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शनिवार, 25 जून 2011

मैं आँखों से पीता हूँ


लोग नशे के लिए 
शराब पीते हैं 
मुझे मोहब्बत में 
नशा आता है 
लोग जाम  
भर भर के पीते हैं 
मैं आँखों से पीता हूँ 
लोग सूरत से 
दिल लगाते हैं 
मैं दिल से दिल 
मिलाता हूँ 
लोग मोहब्बत 
ढूंढते रहते हैं 
मैं मोहब्बत में 
डूबा रहता हूँ 
लोग ज़िन्दगी में 
सुकून ढूंढते हैं 
मुझे मोहब्बत में  
सुकून मिलता है 
लोग चैन से मरना
 चाहते हैं 
मैं मोहब्बत में 
मरना चाहता हूँ
डा.राजेंद्र तेला,निरंतर,
मोहब्बत,शायरी 

25-06-2011

1099-126-06-11
 

मुझ को शक्ति दो प्रभु


मुझ को 
शक्ति दो प्रभु 
मन को 
निश्छल रख सकूँ 
जगत में 
प्रेम बाँट सकूँ 
ऐसा जीवन दो प्रभु 
देश सेवा कर सकूँ 
निशक्त को 
सहारा दे सकूँ 
ऐसा होंसला दो प्रभु 
मिलजुल कर रह सकूँ 
सबको सुख बाँट सकूँ 
ऐसी हिम्मत दो प्रभु 
हृदय को 
निर्मल रख सकूँ 
सत्य की 
राह पर चल सकूँ  
ऐसी इच्छा शक्ति 
दो प्रभु 
किसी से बैर ना 
रख सकूँ 
निरंतर प्रेम से 
रह सकूँ 
ऐसा जीवन दो प्रभु 
प्रभु भक्ति में 
लीन रहूँ 
जीना सार्थक 
कर सकूँ
ऐसी किस्मत 
दो प्रभु 
25-06-2011
1098-125-06-11

वो मंदिर भी जाता,मस्जिद भी जाता

वो मंदिर भी जाता
मस्जिद भी जाता
ईद दीपावली
बैसाखी  मनाता
रमजान में रोजे
पर्यूषण में उपवास रखता
क्रिसमस पर चर्च में
क्राइस्ट को याद करता
गुरुद्वारे में मत्था टेकता
निरंतर खुदा की
इबादत में डूबा रहता
कोई सिरफिरा
कोई पागल कहता
उसकी नज़रों में
खुदा हर रूप में
एक था
सर्वधर्म सम भाव
उसका सोच था
बेफिक्र जीता था
© डा.राजेंद्र तेला,निरंतर
25-06-2011
1097-124-06-11

शुक्रवार, 24 जून 2011

पहले देश भक्त नेता होते थे,अब नेता देश के दुश्मन होते हैं

हम तरक्की कर रहे हैं
निरंतर
तरक्की के नए आयाम
स्थापित कर रहे हैं
विकास शील देश से
विकसित देश में 
बदल रहे हैं
पहले क़त्ल रात में 
होते थे
अब दिन दहाड़े होते हैं
पहले बलात्कार
कभी कभास होते थे
अब खुले आम होते हैं
पहले गुंडों से 
बचने के लिए
पुलिस के पास 
जाते थे
अब दोनों से बचने 
के लिए
भगवान् से प्रार्थना 
करते हैं
पहले माँ बाप की 
इज्ज़त करते थे
अब माँ बाप 
इज्ज़त को तरसते हैं
पहले देश भक्त नेता
होते थे
अब नेता देश के दुश्मन
होते हैं
24-06-2011
1095-122-06-11

मैं ही सत्य हूँ ,मैं ही धर्म हूँ

सिर्फ मैं हूँ
मैं ही सत्य हूँ
मैं ही धर्म हूँ
मुझ से बड़ा
मुझसे समझदार
कोई नहीं
मैं ही सब कुछ हूँ
निरंतर
यही सोचते सोचते
यही कहते ,कहते
अहम् और मैं में
जीते जीते
वक़्त के साथ वे भी
दुनिया से चले गए
दफनाये गए
किसी ने
उनकी मज़ार के पास
एक बोर्ड पर
लिख कर टांग दिया
यही सत्य है
यही धर्म है
इंसान के बस में
कुछ भी नहीं
कोई कुछ भी कहे
उसका अंत
निश्चित है
24-06-2011
1094-121-06-11

बारिश आयी

बारिश आयी
खेत में बोये बीज जिसने
उसके चेहरे पर खुशी लायी
सर पर छप्पर नहीं
उसके चेहरे पर दुःख लायी
एक अच्छी फसल की
उम्मीद में खुश हुआ
दूजा जान माल जाने के
डर से परेशान हुआ
एक हंस रहा,एक रो रहा
निरंतर कोई खुश ना रहता
ना ही कोई रोता सदा
सुख,दुःख हिस्से जीवन के
हर हाल में जीना होता
 
विधि का विधान 
ऐसा ही होता 
24-06-2011 
1093-120-06-11

गुरुवार, 23 जून 2011

शब्द

शब्द निरंतर
दिमाग में उपजते 
उथल पुथल मचाते
मन में गूंजते
जुबान से बोले जाते
मुंह से निकलते
कानों से सुने जाते
आँखों से पढ़े जाते
वाक्यों में बदलते
कलम के जरिये
कागज़ पर बाहर आते
शब्द नहीं होते
तो इंसान 
इंसान नहीं
हाड मांस का
पुतला भर होता
शब्द ही है
जो कभी साथ नहीं
छोड़ते  
निशब्द में भी 
शब्द होता
अनुनय में,विनय में,
प्यार में,प्रार्थना में
दुविधा में,
क्रोध में,विरोध में,
दुःख में,सुख में,
निरंतर साथ निभाते 
 इंसान को इंसान से
जोड़ते भी तोड़ते भी
शब्द जीवन
में जान फूंकते
बिना शब्दों के इंसान
मृत सामान होते
23-06-2011
1092-119-06-11

अगर यादें ना होती

खट्टी मीठी  यादें
मन मष्तिष्क में भरी
कुछ हंसाती,
कुछ रुलाती
कुछ पीछे ले जाती
निरंतर 
मन को उद्वेलित
करती
कभी सहारा देती
कभी कमज़ोर करती
किसी के लिए अर्थी
तो किसी के लिए
फूलों की सेज होती 
इंसान के प्रति 
इंसान की भावनाएं 
दर्शाती
सोचता हूँ अगर 
यादें ना होती
तो मरने के बाद
इंसान की कद्र
    कैसे होती ?  
23-06-2011
1091-118-06-11