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शनिवार, 24 सितंबर 2011

हँसमुखजी को क्रिकेट खेलने का शौक चढ़ा (हास्य कविता)

हँसमुखजी को
क्रिकेट खेलने का
शौक चढ़ा
फ़ौरन मैदान पर
पहुँच गए
लगे बैटिंग करने
पहली गेंद कमर पर लगी
मुंह से चीख निकली
दूसरी गेंद कंधे पर लगी
मुंह से
हाय अम्मा निकला
तीसरी गेंद हाथ पर लगी
मुंह से जोर की आह निकली
चौथी गेंद मुंह पर लगी
मुंह से तेरे ऐसी की तैसी
निकला
जोश में नथुने फुलाते हुए
मदहोश सांड की चाल में
बौलर के पास पहुँच गए
हाँफते हुए धीमी आवाज़ में बोले
अबे आऊट नहीं कर सका तो
मुंह बंद करवाना चाहता है
तूं बौल मार कर निरंतर
खुद को हीरो समझ रहा था
ले बैट की मार खा
हीरो से विलेन बनाता हूँ
सारी हीरो गिरी निकालता हूँ
बल्ले से वार करते
उससे पहले ही खुद दर्द से
बिलबिलाते हुए
चक्कर खाकर गिर गए
विलेन बनाते बनाते
कॉमेडियन का रोल
कर गए
24-09-2011
1551-122-09-11

शुक्रवार, 23 सितंबर 2011

जाने से अनजाने अच्छे

जाने  से
अनजाने अच्छे
देख कर मुस्काराते हैं  
ना शक रखते हैं 
ना कयास लगाते हैं 
ना खार खाते
ना मतलब ढूंढते हैं 
दिल की बात 
ध्यान से सुनतेहैं 
तहजीब से
पेश आते हैं 
ना उम्मीद करते हैं 
ना उम्मीद देते हैं 
खुशनुमा बातों से
होंसला बढाते हैं 
कुछ लम्हों के लिए
ही सही
दिल को सुकून देते हैं 
जाने  से
अनजाने अच्छे
© डा.राजेंद्र तेला,निरंतर
23-09-2011
1550-121-09-11

कुछ लोग छिप कर मुस्काराते

कुछ लोग
छिप कर मुस्काराते हैं 
अकेले में याद करते हैं 
ख़्वाबों में खोते हैं खुद भी तड़पते
चाहने वालों को भी
तड़पाते हैं 
ना जाने किस बात से 
शरमाते हैं ?
क्यों इतना घबराते हैं ?
ज़ज्बात को छिपाते हैं 
कोई समझाए उन्हें
क्यों दर्द-ऐ-दिल
बढाते हैं  ?
डा.राजेंद्र तेला,निरंतर
23-09-2011
1549-120-09-11

कोई मेरे पंख लगा दे

कोई मेरे
पंख लगा दे
मुझे उड़ना सिखा दे
सपनों की दुनिया से
यथार्थ की दुनिया में
पहुंचा दे
मेरा भ्रम मिटा दे
मुझे सत्य से अवगत
करा दे
उद्वेलित ह्रदय को
प्रेम से भर दे
उदिग्न मन को
शांत कर दे
निरंतर चैन से
जीने दे
कोई मेरे
पंख लगा दे
मुझे उड़ना सिखा दे
23-09-2011
1548-119-09-11

गुरुवार, 22 सितंबर 2011

तमन्ना जो भी की हमने

तमन्ना जो भी की हमने
वो नहीं मिला हमें
जो भी मिला तमन्ना से
कम नहीं मिला हमें
जिन्हें चाहा था साथ
ज़िन्दगी भर निभाएं हमारा
छोड़ गए वक़्त से पहले हमें
गिला इसका तो ज़रूर हमें  
पर जो भी बिन मांगे मिला
उसने भी रखा खुश हमें
ख्वाईशें निरंतर बढ़ रहीं
पूरी ना होंगी ,है पता हमें
जो मिलेगा होगा मंज़ूर हमें
जाना होगा दुनिया से जब  
ना होगा गम ना खुशी हमें
मान कर फैसला खुदा का
चुपचाप चले जायेंगे हम
इल्तजा कर के जायेंगे
कोई याद ना रखे हमें
22-09-2011
1544-115-09-11

अब आप रहते बहुत व्यस्त

अब आप रहते
बहुत व्यस्त
हमारे लिए
कहा हैं वक़्त
हमें फुरसत ही
फुरसत
कभी हम भी
होते थे व्यस्त
इर्द गिर्द लोगों से
घिरे होते थे
वक़्त की मेहरबानी
आज बिलकुल
ठाले हैं
खुदा पर यकीन
हमको
कभी हम होंगे
फिर से व्यस्त
और आप ठाले
पर आपको ठाले
ना बैठने देंगे
मुश्किलों में
निरंतर साथ देंगे
नफरत का जवाब
मोहब्बत से देंगे
22-09-2011
1543-114-09-11

टूटे हुए मंज़र

दिन भर 
इंतज़ार में
डूबे रहते
आँखों में हसरत के
टूटे हुए मंज़र होते
शाम तक बुझे हुए
चिराग सा दिखते
ग़मों के बोझ
सोने भी ना देते
रात भर सुबह का
इंतज़ार करते
यूँ ही ज़िन्दगी
तमाम करते
 डा.राजेंद्र तेला, निरंतर,
22-09-2011
1542-113-09-11

दिल के मेहमाँ

मेरे अखलाक का
तकाजा नहीं कहता
घर आये को लौटा दूँ 
दुश्मन ही क्यूँ ना हो 
गले से ना लगा लूँ
मेहमाँ हो 
दिल रोशन जिस से
उस शमा को
कैसे भूल जाऊँ?
हर लम्हा जिया 
तुम्हारे खातिर
तुम्हें भूल कर
मौत को 
कैसे गले लगा लूँ?
डा.राजेंद्र तेला, निरंतर,
(अखलाक=सदभावना,सदाचार)
22-09-2011
1541-112-09-11

आदत खराब कर दी उन्होंने

तूफ़ान बन कर
आये ज़िन्दगी में
बहा कर साथ ले गए
उसी में
एक फुलझड़ी
जला दी उन्होंने
दीपावली से पहले
दीपावली मना दी
उन्होंने 
उम्मीदें जगा दी
उन्होंने
निरंतर इंतज़ार
सिखा दिया उन्होंने
मिलने की चाहत
बढ़ा दी उन्होंने
ग़मों को भुलाया
उन्होंने
रोते से हंसाया
उन्होंने
हंस कर जीना
सिखाया उन्होंने
आदत खराब
कर दी उन्होंने
22-09-2011
1540-111-09-11

एक आवाज़ ने कानों को स्पर्श किया

एक आवाज़ ने
कानों को स्पर्श किया
मन में 
सुखद आभास हुआ
ह्रदय में अपनत्व का
संचार हुआ
निरंतर शून्यता में
स्पंदन हुआ
लगा कोई अपना फिर
लौट आया
एक पवित्र रिश्ते का
शुभागमन हुआ
बिछडों का मिलन
हुआ
22-09-2011
1539-110-09-11

बुधवार, 21 सितंबर 2011

कब ऋतु बदलेगी

कब ऋतु बदलेगी
नफरत की आंधी
रुकेगी
बदले की अग्नी
भुजेगी
शस्त्रों की पूजा
बंद होगी
धरती रक्त से लाल
ना होगी
रिश्तों की होली नहीं
जलायी जायेगी
प्यार भाईचारे की
दीपावली आयेगी
निरंतर प्रेम की हवा
बहेगी
इंसान के जीवन में
खुशी होगी
डा.राजेंद्र तेला,निरंतर
21-09-2011
1538-109-09-11

हमें देख कर मुस्कारायेंगे

ना नज़रें मिलाते
ना देख कर मुस्कराते
निरंतर
चेहरा अपना छुपाते
खामोशी से निकल जाते
निरंतर सवालों के
घेरे में छोड़ जाते
उनकी बेरुखी
हम समझ ना सके 
इतने खुदगर्ज़ होंगे
ये भी ना मानते
उनकी भी होगी
कोई मजबूरी
हमें यकीन खुदा पर
इक दिन ये फासला
कम होगा
पाक रिश्तों के
दामन पर
कोई दाग ना होगा
वो चेहरा फिर से
दिखाएँगे
हमें देख कर
मुस्कारायेंगे
21-09-2011
1537-108-09-11

हँसमुखजी पत्नी व्रत थे ( हास्य कविता)

हँसमुखजी पत्नी व्रत थे
पत्नी के हिस्से के
सारे काम करते थे
कपडे से
बर्तन तक धोते थे
पत्नी भी
पूर्ण पतीव्रता थी
पत्नी धर्म
श्रद्धा से निभाती थी
रात
कितनी भी हो जाए
ठण्ड
कितनी भी बढ़ जाए
बर्तन धोने के लिए
निरंतर गरम पानी
तैयार रखती थी
जब तक
पूरे ना धुल जाएँ
ना खुद सोती ना
उन्हें सोने देती
रजाई में घुस कर
होंसला बढाती
थक जाओ तो दो कप
चाय बना लेना
पहले मुझे पिला देना
फिर खुद पी लेना
नहीं थको तो आकर
मेरे पैर दबा देना
कह कर पत्नी धर्म
निभाती थी
21-09-2011
1536-107-09-11

ना जाने कौन सा इम्तहान लेते हैं ?

बहुत तड़पाते
निरंतर
इंतज़ार कराते
वक़्त की सुइयों को
ठहरा देते
बादल सा कड़कते
मगर खुल कर
बरसते नहीं
ना जाने किस बात की
सज़ा देते हैं
वो कमज़ोरी हमारी
ये भी वो जानते हैं
उनके बिना
हम रह ना पाते
ना जाने कौन सा
इम्तहान लेते हैं ?
क्यूं रुला रुला के
हँसाते हैं ?
21-09-2011
1535-106-09-11