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शनिवार, 15 अक्तूबर 2011

अब हसरतों से मन भर गया


अब हसरतों से मन
भर गया
उम्मीदों का सिलसला
टूट गया
निरंतर नाकामियों से
पीछा छूट गया
जो मिलना था सो
मिल गया
दिल को दर्द से
निजात मिल जाए
सुकून से सो सकूँ
नींद बरसों की पूरी
कर लूं
जीने का मकसद
हो गया
15-10-2011
1659-67-10-11

उन्हें कौन किनारे कौन लगाएगा ?

जिनके
दिल ज़ख्मों से भरे
वो  हमदर्दी जताते हैं 
खुद की कश्ती
मंझधार में फंसी है 
हमें तैरना सिखाते हैं 
हमारे प्यार का
तमाशा बनाते हैं 
खुद दो कदम
साथ ना चल सके
हमें साथ चलने की
नसीहत देते हैं 
हम तो फिर भी सुन लेंगे
उनका कहा कर लेंगे
उन्हें कौन किनारे कौन
लगाएगा ?
जो ग़मगीन रहते हैं
दूसरों की सोचते रहते हैं
डा.राजेंद्र तेला,निरंतर 
15-10-2011
1658-66-10-११
डा.राजेंद्र तेला,निरंतर 
दर्द,मोहब्बत,गम,शायरी,

शोख अंदाज़ अब मायूसी में बदल गया


ज़ख्म खाना
रोज़ का काम हो गया
भरी दोपहर अन्धेरा
छा गया
रात दिन में फर्क

करना  मुश्किल हो गया
सहना आदत में
शुमार हो गया
सब्र अब मरहम
बन गया
निरंतर बेबसी में

जीना
मजबूरी बन गया
शोख अंदाज़
अब मायूसी में

बदल गया
15-10-2011
1657-65-10-11

बहुत थक चुका हूँ


बहुत  थक चुका हूँ
हालात से आजिज़
आ चुका हूँ
नाकामाबियों से
घबरा गया हूँ
अब खुदा से इल्तजा 
करता हूँ
मोहब्बत का मतलब
बदल दे
 उसका नाम ज़िन्दगी
भर का रोना कर दे
निरंतर
मर मर कर जीना
मतलब कर दे
15-10-2011
1656-64-10-11

माना की तुमने जिद ठान ली


माना की तुमने 
हाँ नहीं भरने की
जिद ठान ली

मेरी दुआओं की
तासीर भी कम नहीं
बड़ी शिद्दत से 
खुदा से माँगी है
ईमान से 
इबादत करी है
कोई वजह नहीं खुदा
दुआ कबूल ना करे
वो तुम्हारे जितना
जिद्दी भी तो नहीं
मोहब्बत से
यकीन भी उठा नहीं
देर से ही सही
इक दिन तुम हाँ करोगी
खुद आकर गले लगाओगी
हसरतों को मुकाम तक 
पहुँचाओगी 
दिल को राहत दोगी 
© डा.राजेंद्र तेला,निरंतर 

15-10-2011
1655-63-10-11

आज करवा चौथ हैं (हास्य कविता )


आज करवा चौथ हैं
तुम्हारी
लम्बी आयु के लिए
मेरा व्रत है
पत्नी ने पती को सवेरे ही
हुक्म सुना दिया
आज तुम्हें घर पर ही
रहना है
मेरे लिए हर घंटे चाय
खुद का खाना खुद
बनाना है
घर की सफायी तो
करनी ही है
पूजा का सामान भी
लाना है
पती सुनता रहा
फिर डरते डरते बोला
आज ज़रूरी काम है
कुछ घंटों के लिए दफ्तर
जाना है
पत्नी बिफर गयी
चिल्ला कर बोली
खबरदार जो जुबान खोली
ज़िंदा रहना है तो घर में
रहना पडेगा
निरंतर मेरा कहना
मानना होगा
सर दुखे तो दबाना होगा
कल से मेरा भी खाना
बनाना पडेगा
चपड़ चूँ करी तो थप्पड़
खाना पडेगा
मेरा व्रत तो टूटेगा
माफी नहीं मांगोगे
जब तक तुम्हें भी भूखा
रहना पडेगा 
15-10-2011
1654-62-10-11

जुबाँ तो कह ना सकी फिर भी तुम समझ गए


जुबाँ तो 
कह ना सकी 

फिर भी 
तुम समझ गए

हाल-ऐ दिल जान गए

मोहब्बत को मुकाम पर
पहुंचा गए
बिन कहे भी
एक दूजे की चाहत
बयाँ कर गए
निरंतर तड़पते रहे
जिस के खातिर
उन हसरतों को पूरा
कर गए

15-10-2011
1653-61-10-11

शुक्रवार, 14 अक्तूबर 2011

हँसमुखजी दुखी हो गए असलियत में रोने लगे (हास्य कविता)


हँसमुखजी के
निरंतर हँसने से सब मित्र,
रिश्तेदार विस्मित थे
हमेशा हँसने का कारण
पूछते थे
सवालों से परेशान हँसमुखजी
एक दिन बिना बात के
बुक्का फाड़ कर रोने लगे
मित्र,रिश्तेदार परेशान हो गए
सुबह से शाम उनसे कारण
पूछते रहे
और तो और शहर में
उनका रोना
चर्चा का विषय हो गया
घर आने वालों का
तांता लग गया
हर शख्श रोने का
कारण पूछने लगा
सवालों की बौछार से
हँसमुखजी परेशान हो गए
हाथ जोड़ कर
कोई कारण नहीं है ,
बार बार कहने लगे
पर कोई सुनने ,
मानने को तैयार ना था
पानी सर से गुजर गया
हँसमुखजी दुखी हो गए
असलियत में रोने लगे
साथ ही चिल्ला कर कहने लगे
मेरी बात पर विश्वास करो
पहले मज़ाक में हँस रहा था
अब सवालों से
दुखी हो कर रो रहा हूँ
और सवाल करोगे तो
फिर कभी नहीं हँस पाऊंगा
नाम भी बदल कर हँसमुखजी
की जगह रोतामुख
रख लूंगा
14-10-2011
1647-55-10-11

माँ का प्यार नहीं बिकता


दुनिया के बाज़ार में
हर माल मिलता
इज्ज़त से ईमान तक
हर चीज़ का सौदा होता
खरीददार भी मिलता
बेचने वाला भी मिलता
बिकता नहीं तो सिर्फ
माँ का प्यार नहीं बिकता
बिना धन दौलत
हर इंसान को 
मुफ्त में मिलता
किस्मत वाला प्यार का
जवाब प्यार से देता
बदकिस्मत इस की
कीमत नहीं समझता
उसका
फैसला खुदा करता
उसके  कुफ्र को सहना
पड़ता
14-10-2011
1652-60-10-11

अपने खून से सीचा जिन्हें


खुदा का इन्साफ
समझ नहीं पाता
किस्मत के निराले
खेल का कारण
ढूंढता रहता
अपने खून से सीचा
जिन्हें
क्यों माँ बाप से दूर
होते जाते ?
देखे थे हसीं सपने
जिनके लिए
क्यूं अब रुलाते ?
जिन्हें समझते थे
रहनुमा अपना
क्यों उनसे ही डरना
पड़ता
क्यूं माँ बाप को अनचाहा 
बोझ समझा जाता
सोते नहीं थे जिनकी
खैरियत के खातिर
उनके व्यवहार को
याद कर
अब रात भर रो रो कर
जागना पड़ता
14-10-2011
1651-59-10-11

कुछ दिनों की ज़िन्दगी


कुछ दिनों की

ज़िन्दगी में
क्या क्या नहीं भरा
कुछ से प्यार
कुछ की यादें
कुछ से डर
कुछ से नफरत
हर मंज़र
हर राज़ इसमें छुपा
खुशी गम 
साथ साथ चलता
इंतज़ार
हर जान को रहता
हर इंसान
उम्मीद में जीता
निरंतर ज़िन्दगी से
तौबा करता
जीने की चाहत
फिर भी रखता

14-10-2011
1650-58-10-11

चेहरे पर चेहरे चढ़ा कर घूमते हैं चेहरे

चेहरे पर चेहरे 
चढ़ा कर घूमते हैं चेहरे

वक़्त,जरूरत के साथ

बदलते हैं चेहरे

हर चेहरे के अनेकानेक
चेहरे
एक खुद के लिए
एक परिवार के लिए
दोस्त,रिश्तेदारों के लिए
फर्क होते हैं चेहरे
निरंतर
मिजाज़ बदलते हैं चेहरे
अनजान के लिए
सबसे बेहतर दिखते हैं
चेहरे
सच ईमान की मूर्ती
नज़र आते हैं चेहरे
चिकनी चुपड़ी बातों से
भरे होते हैं चेहरे
कौन सा असली ?
कौन सा नकली ?
पहचान में
आते नहीं चेहरे

किसी को नहीं बख्शते

चेहरे पर चेहरे
निरंतर
लुभाते भरमाते हैं
चेहरे
14-10-2011
1649-57-10-11

उनका अचानक अद्रश्य हो जाना


उनका अचानक
अद्रश्य हो जाना
मन में कौतुहल पैदा
करता
कई विचारों को
जन्म देता
क्या रूठ गए हैं ?
पर मन इस बात को
नहीं मानता
क्या व्यथित हैं ?
स्वयं से प्रश्न करता
चिंता से उद्वेलित होता
रहता
विचारों का मंथन
चलता रहता
निरंतर कारण ढूंढता
रहता
प्रश्न का उत्तर नहीं
मिलता
इस दुविधा में
स्वयं भी व्यथित होता
जब तक उन्हें हंसता
मुस्काराता ना देख ले
संतुष्ट नहीं होता

13-10-2011
1642-50-10-11