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शनिवार, 27 अगस्त 2011

हँसमुखजी ने पत्नी को एक गुड्डा भेंट किया(व्यंग्य)

(व्यंग्य )

विवाह की
पंचासवी वर्ष गाँठ पर
हँसमुखजी ने पत्नी को
एक गुड्डा भेंट किया
छ बच्चों से मन नहीं भरा
पत्नी ने बिफर कर
सवाल दाग दिया
हँसमुखजी ने जवाब दिया
अरे भागवान
ये गुड्डा हर बात सुनेगा
क्रोध नहीं करेगा
ना ही अपशब्द कहेगा
कुछ नहीं मांगेगा
तुम्हारे प्यार को नाटक
नहीं कहेगा
जो बच्चों ने नहीं दिया
ये गुड्डा तुम्हें देगा
आंसू तो नहीं पौंछेगा
पर रुलाएगा भी नहीं
सम्मान तो
कर नहीं सकता
पर निरंतर चुप रह कर
बुढापे में 
हम दोनों के मन की
व्यथा को कम करेगा
27-08-2011
11407-129-08-11

व्यंग्य 

डा.राजेंद्र तेला,निरंतर 

अब फैसला कीजिए

पानी सर से ना
गुजर जाए
तुम्हारी मोहब्बत में
इतने ना डूब जाएँ 
फिर उबर ही ना सकें
उस से पहले
फैसला कीजिये
या तो हाँ कीजिए,
अपना पता बताइए
पैगाम भिजवाइए
कुछ गुफ्तगू कीजिए
या फिर ना कहिए
ख्वाइशों को खामोश
कीजिए
कोई और मुकाम
तलाश करने दीजिए
कुछ तो कीजिए
अब और ना तरसाइए
निरंतर यूँ ना सताइए
अब फैसला कीजिए
27-08-2011
11406-128-08-11

E

आज तुम्हारा चेहरा नज़र नहीं आया

आज तुम्हारा चेहरा
नज़र नहीं आया
पता नहीं क्यों
तुमने इतना तरसाया
दिन भर इंतज़ार
करता रहा
ज़रा सी आहट पर
दरवाज़े तक
दौड़ लगाता रहा
गली के
आखिरी छोर तक
व्याकुल निगाहों से
ढूंढता रहा
निरंतर बेचैनी में
सोचता रहा
तुम्हारी खैरियत की
दुआ करता रहा
कल नज़र आओगे
उम्मीद  करता रहा
27-08-2011
1405-127-08-11

मेरा मौन भी कुछ कह रहा है

मेरा मौन
भी कुछ कह रहा है
मन मष्तिष्क में
विचारों का घमासान
दर्शा  रहा है
निरंकुश शासन का
व्यवहार बता रहा है
देश भक्तों के दुःख को
दिखा रहा है
प्रजातंत्र का अर्थ
खोज रहा है
स्वतंत्रता की कीमत
चुका रहा है
व्यवस्था  का मज़ाक
उड़ा रहा है
प्रतिरोध में उफन
रहा है
मेरा मौन भी कुछ
कह रहा है

27-08-2011
1404-126-08-11
डा.राजेंद्र तेला.निरंतर 
E

ऐसे नेताओं से डाकू अच्छे

हँसमुखजी मशहूर डाकू थे
लाखों का इनाम
सर पर लिए घूमते थे
एक नेता की बातों में आ गए
हथियार डाल दिए
सज़ा काट कर बाहर आये
नेताजी की चिकनी चुपड़ी
गिरगिटी बातों में फँस गए
देश सेवा के लिए
उनकी पार्टी में शामिल हो गए
थोड़े दिनों में नेताओं को
असली रूप उजगार हुआ
डाकुओं से भी बदतर
आचरण देख कर
हैरान,परेशान हो गए
फिर से डाकू बन गए
एक पत्रकार के पूछने पर
क्यूँ फिर से डाकू बने ?
व्यथा सुनाने लगे
जिनका ना धर्म ना ईमान हो
गरीब को भी लूट ले
भूखे की रोटी छीन ले
सफ़ेद कपडे में छुपे नाग
जो अपनों को भी डँस ले
निरंतर सच से परहेज रखे
खुद की बात का खुद भी
विश्वास ना करे
ऐसे नेताओं से डाकू अच्छे
इस लिए वे फिर से
डाकू बने
27-08-2011
11403-125-08-11

अन्ना को ज़िंदा रखना है देश के लिए

चुल्लू  भर
पानी भी ज्यादा है
इनके डूबने के लिए
आत्मा इनकी मर चुकी
जुबां पर लगाम नहीं
इंसान के रूप में
शैतान हैं ये 
गिरगिट भी शर्माए
उनके रंग बदलने से
निरंतर सत्ता के लालच में
धर्म, ईमान सब भूल गए
भ्रष्टाचार में ऊपर से
नीचे तक डूबे हैं ये
नेता नहीं
देश के लिए कलंक हैं ये
जवाब इनको देना है
बहिष्कार इनका करना है
अन्ना को ज़िंदा रखना है
देश के लिए
27-08-2011
11402-124-08-11

शुक्रवार, 26 अगस्त 2011

खवाबों में मिलता रहूँगा

वो दिल ही क्या
जो तुम्हें देखने की
दुआ ना करे
जहन में तस्वीर
जिसकी बसायी
उस से मिलने की
ख्वाइश ना रखे 
सिर्फ तस्वीर देखी
तुम्हारी
रूबरू ना देखूं
ये मुमकिन नहीं
मिलने की कोशिश
जारी रहेगी
तुम्हारी रज़ा ना होगी 
तब तक खवाबों में 
मिलता रहूँगा
खुदा से 
दुआ करता रहूँगा 
डा.राजेंद्र तेला,निरंतर 
26-08-2011
11401-123-08-11

क्या वो भी चोट खाए हैं ?

कभी रोज़ बात 
करते हैं
कभी झलक भी 
नहीं दिखाते
दिनों तक 
खामोश रहते हैं
क्या चाहते हैं ?
कुछ नहीं बताते 
निरंतर 
पहेली से लगते हैं
क्या वो भी चोट खाए हैं ?
बहुत सताए गए हैं ?
डर डर कर जीते हैं
कदम उठाने से पहले
बार बार सोचते हैं
क्या ढूध के जले हैं
छाछ को भी
फूँक कर पीते हैं
डा.राजेंद्र तेला,निरंतर 
26-08-2011
1400-122-08-11
E

जो चाहा किसे मिला अब तक ?

किसे मिला अब तक ?
जो भी मिला
अधूरा लगा अंत तक
ख्वाइश की चाहत में
क्या नहीं किया उसने
हर मुस्काराहट को
हकीकत समझा उसने
रोशनी की
हर किरण को निरंतर
मुकाम समझा उसने
उम्मीद में हसरतों को
जगाये रखा उसने 
डा.राजेंद्र तेला,निरंतर  
26-08-2011
1399-121-08-11

ख्याल कुलांचें भरने लगे


दो लफ्ज तारीफ़ के
क्या लिख दिए उन्होंने 
हसरतें
अंगडाई लेने लगी
दिल मचलने लगा 
 ख्याल 
कुलांचें भरने लगे
भटके को रास्ता 
सपनों को 
मुकाम मिल गया 
ये भी ना पूंछा उनसे 
तारीफ़ से क्या
मतलब  था उनका ?
डा.राजेंद्र तेला,निरंतर 
26-08-2011
1398-120-08-११
तारीफ़,मोहब्बत,हसरतें

जो आज हुआ पहले भी कई बार हुआ

जो आज हुआ
पहले भी कई बार हुआ
जो चाहा
वो मिल ना सका
न हताश हुआ 
ना निराश हुआ
कोशिश में लगा रहा
निरंतर यकीन में
जीता रहा
उम्मीद में चलता रहा
कभी तो कुछ ऐसा होगा
जो पहले ना हो सका
जो भी अब होगा 
अच्छा होगा
सोच कर जीता रहा 
डा.राजेंद्र तेला,निरंतर 
26-08-2011
1396-118-08-11

डा.राजेंद्र तेला,निरंतर 

किधर जाऊं ?


इधर उधर
भटक रहा था
हसरतों के चौराहे पर 
खडा था
किधर जाऊं ?
समझ नहीं आ रहा था
उम्मीद की
गर्मी में झुलस रहा था
महक भरी ठंडी हवा का
झोंका आया
सामने देखा तो 
बरसों से तरस रहा था 
जिसके खातिर
वो चेहरा नज़र आ गया 
सोये हुए अरमानों को 
जगाया
मुझे मेरी मंजिल का 
पता चल गया 
26-08-2011
1395-117-08-11
E

गुरुवार, 25 अगस्त 2011

ख्याल हर मन में आते

ख्याल
हर मन में आते
निरंतर
नयी इच्छाएं जगाते
सपनों की
दुनिया में पहुंचाते
कुछ पूरे,
कुछ अधूरे रह जाते
मन के कोने में
दबे रह जाते
याद आते रहते
मन को विचलित
करते
हर बार नयी
आशाएं जगाते
उम्मीद में ज़िंदा
रखते
25-08-2011
1394-116-08-11