दिल कभी ना मिलेंगे


मैं,आप नहीं हूँ
आप,मैं नहीं हैं
मैं
मैं रहना चाहता हूँ
आप
आप रहना चाहते हैं
यही तो समस्या है
जब तक
"मैं" आप नहीं
बनूंगा
आप "मैं" नहीं
बनेंगे
दिल कभी ना मिलेंगे
समस्या
समस्या ही रहेगी
10-11-2011
1773-41-11-11

नजाकत


उनकी
नजाकत का
अंदाज़ तो देखिए
उन्होंने
एक तितली को
छू लिया
हाथ में ज़ख्म
हो गया
निरंतर
मुस्काराता चेहरा
गम में डूब गया
10-11-2011
1772-40-11-11

अजीब हालात हैं


अजीब हालात हैं
सामने लोग
वाह वाह  करते  
पीठ पीछे हाय हाय
करते
दिल में नफरत का
अम्बार
लगा कर रखते
निरंतर
चेहरे को मुस्कारहट
से सजा कर रखते
मन में रोते रहते
ज़िन्दगी बर्बाद करते
रहते 
10-11-2011
1771-39-11-11

फूल तो बहुत देखे अब तक


फूल तो बहुत देखे
अब तक
पर तुम्हारी सी
महक नहीं थी उनमें
साज़ तो बहुत सुने
तुम्हारी आवाज़ सी
खनक नहीं थी उनमें
चेहरे भी बहुत देखे 
पर तुम्हारी सी
खूबसूरती नहीं थी उनमें
दिल बहुतों से लगाया
पर मन भरा नहीं उनसे
निरंतर भटकता रहा
पर मुकाम मिला नहीं
अब तक
जब से तुम्हें देखा
मंजिल
नज़र आ गयी मुझे   
अब तुम्हारे बिना
सुकून
मिलेगा नहीं मुझे
 डा.राजेंद्र तेला"निरंतर",
10-11-2011
1770-38-11-11