ADVERTISEMENT

Bookmark and Share

Register To Recieve Latest Poems On Your Email or Mobile

Enter your email address:

Click Here To Subscribe On Mobile Bookmark and Share

शनिवार, 17 सितंबर 2011

तूँ रात खडी थी छत पे (हास्य कविता)

हँसमुखजी
घर की छत पर खड़े थे
नीचे सड़क पर
एक खूबसूरत बला को
जाते देखा
तो चंचल मन मचल पडा
ऊंची आवाज़ में
मुंह से  निकल पडा
तूँ रात खडी थी छत पे
मैंने समझा की चाँद
निकला
दूर खड़े अबला के
पहलवान भाई के
कान में पडा
वो भी चिल्ला कर
गाने लगा
तूँ छत से नीचे आजा
पूनम के चाँद को
अमावस का बना दूंगा
थोबड़े को चाँद के
धरातल  में बदल दूंगा
बाल काट कर गंजा
कर दूंगा 
आने वाली पुश्तों के भी
बाल नहीं होंगे
चेहरा देख कर
हर आदमी को निरंतर
हंसने पर मजबूर
कर दूंगा
17-09-2011
1519-90-09-11

ढूंढता रहता हूँ

हर दिन नया
चाँद निकलता है
अपनी रोशनी से
मुझे नहलाता है
मैं सोचने लगता हूँ
अब हर पल
रोशनी में डूबा रहूँगा
बरसों के अँधेरे से
बाहर निकल जाऊंगा
खुशी के कुछ पल भी
देख नहीं पाता
ठीक से मुस्करा भी
नहीं पाता
पूर्णिमा का चाँद
अमावस का बन जाता
अन्धेरा मुझे फिर से
ढक लेता है
निरंतर नए चाँद की
तलाश में
मैं सदा की तरह
भटकता रहता हूँ
आशाओं के समुद्र में
चैन की सीपियों को
ढूंढता रहता हूँ
17-09-2011
1518-89-09-11

किसे व्यथा ह्रदय की सुनाऊ ? कैसे पीड़ा मन की बताऊँ ?

किसे ह्रदय की
 व्यथा सुनाऊ ?
कैसे मन की
पीड़ा बताऊँ ?
कौन  मानेगा ?
कौन विश्वाश करेगा
?
जब अपने ही

पराया समझने लगे

कसूरवार बताने लगे 
किसी और से 

आशा  क्या करूँ ?
अब दोस्त दुश्मन

एक हो गए

पल पल वार कर रहे

कैसे अपने को 
बचाऊँ ?
किसे ह्रदय की
 व्यथा सुनाऊ ?
कैसे मन की
पीड़ा बताऊँ ?
डा.राजेंद्र तेला, निरंतर, 
17-09-2011
1517-88-09-11

एक अभिनेत्री को हो गया बाबा हँसमुखजी से प्यार (हास्य कविता)

एक अभिनेत्री को
हो गया
बाबा हँसमुखजी से प्यार
उसने खुले आम कर दिया
ऐलान
विवाह उनसे ही करूंगी
पीछा नहीं छोडूंगी
बाबा हंसमुखजी हुए 
परेशान
भेष बदल कर पहुँच गए
अभिनेत्री के घर
बहन मेरे राखी बांधों
भैया मुझे बना लो
निरंतर रक्षा तुम्हारी
करूंगा
अच्छा सा वर भी 
ला दूंगा
अभिनेत्री थी बड़ी पटाखा
तुरंत बाबा से बोली ,
मैंने तुम्हें पहचान लिया 
बाबा हँसमुख दास
राखी तो बांधूंगी
पीछा फिर भी ना 
छोडूंगी
शादी तुमसे ही करूंगी
पहले भी मैंने
भाई बनाए हज़ार
बहुतों से किया
बीबी जैसा प्यार
मन भर गया तो ,
कर दिया 
लात मार कर बाहर
अब तुम पर दिल 
आया है
विवाह तुम्ही से 
रचाना है
यह सुन कर हो गयी
बाबा हँसमुख दास की
सिट्टी पिट्टी गुम
तेज़ी से भाग लिए
बचा कर अपनी दुम
अभिनेत्री के नाम से भी
 डरते हैं
भरी गर्मी में भी 
थर थर कांपते हैं
बाबा का चोला 
फैंक दिया
चले गए बहुत दूर
अब ठान लिया है ,
नहीं करेंगे शादी
करे कितना भी कोई
मजबूर 
17-09-2011
1516-87-09-11

शुक्रवार, 16 सितंबर 2011

सपने ,सपने ही रह जाते

हर रात सपने आते  हैं 
नए पुराने चेहरे दिखते हैं 
कुछ हँसाते कुछ रुलाते हैं 
कुछ धुंधले हो जाते हैं 
कुछ सुबह तक याद रहते हैं 
मन को तडपाते हैं 
दिल को रुलाते हैं 
निरंतर जहन में रहते हैं 
फिर दिख जाएँ
उम्मीद में रात का
इंतज़ार करते हैं 
दिल दुखाने को 
सपने
सपने ही रह जाते हैं 
डा.राजेंद्र तेला, निरंतर,
16-09-2011
1515-86-09-11

चाँद किस का सूरज किस का

चाँद किस का
सूरज किस का
धरती  के हर भाग को
उजाले से भरते
आकाश किस का
बादल किस के
आज यहाँ
कल वहां बरसते
वायु,अग्नी पर नहीं
आधिपत्य किसी का
पंछी देश देश में
विचरण करते
फिर झगडा झंझट
किस बात का
धरती के टुकड़े के लिए
सेनाएँ आपस में
क्यों लडती
निरंतर मार काट
दुनिया में होती
मनुष्य के
अहम् स्वार्थ की
कोई सीमा नहीं होती
उसे संतुष्टी
कभी नहीं मिलती
डा.राजेंद्र तेला, निरंतर, 
16-09-2011
1514-85-09-11     

कल रात उनसे गुफ्तगू हो गयी

ना जान पहचान थी
ना मुलाक़ात थी
फिर भी कल रात
उनसे गुफ्तगू हो गयी
ज़िन्दगी में
नयी शुरुआत हुयी
उनका अचानक
मिलना
नियामत हो गयी
हँस, हँस कर
उनसे बात हुयी
कुछ मन की
कुछ दिल की
सांझा हुयी
निरंतर ठहरी हुयी
ज़िन्दगी में हलचल
हुयी
दिल को खुशी
मन को तृप्ति हुयी
कल रात उनसे
   गुफ्तगू हो गयी  
16-09-2011
1513-84-09-11

कबाड़ी को बेच दो(हास्य कविता)

 हँसमुखजी की पत्नी
उनके तकिया कलाम  से बहुत दुखी थी
हर बात पर कहते कबाड़ी को बेच दो
अगर शिकायत करती
बच्चे शैतानी बहुत करते हैं 
जवाब में कहते थे ,
कबाड़ी को बेच दो
आज अखबार नहीं आया
जवाब होता अखबार वाले को
 कबाड़ी को बेच दो
एक दिन हँसमुखजी दफ्तर में
 काम के बोझ से परेशान होकर आये
आते ही पत्नी से बोले
काम से दिमाग खराब हो गया है
एक कप चाय पिला दो
जली भुनी पत्नी
मौके की तलाश में थी
फ़ौरन बोली ,कबाड़ी को बेच दो
हँसमुखजी का पौरुष जाग गया
असली रूप उजागर हुआ
भन्नाते हुए बोले बेच दूंगा ,
बहुत होशियार बनती हो
यह भी बता दो, नया कहाँ मिलेगा
पत्नी लोहा लेने के लिए पूरी तरह तैयार थी
फ़ौरन अग्नी बाण दाग दिया
नया खरीद भी लोगे
तो तुम्हारे थर्ड क्लास शरीर में आते ही
अच्छा खासा दिमाग भी खराब हो जाएगा
तुम्हें तो कोई कबाड़ी भी नहीं खरीदेगा
गलती से खरीद भी लिया तो
धंधा चौपट करवाएगा
कबाड़ की कीमत तो होती है
तुम्हें लेने के लिए
तो पैसे भी मांगेगा
16-09-2011
1512-83-09-11

व्यक्तित्व के सृजन में जीवन लग जाता

सृजन में
जीवन लग जाता 
क्रोध का
ग्रहण लगते ही
पल में नाश होता
दंभ विचारों को
भयावह बनाता
अहम् मनुष्य को
रसातल पहुंचाता
निरंतर हँसते को
रुलाता
जीवन नारकीय
हो जाता
चैन भाग्य से
रूठ जाता
15-09-2011
1511-82-09-11

गुरुवार, 15 सितंबर 2011

हँसमुखजी कंगाल हो गए (हास्य कविता)

वक़्त की मार से
हँसमुखजी कंगाल
हो गए
मांग कर गुजारा
करने लगे
दो दिन भीख में
एक पैसा नहीं मिला
भूख से बिलबिलाने लगे
पैसे कमाने के
नए तरीके ढूँढने लगे
सीधे थाने पहुँच गए
गैंडे जैसे रिश्वत भख्शी 
थानेदार से कहने लगे
या तो हज़ार रूपये मांगो
नहीं तो
पांच सौ रूपये दे दो
थानेदार ने मोटी
गर्दन को ऊपर किया
हँसमुख जी को
बालों से पकड़ कर
अपनी तरफ खींच लिया
 
फिर सवाल किया
कौन है तूँ ?
क्या कह रहा है
मुझे समझ नहीं आ रहा है
मुझ से पैसे मांग भी रहा
देने को भी कह रहा
घिघियाते हुए
हँसमुख जी बोले
भिखमंगा हूँ
पैसे दे दोगे तो
चार पांच दिन आराम से
काट लूंगा
नहीं दोगे तो, आप मुझ से
रिश्वत मांग रहे हो
शोर मचा दूंगा
आप आग बबूला हो कर 
मुझे अन्दर बंद कर दोगे
आराम से खाने को मिलेगा
काम भी नहीं करना पडेगा
आपकी जोकर जैसी
शक्ल देख कर हँसता रहूँगा
चार पांच दिन
आराम से काटूंगा
15-09-2011
1510-81-09-11

क्यूं ख्वाब देखता हूँ ?

क्यूं ख्वाब देखता हूँ ? 
बार बार दिल तोड़ता हूँ
हर बार चोट खाता हूँ
आदत से मजबूर हूँ
हंसने की कोशिश में
निरंतर रोता हूँ
हिम्मत नहीं खोता हूँ
उम्मीद फिर भी
रखता हूँ
कभी तो किस्मत
साथ देगी
यही सोच कर जीता हूँ
फिर से हंसने की
कोशिश करता हूँ 
15-09-2011
1509-80-09-11

आज दिल टूट गया

आज दिल टूट गया
जिन के लिए जिया
उन्होंने दुत्कार दिया
बड़ी शिद्दत से देखे
ख़्वाबों को तोड़ दिया
निरंतर हँसते हुए को
रुला दिया
नाकामयाबी के
मुकाम पर पहुंचा दिया
ज़िन्दगी की
हक़ीक़तों से वाकिफ
करा दिया
फिर से शुरुआत का
मौक़ा दे दिया
मरने से पहले
नया काम दे दिया
15-09-2011
1508-80-09-11

थोड़े में जीना होगा



अनगिनत
इच्छाएं रखता था
निरंतर
सपने बुनता था
इच्छाओं पर
नियंत्रण ना था
एक पूरी होती
दूसरी के 
लिए रोता था
सदा 
असंतुष्ट रहता था
उसे पता नहीं था
चैन रेगिस्तान में
सामान होता है
मृग सा मन खोज में
भटकता रहता है
निरंतर अतृप्त रहता है
समझ नहीं पाया
चैन पाना है तो 
मन मष्तिष्क को
वश में रखना होगा
संतुष्टी को
 उद्देश्य बनाना होगा
जीवन को
सादा बनाना होगा
थोड़े में जीना होगा
डा.राजेंद्र तेला,निरंतर
15-09-2011
1507-79-09-11

बुधवार, 14 सितंबर 2011

कल रात फिर सुबह हो गयी

कल रात फिर सुबह
हो गयी
वो सपने में दिख गयी
खिजा में बहार
लौट आयी 
निरंतर उदास चेहरे पर
रौनक आ गयी
हसरतें फिर जाग गयी
दिल की उम्मीदें परवान
चढ़ने लगी 
ठहरी हुयी ज़िन्दगी में
रवानी आ गयी
मंजिल फिर से नज़र
आने लगी
उनकी याद फिर से
सताने लगी
14-09-2011
1506-78-09-11

मुझे खुशी से विदा कर दो , हँसते हुए जाने दो

ना मेरे साथ रोओ
ना मेरे साथ हँसो
मुझे साथ रोने दो
हँसी में साथ हँसने दो
जो ले सको मुझ से
ले लो
तुम मुझे कुछ ना दो
निरंतर मन में पल रही
नफरत से मुक्त कर दो
थोड़ा सा प्यार दे दो
जाते समय ह्रदय में
बोझ ना रहे
इतना सा अहसान
मुझ पर कर दो
मुझे खुशी से विदा
कर दो
हँसते हुए जाने दो
14-09-2011
1505-77-09-11