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शनिवार, 16 जुलाई 2011

आँखें समंदर से कम नहीं होती

आँखें समंदर से 
कम नहीं होती
सदा पानी से भरी
रहती
गम ,खुशी दोनों में
छलकती
बिन कहे हाल-ऐ-दिल
बतातीं
प्यास उनकी उनकी
कम ना होती
ना कभी तृप्त होती
नया ,पुराना,तलाशती
रहती
निरंतर मचलती
रहती
17-07-2011
1194-74-07-11

अब मिलने की रस्म निभाते हैं

गले मिल कर
रोने वाले
अब मिलने की रस्म
निभाते हैं
रकीबों से हँस हँस कर
 मिलते हैं
जले पर नमक
छिड़कते हैं
करीब आकर भी
चुपचाप निकल जाते
दर्द-ऐ-दिल बढाते हैं
निरंतर गरूर में
बहकते हैं
मोहब्बत को खेल
समझते हैं
(रकीब=दुश्मन ,Enemy)
16-07-2011
1193-73-07-11

निरंतर सोचता हूँ ,कब हथियार उठाऊँ मैं ?

मुल्क के नेता
लाशों पर सियासत
करते रहे
कुर्सी के खातिर
मजहब के नाम पर
हाथ पर हाथ धर कर
बैठे रहे
हम रोज़ अपनों को
खोते रहे
मासूम जान से हाथ
धोते रहे
वो जाम पर जाम
उड़ाते रहे
हम खून के घूँट
पीते रहे 
अब मुमकिन नहीं की
खामोशी से बैठ जाऊँ मैं
लोग मरते रहे
चुपचाप देखता जाऊँ  मैं
सीने में सुलग रही
आग को
कब तक दबाऊँ मैं ?
निरंतर सोचता हूँ
कब हथियार 
उठाऊँ मैं ?
क्या इनके जैसा 
बन जाऊँ मैं ?
काम हैवान का 
कर दूं मैं ?
खुदा का ख्याल 
आते ही
रुक जाता हूँ मैं

16-07-2011
1192-72-07-11

जीवन का अंतिम समय आ गया था

सांस लेने में 
कठिनायी हो रही थी
आँखें बार बार
बंद हो रही थी
दृष्टि मंद हो गयी थी 
जुबान काँप रही थी
मुख से अस्पष्ट स्वर
निकल रहे थे
हाथ उठाने का 
प्रयास करता
हाथ हिल कर रह जाता
पास खड़े लोगों को
पहचानने का प्रयत्न करता
विफल हो जाता 
मस्तिष्क पर जोर डालता
क्यों ऐसा हो रहा ?
समझ नहीं पाता 
चेहरा भावहीन
चिंतामुक्त था
शरीर जवाब दे रहा था
उसे पता नहीं था
जीवन का अंतिम समय
आ गया था
अपनों से बिछड़ने का
संसार से जाने का
समय हो गया था
डा,.राजेंद्र तेला,निरंतर
जीवन,मृत्यु 
16-07-2011
1191-73-07-11

भविष्य दर्शन


भविष्य दर्शन
========
नयी कलियाँ 
जन्म ले रही थी
नए फूल खिल रहे थे
पुराने मुरझा रहे थे
कभी आँखों के तारे थे
भंवरों को लुभाते थे
पंखुड़ियां गिरने लगी
बगीचे से विदाई 
निश्चित हो गयी
बगीचे में 
कुछ नहीं बदला
साथ रहने वाले पौधे
असहाय  देखते रहे
भविष्य का साक्षात 
दर्शन करते रहे
डा.राजेंद्र तेला,निरंतर
16-07-2011
1190-72-07-11

शुक्रवार, 15 जुलाई 2011

आस्था और विश्वाश से जीवन जीता हूँ

जीवन की
तीक्ष्ण परिस्थितियों
से थकता हूँ
निरंतर परमात्मा के
चरणों  में शीश
नवाता हूँ
एकाग्रचित्त नमन
करता हूँ
मन में शीतलता का
अनुभव करता हूँ
स्वयं को पहले से
व्यवस्थित पाता हूँ
पुन:कर्म में जुटता हूँ
सहजता से
स्थितियों से निपटता हूँ
आस्था और विश्वाश से
जीवन जीता हूँ 
15-07-2011
1189-72-07-11

अति कभी अच्छी नहीं होती

कोयल खुशी से
कूंक रही थी 
डाली डाली नाच रही थी 
महीनों की गर्मी के बाद
वर्षा से राहत मिली थी 
हरयाली की उम्मीद ने
आवाज़ में मिश्री घोल दी
वर्षा रुक नहीं रही
निरंतर बरसती रही
वृक्षों पर घोंसलों को
धरती पर घरों को
पानी से तहस नहस
करती रही
अति कभी अच्छी
नहीं होती
बेघर हो जाने के बाद 
कोयल को 
समझ आ गयी
डा.राजेंद्र तेला,निरंतर
15-07-2011
1188-71-07-11

पीया संग सब भूल गयी

ब्याह की
शहनायी बजी,
दुल्हन के मन में
हलचल बढी
पीया से मिलने की
उमंग जगी
चिंता भी सताने लगी
बाबुल का घर
सखियों का साथ 
छूटेगा
घर नया होगा,
जीवन का रंग
नया होगा
निरंतर पीहर की याद
सतायेगी
कैसे पार पायेगी ?
समझ नहीं पा रही थी
बारात
दरवाज़े पर आयी
मन की व्यथा अधूरी
रह गयी 
डोली विदा हुयी
पीया संग सब 
भूल गयी
15-07-2011
1187-70-07-11

आस्था

मूसलाधार वर्षा आये
खेतों में हरयाली छाये
सूखे खेत में खडा किसान
आशा से
निरंतर आकाश को
निहार रहा था
परमात्मा से प्रार्थना
कर रहा था
इस बार अवश्य सुनेगा
मन में विश्वाश था
फैसला जो भी होगा
सर झुका कर मानेगा
इस बार नहीं सुना
तो अगली बार सुनेगा
आस्था का सवाल था
परमात्मा में आस्था
उसका
जीवन आधार था
15-07-2011
1186-69-07-11

आँखों ने रोना ,दिल ने तडपना छोड़ दिया

आँखों ने रोना
दिल ने तडपना
छोड़ दिया
खूबसूरत चेहरों ने,
शोख अंदाज़ ने
लुभाना छोड़ दिया
अब हमने उम्मीद
करना छोड़ दिया
खुद पर
काबू कर लिया
चुप रहना,
हंस कर बर्दाश्त
करना सीख लिया
मर कर भी 
जीना सीख लिया
बिना किश्ती 
किनारा ढूंढ लिया
डा.राजेंद्र तेला,निरंतर
15-07-2011
1185-68-07-11

गुरुवार, 14 जुलाई 2011

आज फिर याद ताज़ा हुयी ,ज़ुल्म की कहानी याद आयी

एक सूरत याद आयी

दिल-ओ-दिमाग में 
झुरझुरी छायी
हर पुरानी बात 
याद आयी
कब और कहाँ ?
पहली बार मिली थी
वो तारीख 
वो जगह याद आयी
क्या उसने कहा ?
क्या मैंने कहा ?
हर बात याद आयी
दिल-ओ-जान एक
होते गए
निरंतर वादे पर वादे
करते रहे
मोहब्बत में खो गए
कैसे सपने टूटे ?
कैसे वो रूठ गए ?
हम रोते रह गए
ग़मों का बोझ सहते रहे
हर लम्हा 
उन्हें याद करते रहे
आज फिर याद
ताज़ा हुयी
ज़ुल्म की कहानी
याद आयी
डा.राजेंद्र तेला,निरंतर


14-07-2011
1184-67-07-11
 

कुत्ते और आदमी में फर्क

वो फटे पुराने कपडे 
पहने
चौराहे पर खडा था 
उसने मुझे रोका
दो दिन से 
भूखा प्यासा है
भावपूर्ण तरीके से
मुझे बताया
मैं उसकी बातों में
आया 
उसे घर लाया,खाना
खिलाया
रहने को कमरा
 करने को काम दिया
एक दिन चोरी कर
चम्पत हुआ
मैं माथा पीटता रहा
फिर एक दिन
कुत्ते के पिल्ले को
सड़क पर
लावारिस देखा
मुझे देखते ही उसने
पूंछ हिलायी
उसे भी घर लाया ,
पाल लिया
परिवार का हिस्सा
बनाया
रात भर चौकीदारी
करता
घर वाले को काटता
नहीं
बाहर वाले को छोड़ता
नहीं
मुझे देखते ही निरंतर
दुम हिलाता
प्यार से उसकी पीठ
सहलाता
पास से  जाना नहीं
चाहता
कहना भी पूरा मानता
कुत्ते और आदमी में 
फर्क बताता 
14-07-2011
1183-66-07-11

सज़ा-ऐ-मौत के अलावा इनका कोई इलाज नहीं

फैला रहे 
अन्धेरा मनों में
बढ़ा रहे 
नफरत दिलों में
मार रहे उनको
जिनसे 
रंजिश भी नहीं
दहशतगर्दों का कोई
धर्म ईमान नहीं है
शमशान को निरंतर
 लाशों से सज़ा रहे
बच्चों को अनाथ 
कर रहे
सुकून को दहशत में
बदल रहे
सज़ा-ऐ-मौत के
अलावा इनका
कोई इलाज नहीं 
14-07-2011
1182-65-07-11

किस के माथे पर चोर लिखा

किस के माथे पर
चोर लिखा
किस के माथे पर
साहूकार
जो दिखता चोर
साहूकार होता
खुद को साहूकार
कहने वाला
चोर निकलता
चेहरा
दिल का सच
किसी  चेहरे पर
लिखा नहीं होता
 फिर भी निरंतर
लोग चेहरों को
परख का पैमाना
बनाते
जाल में फसते
रहते
14-07-2011
1181-64-07-11

पैसा मिले ना मिले

पैसा मिले ना मिले
सपने दिखे ना दिखे
दिन भर की
मशक्कत के बाद
आराम चाहिए
ज़मीन पर आये या
गद्दे पर आये
खा कर आये
भूखे पेट आये 
कैसे भी मिले
ज़िन्दगी में सुकून
चाहिए
मुझे गहरी नींद
चाहिए
14-07-2011
1180-63-07-11

अन्धेरा

सूर्य की रोशनी 
निरंतर
चकाचोंध करती रही
हर रोशनी
उस के सामने फीकी
लगती रही 
रात कभी नहीं भायी
उम्र के साथ सम्हल
गया हूँ 
अब रात के अँधेरे की
शिकायत नहीं करता
मुझे पता है
दिन पर दिन
अन्धेरा बढेगा
एक दिन ऐसा आयेगा
जब मृत्यु से 
आलंगन करना होगा 
केवल अन्धेरा ही 
अन्धेरा होगा
डा,.राजेंद्र तेला,निरंतर
अँधेरा,जीवन,मृत्यु 
14-07-2011
1180-63-07-11

जीवन का मर्म

सुबह का सूरज
सब को भाता
ताज़ा धूप सब को
सुहाती
चंचल बचपन सी
लगती
दोपहर का सूरज
आग उगलता
देखना संभव ना होता
धूप की गर्मी बेहाल
 करती
शाम का सूरज
थका मांदा
असहाय दिखता 
नम्र धूप चुपचाप
रहती
सूरज की जीवन
सुबह प्रारम्भ होता
शाम ढले समाप्त होता
इंसान को निरंतर
जीवन का मर्म
समझाता
14-07-2011
1179-62-07-11

इक्कीसवीं सदी में जी रहे हैं

मकान
एक दूसरे से
सट गए
घर मिट गए
दिल दूर हो गए
पेड़ कम हो गए
बसेरे के लिए पक्षी
स्थान ढूंढ रहे हैं
फूलों  की खोज में
भँवरे व्याकुल उड़ रहे हैं
तितलियाँ उदास बैठी हैं
सीमेंट कंक्रीट के
जंगल बस गए
हम इक्कीसवीं
सदी में जी रहे हैं
डा.राजेंद्र तेला,निरंतर
14-07-2011
1178-61-07-11

बुधवार, 13 जुलाई 2011

टीवी और बीबी में ,ज्यादा फर्क नहीं होता(हास्य रचना )

टीवी और बीबी में ,ज्यादा फर्क नहीं होता(हास्य रचना ) 
मेरा दोस्त
हंसमुख बोला मुझसे
यार निरंतर
टीवी और बीबी में
ज्यादा फर्क नहीं होता
दोनों के बिना
आदमी का काम 
नहीं चलता
मैंने जवाब दिया
अरे  मूर्ख
काम तो वाकई नहीं
चल सकता 
पर टीवी को बंद किया
जा सकता
मन मर्जी चैनल देखा
जा सकता
एक्सचेंज में
नया टीवी लिया जा
सकता
बीबी का निरंतर
शिकायत वाला
चैनल ही होता
किसी हाल में
बंद नहीं करा जा 
सकता
हर आदमी
एक्सचेंज तो करना
चाहता
पर बदले में नयी बीबी
कोई नहीं देता
डा.राजेंद्र तेला,निरंतर 
13-07-2011
1177-60-07-11

दोनों की मजबूरी थी

घर में मौत हो गयी
दिलों में गमी छा गयी
पड़ोस में शादी की
शहनाई बज रही
इधर रोना धोना हो रहा 
उधर नाच गाना हो रहा
दोनों की मजबूरी थी
उनके लिए रोना ज़रूरी
इनके लिए गाना ज़रूरी
जिसकी शादी थी
वो खुशी से पागल थी
जिसकी मौत हुयी
वो खामोश लेटी थी
दोनों की मजबूरी थी
इधर तीसरे की बैठक
हो रही
उधर डोली सज़ रही
इधर बैठक उठी
उधर डोली उठी
दोनों तरफ आँखें
नम थी
दोनों की मजबूरी थी
13-07-2011
1176-59-07-11

कुछ बनना है,सोचता रहा

कुछ बनना है
सोचता रहा
समस्याओं से
भिड़ता रहा
काम में जुटा रहा
हवा भी ना लगी
कब जवानी को
पार किया
प्यार क्या होता ?
कैसे किया जाता ?
सवाल बना रहा
ज़िन्दगी की गुत्थियां
सुलझाता रहा
सुकून की
तलाश में निरंतर
भटकता रहा
बस किसी तरह
जीता रहा
13-07-2011
1175-58-07-11

मंगलवार, 12 जुलाई 2011

इंसान मर गए, नेपथ्य में चले गए

इंसान मर गए
नेपथ्य में चले गए
इंसानियत साथ
ले गए
आदमी बचे हैं
निरंतर
अपने अपने लिए
जी रहे हैं
दूसरे का किया
भुगत रहे हैं
एक दूसरे को
आश्चर्य से देख
रहे हैं
चुपचाप सह
रहे हैं
12-07-2011
1174-57-07-11

जब तक जीवन है,ज़िंदा हूँ

मेरे पास 
एक हृदय है
एक मन भी है
मैं भी व्यथित 
होता हूँ
रोता भी हूँ 
हँसता भी हूँ हूँ
कभी बहकता हूँ
प्रेम से सरोबार हूँ 
आखिर इंसान हूँ
पहाड़ जितना 
कठोर नहीं हूँ
किसी बात का 
असर नहीं हो
ऐसा संभव भी नहीं है
ना ही पत्थर जैसे 
भावना विहीन हूँ 
दिए की लौ सा
टिमटिमाता हूँ
कभी कांपता हूँ
जब तक जीवन है
ज़िंदा हूँ
डा.राजेंद्र तेला,निरंतर
12-07-2011
1173-56-07-11

क्या खुद को प्यासा ,जीवन को अधूरा समझूँ ?


जीवन का
पानी भरपूर पीया
फिर भी प्यासा रहा
कुछ कमी निरंतर
महसूस करता रहा
भौतिक सुख को
सफलता का
पैमाना समझता रहा
खुशी का
पड़ाव मानता रहा
वो भ्रम निकला
सूर्य की तपन से
भाप बन उड़ जाने वाली
ओस का सा
जीवन जीता रहा
कुछ समय खुशी और
संतुष्टी का
अहसास मिलता तो रहा
पर अहसास
टिक नहीं पाया
उम्र के जिस मोड़ पर
खडा हूँ
सब बेमानी लगता है
अब पता चल रहा है
सत्य से कितना दूर था
मन शांती चाहता है
शान्ति बिना जीवन भी
बिना महक के फूल सा
हो जाता
जो खिलता तो है मगर
मन को लुभाता नहीं
ऐसा जीवन
ना मन को
संतुष्ट रख पाता
ना जीवन की
प्यास बुझा पाता
समझ नहीं पाता हूँ
क्या जीवन को अधूरा
खुद को प्यासा समझूँ ?
या जैसे जीता रहा
वैसे ही असंतुष्ट जीता रहूँ
डा.राजेंद्र तेला,निरंतर
12-07-2011
1172-55-07-11

चेहरे पर चेहरा

तुम्हारे वो ख़त
सम्हाल कर रखे मैंने
जिनमें 
चाहत के नग्मे लिखे
हाल-ऐ-दिल बयाँ करा 
तुमने
ख़्वाबों के किस्से भरे
साथ मरने,
जीने के फलसफे लिखे 
उनमें अक्स 
तुम्हारा देखा मैंने
उन्हें पढ़ना खुदा की 
इबादत समझा
निरंतर 
सीने से लगा कर रखा
जाँ से भी ज्यादा 
कद्र करी उनकी  मैंने
फिर क्यों रुस्वां हो गए
क्यों दिल से निकाला 
मुझ को
कोई बहाना ना बनाना
खेल मोहब्बत का 
खेला तुमने
नहीं बख्शेगा खुदा 
तुमको
उसे भी पसंद नहीं
चेहरे पर चेहरा
बेवफायी का सिला
अब वो ही देगा 
तुमको
12-07-2011
1171-55-07-11