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शनिवार, 29 अक्तूबर 2011

फिर से मुस्कारा दो


क्यों मन ही मन
रोते हो?
दिल को तकलीफ
देते हो
किस बात से घबराते हो?
क्यों खुल कर नहीं
कहते हो ?
निरंतर ग़मों का बोझ
बढाते हो
अब जहन से झिझक
हटा दो
जुबाँ पर लगा ताला
खोल दो
अपना समझ कर
यकीन हम पर कर लो 
दिल की बात बता दो
अपनी घुटन कम
कर लो
फिर से मुस्कारा दो
29-10-2011
1719-126-10-11

क्यूँ ना एक दूसरे से जुदा हो जाएँ ?

तुम्हें हम सफ़र
बनाने की कोशिशें
निरंतर करते रहे
मगर कामयाबी
हाँसिल
ना कर सके
इस से पहले की तुम
अपनी मजबूरियां
बताओ
क्यूँ ना एक दूसरे से
जुदा हो जाएँ ?
ताजिंदगी रोने से
बेहतर
कुछ दिन रो कर
काम चलाएँ
ख्वाब समझ कर
एक दूसरे को भूल
जाएँ
29-10-2011
1718-125-10-11

आशा, निराशा


जैसे ही
 लगने लगता
सपना अब पूरा
होगा
फिर कोई व्यवधान
 पैदा होता
सपना एक बार फिर
अधूरा रहता
किस्मत से फिर यकीन
उठता
कब तक ऐसा होता
रहेगा
मन खुद से सवाल
करता
निरंतर अधूरा पन
मन को
चैन नहीं लेने देता
आशा,निराशा का भाव
कभी ख़त्म ना होता
जीवन को संतुष्टी से
कोसों दूर रखता
29-10-2011
1717-124-10-11

हाँ,ना


हाँ,ना
करते,करते
उम्र गुजर  गयी
उम्मीदें
हवा हो गयी
हसरतें
अधूरी रह गयी
मोहब्बत
ख्यालों में परवान
चढ़ती रही
निरंतर झिझक से
हकीकत में
तब्दील
ना हो सकी
29-10-2011
1716-123-10-11

आगे क्या होने वाला है ?


उम्र ढलने लगी थी
झुर्रियां बढ़ने लगी थी
सोच कांपने लगा था
विचारों का मंथन
त्वरित गति से
होने लगा था
आगे क्या होने वाला है ?
साफ़ दिखने लगा था
एक अजीब सा भय
मन में घर करने लगा
जीवन डगर
समाप्त होने का समय
अब दूर ना था
क्या होगा ?
कब अंत आयेगा ?
क्यों मनुष्य को
फिर लौटना पड़ता है
निरंतर मष्तिष्क में
सवाल कचोटने लगा
क्या करूँ
जिससे अंत समीप
ना आये
बहुत सहा जीवन में
जैसा चाहा
वैसा मिला नहीं 
फिर भी जीने की चाह
कम ना हुयी
परमात्मा अब पहले से
अधिक याद आने लगा
अधिक से अधिक

जी सकूँ
जाऊं भी तो चुपके से
पता भी ना चले
नाम मात्र भी

कष्ट ना सहना पड़े
रात सोऊँ सवेरे
जागूँ ही नहीं
यही सोच बार बार
मन में

आने लगा था
29-10-2011

1715-122-10-11

शुक्रवार, 28 अक्तूबर 2011

मनुष्य बना कर रखना तुम

तानाशाह का अंत
 समय था
अंतिम क्षण मन में
 सोच रहा था
क्यों इर्ष्या,द्वेष,अहम्
अहंकार में
व्यर्थ किये करोड़ों क्षण
छोड़ जाऊंगा पीछे 
मनों में खट्टी यादें 
जिन्हें याद कर
तिलमिलायेंगे 
खुल कर गाली देंगे 
चीख चीख कर मेरा सत्य
संसार को  बताएँगे
मेरी कब्र पर
एक फूल भी ना चढ़ाएंगे
धन दौलत सब पीछे रह
जायेगी
परिवार की दुर्गती होगी
क्यों समझ नहीं आया
जीवन भर
निरंतर
भटकता रहा खुदा के
पथ से
अहम्, अहंकार ताकत ने
मुझ को
मनुष्य से राक्षस बनाया
अब आँख मुंदने वाली है
अंतिम दुआ मान लो
 मालिक
जन्म फिर से अवश्य देना
पर सम्राट नहीं बनाना तुम
अपनों से दूर ना होने देना 
अहम् अहंकार से दूर
रखना
मनुष्य बना कर
रखना तुम 
28-10-2011
1714-121-10-11
(लीबिया के तानाशाह शासक,कर्नल गद्दाफी की मौत पर)

बुधवार, 26 अक्तूबर 2011

छुप ना पाओगे


लाख छुपने की 
कोशिश करो
हम से छुप ना पाओगे
परदे के पीछे से भी
नज़र हम को आओगे
तस्वीर
तुम्हारी आँखों से
दिल में उतारी
कैसे हम से बच पाओगे?
निरंतर
ख़्वाबों,ख्यालों में
रहते हो
कैसे हम से पीछा
छुडाओगे
जितना दूर जाओगे
हमें उतना पास
पाओगे
लाख छुपने की
कोशिश करो
हम से छुप ना पाओगे
डा.राजेंद्र तेला"निरंतर"
26-10-2011
1713-120-10-11

दीपावली की शुभकामनायें



आपको ह्रदय से 
दीपावली की
शुभकामनायें
आपका जीवन
खुशियों से भर जाये
ह्रदय में 
मोहब्बत के दीप
जल जायें
मन खुशी से 
झूम जाये
चेहरे की मुस्कान
निरंतर बनी रहे
हर आने वाला वर्ष
पहले से बेहतर आये
परमात्मा
मेरी दुआ कबूल कर ले
आपके
सारे दुःख दूर कर दे
26-10-2011
1712-119-10-11

मंगलवार, 25 अक्तूबर 2011

कैसे दिल को समझाऊँ?


कैसे

दिल को समझाऊँ?
कैसे
 वक़्त को लौटाऊँ?
मुझ से मिलने से
पहले ही
वो किसी और के
हो चुके
बदकिस्मती मेरी
या उनकी कह नहीं
सकते
दिल से उन्हें चाहते
मजबूर
कर नहीं सकते
उनकी कमी निरंतर
खलेगी
क्यूं पहले ना मिले ?
टीस सदा मन में
रहेगी
उनकी याद अब जीने
ना देगी
25-10-2011
1709-116-10-11

विश्वास


विश्वास ,
एक ऐसा शब्द जो हम निरंतर सुनते हैं ,जिस के बिना मनुष्य का जीवन नहीं चलता,विश्वास दो व्यक्तियों या व्यक्तियों के बीच संबंधों की धुरी के सामान होता है.
संबंधों का बनना,बिगड़ना परस्पर विश्वास पर ही निर्भर करता है.
विश्वास नहीं होता तो विश्वासघात भी नहीं होता .
ध्यान रखने योग्य प्रमुख बात है,विश्वास कभी एक पक्षीय नहीं हो सकता.
सदा द्वीपक्षीय होता है.
विश्वास पाने के लिए विश्वास करना भी उतना ही आवश्यक है,साथ ही मर्यादाहीन,अवांछनीय कार्यों और व्यवहार के लिए किसी से विश्वास की अपेक्षा करना, निरर्थक होता है.
डा.राजेंद्र तेला "निरंतर"
अजमेर
२५ -१०-२०११
25-10-2011
1709-116-10-11

कितना क्रोध उचित है


कितना क्रोध उचित है
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हर ज्ञानी,महापुरुष ने सदा एक ही बात कही है,क्रोध नहीं करना चाहिए .
ग्रन्थ साक्षी हैं ,देवताओं से लेकर महा पुरुष,योगी और महा ऋषी भी क्रोध से नहीं बच सके .
क्रोध मनुष्य के स्वभाव का अभिन्न अंग है.
परमात्मा द्वारा दी हुयी इस भावना का अर्थ असहमती की अभिव्यक्ति ही तो है
पर उस में विवेक खोना ,जिह्वा एवं स्वयं पर से नियंत्रण खोना घातक होता है.
इसकी परिणीति अनयंत्रित व्यवहार और कार्य में होती है .जिस से बहुत भारी अनर्थ हो सकता है 
सब को निरंतर ऐसा होते दिखता भी है.
अतः क्रोध करना अनुचित तो है ही ,पर साथ में क्रोध आने पर,अपना विवेक बनाए रखना,जिह्वा और मन मष्तिष्क पर नियंत्रण अत्यंत आवश्यक है.
असहमती अवश्य प्रकट करनी चाहिए पर विवेक पूर्ण तरीके से
डा.राजेंद्र तेला "निरंतर"
अजमेर
२४-१०-२०११
25-10-2011
1708-115-10-11