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शनिवार, 13 अगस्त 2011

बीस साल की कन्या ने हँसमुखजी को बुड्ढा कह दिया (हास्य कविता)

बीस साल की कन्या ने

हँसमुखजी को बुड्ढा

कह दिया
उनकी जवानी को

ललकार दिया

हँसमुखजी से बर्दाश्त

नहीं हुआ
उनका पारा चढ़ गया
बाहें चढाते हुए ,

पोपले मुंह से
लडकी को करारा

जवाब दिया
बुड्ढा होगा तेरा बाप
नादान लडकी तूं मुझे

पहचानती नहीं है
तेरे बाप के बाप को भी

मैंने स्कूल में पढ़ाया था
उसकी बरात में भी

गया था
निरंतर आधा पाँव दूध

रोज़ पीता हूँ
अपनी जवानी को

बरकरार रखता हूँ
फिर भी तूने मुझे

बुड्ढा कह दिया

13-08-2011

1358-80-08-11

कभी कभी तनहा रहना भी ज़रूरी


कभी कभी तनहा
रहना भी ज़रूरी अकेले में अश्क
बहाना भी ज़रूरी खुद से बात
करना भी ज़रूरी निरंतर
ज़ज्बात ज़ाहिर
करना भी ज़रूरी चलते चलते रुकना भी ज़रूरी आगे बढना भी
ज़रूरी
डा.राजेंद्र तेला,निरंतर 
शायरी,
13-08-2011
1355-77-08-11

हर ,शख्श व्यथा में डूबा हुआ

हर शख्श

व्यथा में डूबा हुआ
आँखों से आंसू

रोक नहीं पा रहा

परमात्मा से पूँछ रहा था
इंद्र किस जुर्म की

सज़ा दे रहा

धरती को सूखा रख रहा

पानी की एक बूँद

नहीं बरसा रहा

हर चेहरे पर

चिंता की लकीरें
हर पेट भूख के

डर से घबरा रहा
निरंतर

असमंसज में पडा हुआ
मंदिर से मस्जिद तक

दुआ कर रहा
आशा और विश्वाश

की परीक्षा ले रहा
जीने के लिए झूझ रहा

13-08-2011

1354-76-08-11

उसे भूल जाओ

कर के याद उसे

अपना दिल ना जलाओ

जो ना आ सका साथ

उसे भूल जाओ

लिखा ना था किस्मत में

साथ उसका

फैसला खुदा का समझ

उसे भूल जाओ

ना आवाज़ सुनेगा

ना लौट कर आयेगा

इस हकीकत को

समझ जाओ

निरंतर रोना छोड़ दो

रास्ता अब कोई और नहीं

पास तुम्हारे

अब उसे भूल जाओ

13-08-2011

1353-75-08-11