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शनिवार, 9 जुलाई 2011

कृष्ण और कंस का युग लौट आया

कृष्ण और कंस का
युग लौट आया
घर घर में
महाभारत हो रहा  
भांजा मामा को
मामा,भांजे को मारने
दौड़ रहा
बहन,भाई के लिए
 बद्दुआ कर रही
बेटे के हाथों उसकी मौत 
मांग रही
भाई,बहन को पुत्रविहीन 
करने को आतुर
अपनों को अपने मार रहे
निरंतर
खून के प्यासे हो रहे
मनों में जहर घुल गए
इर्ष्या,द्वेष से सब जी रहे
कुटिल चालें चल रहे
दिखाने को हंस रहे
09-07-2011
1161-45-07-11

दिल तुम्ही से लगाते हैं

उसने मुझे मोह लिया
दिल बेकाबू हुआ
खुद को ना रोक सका
हाथ पकड़ लिया
इजहारे -ऐ-मोहब्बत
करने लगा
उसका चेहरा तमतमा
गया
गुस्से से लाल हुआ
शर्म नहीं आती
खुले आम  हाथ
पकड़ते हो
इजहारे -ऐ-मोहब्बत
करते हो
मिलना ही है तो
निरंतर अकेले में मिलो
बातें दिल की करो
आखिर हम भी 
तुम्ही को चाहते हैं 
दिल तुम्ही से
लगाते हैं
09-07-2011
1160-44-07-11

जीवन शीशे से कम नहीं


जीवन 
शीशे से कम नहीं
कभी भी टूट कर 
बिखर सकता है 
अक्स दिखना भी 
बंद हो सकता है 
जब तक दिखता है 
कोई कद्र नहीं करता
ना कोई झाड़ता
ना कोई पौंछता
हक़ीक़त से बेखबर
बेफिक्र जीता है 
डा.राजेंद्र तेला,निरंतर 
ज़िंदगी,शीशा,अक्स,बेफिक्र  


 09-07-2011
1159-43-07-11

जैसे भी होगा जीते रहेंगे

हालात को मंज़ूर
कर लिया
अब रास्ता ये ही
चुन लिया
खामोशी से सब 
देखते रहेंगे
चुपचाप सहते रहेंगे
ना प्रतिरोध करेंगे
ना विरोध की बात 
करेंगे
दिए की मंद हुयी
रोशनी को
बुझने ना देंगे
कम में संतोष करेंगे
निरंतर हँसते रहेंगे
जैसे भी होगा जीते
रहेंगे
09-07-2011
1158-42-07-11

ये ना पूछना हफ्ते भर क्यों ना मिल सका था ?

ये ना पूछना
हफ्ते भर क्यों ना
मिल सका था ?
ये भी ना पूछना
कल किसके साथ था
आज का बताओ
कहा चलना है
होटल की मत कहना
कल तुम्हारी बहन के
साथ गया था
किसी मॉल का नाम
भी मत लेना
तुम्हारी सहेली ने
भारी बिल बनाया था
सिनेमा का भी मत
सोचना
तुम्हारी पड़ोसन के
साथ देखा था 
तुम ना बता सको
तो मैं बताता हूँ
निरंतर गुलछर्रे उड़ाते
थक गया हूँ
पैसे भी ख़त्म हो गए 
आज आराम करो
बात कल पर टालता हूँ
09-07-2011
1157-41-07-11

हकीकत का पता चल गया

निरंतर साथ हंसा ,
साथ खाया
कुछ वक़्त साथ बिताया 
मुस्काराकर चंद
बातें  करी
कुछ कामों में हाथ
बटाया
दोस्त का नाम दिया
दर्द का अहसास हुआ
देखा तो पीठ में छुरा
भौंका पाया
दोस्ती का सिला
मिल गया
हकीकत का पता
चल गया
09-07-2011
1156-40-07-11

गधा गुलकंद खा रहा है(काव्यात्मक लघु कथा)

ट्रेन में रिजर्वेशन नहीं मिला
घर लौटना ज़रूरी था
कुलियों से लेकर टी टी तक की
मनुहार करता रहा
ज़रूरी काम की दुहाई देता रहा
गधे को बाप बनाने में
गुरेज़ ना रहा
सब को नोट दिखाता रहा
रिश्वत देकर
सीट पाने की ख्वाइश करता रहा
सौ का नोट
इमानदार टी टी को दिखाया
डांट का जोरदार तमाचा खाया
सब को बेईमान समझता है
कह कर टी टी गुर्राया
जेल में बंद करवा दूंगा 
धमकी से हडकाया
पैसे का नशा काफूर हो गया
हाथ जोड़
कर माफी 
माँगता रहा
रहम खा कर टी टी ने
बिना पैसे के सीट दे कर 
उपकृत किया
दस बार उसे धन्यवाद दिया
गाडी खुद के शहर पहुँची
उतरते ही पैसे और घमंड का
हैवान लौट आया
गली का कुत्ता घर में शेर हो गया  
कुली को चिल्ला कर बुलाया
बाहर निकला
ड्राइवर नज़र नहीं आया
उल्लू का पट्ठा कह कर याद किया
उसके दिखते ही
गालियों की बौछार से
उसका स्वागत किया
कार में बैठते ही
खुद को महाराजा समझने लगा
फ़ोन पर ही दोस्तों पर रूतबा
गांठने लगा
एक मिनिट में रिजर्वेशन मिला
सब को डींगें मारता रहा
घर पहुंचा ,
नौकर ने दरवाज़ा खोलने में
थोड़ा समय लगाया
उसे माँ,बहन को याद कराया
सुन्दर पत्नी ने पूछ लिया,
ट्रेन जल्दी आ गयी
तुम तो खुश हो रही होगी
भगवान् से प्रार्थना कर रही होगी
लौट कर नहीं आऊँ
कह कर प्यार का इज़हार किया
छोटे बेटे ने पूछ लिया
पापा मेरे लिए क्या लाये
जवाब में गुर्राया
तेरा  सर लाया
आते ही दिमाग खा रहा है
पैदा तो हो गया
सब्र भगवान् के यहाँ छोड़ आया 
नौकर सब सुन रहा था 
मन ही मन मुस्करा रहा था
खुद से ही कह रहा था
भगवान् के यहाँ भी अंधेर है
कहावत का अर्थ
साफ़ साफ़ समझ
आ रहा है
08-07-2011
1155-39-07-11