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शनिवार, 11 जून 2011

रो रो कर खुद से कहता हूँ,उसके बिना मैं तनहा हूँ

निरंतर
खुद से कहता हूँ
उसके बिना मैं तनहा हूँ ,
हर लम्हा बेचैन रहता हूँ
यादों का समंदर उफनता
उसके पास ले जाता
तन्हायी को मिटाता
कभी उसकी आवाज़ में
ग़ज़ल सुनायी देती
चुलबुली हंसी खनकती
बदन में गुदगुदी करती
कभी बालों में हाथ फिराती
एक पल भी चैन नहीं लेने देती
निरंतर इठलाती,इतराती
रोमांचित करती
ज़न्नत का अहसास कराती
कौन कहता है ?
मैं तनहा हूँ
जोर से चिल्लाता हूँ
यादों का तूफ़ान थमता है
होश में आता हूँ
मायूसी से घिरता हूँ
रो रो कर फिर से कहता हूँ
उसके बिना मैं तनहा हूँ
11-06-2011
1034-61-06-11

मन की खिड़की,दिल का दरवाज़ा खुला रखता हूँ

मन की खिड़की
दिल का दरवाज़ा खुला 
रखता हूँ 
निरंतर मेहमानों का 
इंतज़ार करता हूँ 
किस जात,किस रंग 
किस धर्म का होगा ?
सब्र नहीं खोता हूँ
कब आयेगा ?
नहीं सोचता हूँ 
दिल के सौदे में 
मोल भाव नहीं करता हूँ 
हर आने वाले का 
इस्तकबाल करता हूँ
दिल मिले तब तक 
रिश्ता रखता हूँ
ना मिले तो प्यार से 
विदा करता हूँ
ना मलाल करता 
ना रंज रखता हूँ 
नए मेहमान से
मिलने का अरमान
कभी ख़त्म नहीं होता
उम्मीद में
वक़्त गुजारता हूँ
11-06-2011
1033-60-06-11
डा.राजेंद्र तेला,निरंतर 

इश्क बड़ा ज़ालिम क़यामत बहुत ढहाए ?

इश्क बड़ा ज़ालिम
क़यामत बहुत ढहाए ?
ना हंसने,रोने दे
ना उठने ,बैठने दे 
नींद हर हाल में 
उडाये
ख़्वाबों की दुनिया में
गोते लगवाए
चेहरा हाल-ऐ-दिल
सारे जहाँ को बताये
आशिक को
  इंतज़ार माशूक का
कराये
बेचैनी को दोस्त 
बनाए 
निरंतर ज़िन्दगी और
मौत के बीच झुलाए
11-06-2011
1032-59-06-11

दुनिया की बद्दुआओ का डर था

दुनिया की
बद्दुआओ का डर था
लाख छुपाया
मगर छुप ना सका
दुनिया को
मालूम चलना था
निगाहों से
निगाहें मिलाना
कनखियों से
इक दूजे को देखना
निरंतर मुस्करा कर
बात करना
करीब होने का
बहाना ढूंढना
ज़माने को बताने को
काफी था
मोहब्बत का राज़
खुलना था   
10-06-2011
1030-57-06-11

शुक्रवार, 10 जून 2011

उन्हें भी सरूर था,मुझे भी सरूर था

ना उनका कसूर था
ना मेरा कसूर था
मेरे दिल 
उनके हुस्न का 
कसूर था 
ना मेरे बस में था
ना उनके बस में था
दोनों की आँखों का 
कसूर भी कम ना था
नज़र से नज़र का
मिलना ही काफी था
ख्यालों में आना
ख़्वाबों में देखना
मजबूरी था
मोहब्बत का नशा
कुछ ऐसा था
उन्हें भी सरूर था
मुझे भी सरूर था
डा.राजेंद्र तेला, निरंतर,
10-06-2011
1029-56-06-11

बहुत वीरान लगता है जहाँ


बहुत वीरान 
लगता है जहाँ
जहाँ तुम थी है 
अब सन्नाटा वहाँ
महफ़िल सूनी 
साज़ खामोश हैं 
फूल भी खुशबू से
महरूम हैं
 जश्न का माहौल
रहता था जहाँ
अब मातम का 
मंज़र है वहाँ
चेहरा ग़म में डूबा हुआ
आँखों से अश्क बहा रहा
तुमसे जुदा क्या हुआ ?
खुदा से यकीन उठ गया
दिल अब लगता नहीं यहाँ
ज़िंदा रहूँ या मर जाऊं
अब फर्क किसी को 
पड़ता कहाँ ?
बहुत वीरान 
लगता है जहाँ
डा.राजेंद्र तेला,निरंतर 
10-06-2011
1026-53-06-11 
डा.राजेंद्र तेला, निरंतर, 
मोहब्बत,जुदाई,खामोशी,यादें 

चाँद शरमा गया


छत पर खडी गोरी की
सुन्दरता  देख कर
तारों की ओढनी ओढ़े
चाँद शरमा गया
मन ही मन लजा गया
निरंतर सौन्दर्य का
पर्याय रहा
आज वर्चस्व टूट गया
गर्व चूर चूर हुआ
समझ नहीं आया
कहाँ जाए ?
कैसे ह्रदय को समझाए ?
मायूसी में बादलों के
पीछे मुंह छिपा लिया
10-06-2011
1025-52-06-11