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शनिवार, 22 अक्तूबर 2011

बड़ी ज़ालिम होती ये निगाहें


बड़ी ज़ालिम होती
ये निगाहें
इन निगाहों का
क्या कीजिये
कहीं ठहरती नहीं
जो भी दिल को भाता
तस्वीर दिल में
उतारती
उसकी तलाश में
भटकतीरहती
रात रात
भर सोने ना देती
निरंतर
 ख्वाब देखती रहती
तड़प इनकी
कभी कम नहीं होती
बड़ी ज़ालिम होती
ये निगाहें
इन निगाहों का
क्या कीजिये 
22-10-2011
1693-100-10-11

पुष्प की व्यथा


सब मुझे पुष्प के
नाम से पहचानते
पर मेरी व्यथा नहीं
समझते 
अपने में मग्न
सब मेरी सुगंध सूंघते
देख कर खुश होते
बहुत चाव  से पौधा
लगाते
व्याकुलता से
मेरे खिलने की प्रतीक्षा
करते
बड़ी निष्ठुरता से मुझे
तोड़ते
समय से पहले मेरे
प्राण हरते
चाहूँ ना चाहूँ
भँवरे मेरा रस चूसते 
पूजा अर्चना से लेकर
अर्थी तक
विवाह से अभिनन्दन तक
मुझे चढाते
मुरझाने पर  पैरों तले
रौंदते
किसी ने आज तक
मेरी पीड़ा पर ध्यान
नहीं दिया
स्वार्थ में निरंतर सदियों से
मनुष्य ने मेरा मनचाहा
उपभोग किया
मेरे नाम पर अपना
नाम रखा
औषधी ,सुगंध,सौन्दर्य
के लिए  मुझे
काम में लिया
मैंने कभी प्रतिरोध या
क्रोध नहीं किया
चुपचाप निरंकुश व्यवहार
सहता रहा
कभी तो परमात्मा
मेरी सुनेगा
मेरी व्यथा कम करेगा
इस आशा में निरंतर
खिलता महकता हूँ  
22-10-2011
1692-99-10-11

ग़मों से मोहब्बत इतनी हो गयी


बरसों से चल रहा
सिलसिला
थमने का नाम नहीं

लेता
ज़ख्म ठीक होने से

पहले
नया ज़ख्म मिलता
हंसने से पहले ही
फिर से रोना पड़ता
ग़मों से मोहब्बत
इतनी हो गयी
दिल अब उन्ही से
लगाना पड़ता
हंसने के मसलों में भी
निरंतर अश्क बहाना
पड़ता

22-10-2011
1691-98-10-11

अब मैंने भी ठान ली


अब मैंने भी ठान ली
उन्हें ख़त क्यूँ लिखूँ ?
क्यूं हमेशा मैं ही
पहल करूँ?
मुझे अहसास है
दिल उनका भी याद
करता होगा
मेरी याद में निरंतर
तड़पता होगा
मन उनका भी
मेरी आवाज़ सुनने को
करता होगा
मैं यहाँ रो रहा हूँ
उन्हें वहां रोने दो
गर उन्होंने जिद
कर ली
मुझे भी जिद कर
लेने दो
इंतज़ार का अहसास
उन्हें भी होने दो 
22-10-2011
1690-97-10-11

शुक्रवार, 21 अक्तूबर 2011

वफ़ा की उम्मीद बेवफायी से डरने नहीं देती


ज़िंदा रहने की चाहत
 मरने नहीं देती
हँसने की ख्वाइश
मेरे आंसूं पोंछती
ग़मों को सहने की 
हिम्मत देती
मोहब्बत की उम्मीद
दिल लगाने को 
मजबूर करती
वफ़ा की उम्मीद
बेवफायी से डरने
नहीं देती
डा.राजेंद्र तेला,निरंतर  
शायरी,वफ़ा,बेवफाई,हिम्मत
21-10-2011
1685-92-10-11

तुम्हें चलते रहना है

तुम्हें
रास्ता खुद बनाना है

चट्टानों से फूट कर

नदी सा बहना है
इधर उधर
ना भटक जाना
मेहनत के पानी को
व्यर्थ ना छलकाना
गति पर अपनी काबू
रखना
भावनाओं में ना बहना
ना घबराना
ना हिम्मत कभी हारना
होंसला सदा कायम
रखना है
रुकावटों को पार करना
निरंतर चलते रहना 
ज़िन्दगी का लक्ष्य
बनाना है
जीवन के अंतिम
क्षण तक
हँसते रहना है
तुम्हें चलते रहना है
तुम्हें चलते रहना है

21-10-2011
1684-91-10-11

बिछड़ने से पहले ही क्यूं बिछड़ गए ?


बिछड़ने से पहले ही
क्यूं बिछड़ गए ?
पास रह कर भी दूर
क्यूं हो गए ?
फासले दिलों के
क्यूं बढ़ गए ?
सोचने का तरीका
जुदा हो सकता है
ख्यालों में फर्क हो
सकता है
इसका मतलब ये तो नहीं
तुम हमको दुश्मन
समझने लगो
निरंतर रश्क करने लगो 
अपना हो कर भी पराया
समझने लगो
हमेशा दिल से चाहा
तुमको
क्यूं अब जान के प्यासे
हो गए ?
21-10-2011
1683-90-10-11

सामने वाले घर में रहती थी ( हास्य कविता)


 सामने
वाले घर में रहती थी
देर रात उनके कमरे की
बत्ती जल रही थी
दूर से मेरे मन में
बेचैनी पैदा कर रही थी
उन्हें देखने की इच्छा
हो रही थी
एक नज़र मेरे कमरे की
तरफ देख लें
नज़रों से नज़रें मिला लें
उम्मीद में मैंने भी
कमरे की खिड़की खोल दी
निगाहें खिड़की पर लगी थी
नींद उड़ गयी
आँख़ें सुर्ख लाल हो गयी
रात गुजरती गयी
उम्मीद कम नहीं हुयी
कब भोर आयी खबर
भी ना हुयी
आज की रात भी सूनी रही
मन की परेशानी
कम ना हुयी
किसी तरह उन्हें खबर
भिजवायी
रात की कहानी उन्हें
बतायी
जवाब में छोटी से चिट्ठी
मुझे भिजवायी
मेरे ख़त की जम कर
हँसी उडायी
इस से बड़ी बेवकूफी
उन्होंने
कभी नहीं देखी थी
बत्ती जला कर सोयी थी
क्यूं तुमने अपनी नींद
गंवायी ?
क्यूं दिल की चाहत
पहले ना बतायी ?
अब मंगनी हो चुकी है
अगले महीने शादी है
निरंतर
जलती बत्तियों से
परेशान ना हुआ करो
हकीकत की दुनिया में
जिया करो
मोहब्बत करने से पहले
सामने वाले का दिल भी
टटोल लिया करो
21-10-2011
1682-89-10-11

दिल का दरवाज़ा, ज़हन के दरीचे खोल दो

दिल का दरवाज़ा
ज़हन के दरीचे खोल दो
हमें जाने बिना ही
हमसे नफरत ना करो
इतना तो याद रखो
चाँद अँधेरे में उगता है
कमल कीचड में खिलता है
सूरत पर ना जाया करो
सीरत भी देखा करो
हर चाहने वाले को
आशिक ना समझा करो
दिल से चाहने वालों की
कद्र किया करो
उन्हें भी गले से लगाया करो
© डा.राजेंद्र तेला,निरंतर
दरीचे =खिड़कियाँ
21-10-2011
1681-88-10-11

गुरुवार, 20 अक्तूबर 2011

सारे मौसम देख लिए

सारे मौसम देख लिए
अब किस मौसम का
इंतज़ार करूँ
बहारों को खिजा में
बदलते देखा
महकते फूलों को
मुरझाते देखा
अरमानों को
निरंतर टूटते देखा
रिश्तों का
सच जान लिया
हसरतें
दम तोड़ चुकी
देखने की
तमन्ना बची नहीं
अब और सहने की
ताकत भी नहीं
सारे मौसम देख लिए
अब किस मौसम का
इंतज़ार करूँ
© डा.राजेंद्र तेला,निरंतर
 
20-10-2011
1680-87-10-11

तुम्हारे अंदाज़ में अजीब सी कशिश थी


इस बार
तुम्हारे अंदाज़ में
अजीब सी कशिश थी
तुम्हारी
निगाहें फर्क थी
तुमसे मिल कर
कुछ मुझे भी होने लगा
जहन में
खुशनुमा अहसास
हुआ
दिल का धडकना
बढ़ गया
मन कहने लगा
थोड़ा सा आगे बढूँ
तुमसे इल्तजा करूँ
तुम्हारी रज़ा जान लूं
निशात-ऐ वस्ल को
यादगार बना लूं
निरंतर
दिल में पल रही
उम्मीदों को मुकाम दूं
(निशात-ऐ वस्ल =मिलन की खुशी)
20-10-2011
1679-86-10-11