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शनिवार, 4 जून 2011

आस अब सिर्फ उनकी रह गयी


मोहब्बत क्या हुयी

दिल की खलिश

बढ़ गयी

वक़्त की लम्बाई

बढ़ गयी

आँखों से नींद उड़ गयी

दिल-ओ-दिमाग में

सूरत सिर्फ उसकी

रह गयी

निरंतर खामोशी

हाहाकार में बदल गयी

आस अब सिर्फ उनकी 

रह गयी

04-06-2011

1000-27-06-11

तेरे बिना गुलशन वीरान हो गया

गम अब 
ज़िन्दगी में घर 
कर गया

तेरे बिना गुलशन
वीरान हो गया
दिल कुछ नहीं कहता,
जहन खामोश हो गया
जिस्म अब
ज़िंदा लाश हो गया
निरंतर सजती थी
महफिलें जहाँ
सन्नाटा अब वहाँ
आम हो गया
अश्क बहाना अब
आदत हो गया
 मोहब्बत के तराने
गूंजते थे जहाँ
मौत की रुदादें  अब
सुनायी देती वहाँ
ज़िन्दगी और मौत में
फर्क ख़त्म हो गया
तेरे बिना मैं अब
सिफ़र हो गया  
04-06-2011
997-24-06-11 
रूदादें = कहानियाँ ,कथाएँ,stories,
सिफ़र=शून्य,zero

आसमान से देखता रहूँगा,हर लम्हा साथ रहूँगा

मेरे मरने के बाद
ना मातम बनाना
ना अश्क बहाना 
किस्मत समझ
चुपचाप सहना
मेरी यादों के सहारे
जी लेना 
निरंतर मुस्काराते
रहना
ना समझना दूर हूँ
तुमसे
आसमान से देखता
रहूँगा
हर लम्हा साथ रहूँगा
निरंतर दुआ करता
रहूँगा
इंतज़ार तुम्हारा
करता रहूँगा
ज़न्नत में मिलूंगा
फिर ज़िन्दगी साथ
गुजारूँगा 
04-06-2011
996-23-06-11

शुक्रवार, 3 जून 2011

ख्वाइश पूरी हो जाए,ऐसी इबादत चाहिए

दिल को छू जाए
ऐसी अदा चाहिए
सब को लुभाए
ऐसी जुबान चाहिए
तीर सी दिल में 
उतर जाए
ऐसी निगाह चाहिए
रोते को हंसा दे
ऐसी मुस्कान चाहिए
निरंतर हंसता रहे
ऐसी सूरत चाहिए
दुश्मन को भी गले 
लगा ले
ऐसी फितरत चाहिए
ज़िन्दगी भर साथ निभाए
ऐसी मोहब्बत चाहिए
सबको अपना बना सके
ऐसी किस्मत चाहिए
ख्वाइश पूरी हो जाए
ऐसी इबादत चाहिए
 03-06-2011
994-21-06-11

दिल मिल जाए तो एक मुलाक़ात काफी है

निरंतर
मुलाकातों से
कुछ नहीं होता
दिल मिल जाए तो
एक मुलाक़ात 
काफी है
ना मिले तो
उम्र गुजर जाती है
सैकड़ों निगाहें भी
दिल को नहीं 
लुभाती हैं
इक निगाह भी 
तीर सी
दिल में उतर 
जाती है
अनजान को भी 
अपना
बना लेती है
03-06-2011
993-20-06-11

जिधर निगाह उठाता,मुझे खुदा नज़र आता

जिधर निगाह  उठाता हूँ 
उधर खुदा नज़र आता है 
मंदिर,मस्जिद 
गिरजे ,गुरुद्वारे में
पेड़ ,पहाड़ 
हँसते बच्चे मुस्काराते
बूढ़े बाबा में
मुझे खुदा दिखता है 
बहती हवाओं 
खूबसूरत फिजाओं 
कल कल बहते पानी में
खुदा दीदार कराता है 
चहकती चिड़िया,
महकते फूलों में 
खुदा का अहसास होता है 
चाँद सूरज टिमटिमाते तारे 
खुदा से तार्रुफ़ कराते हैं 
हँसते रोते चेहरों में
गले लगते लोगों में
मुझे खुदा नज़र आता हैं 
जिधर निगाह उठाता
मुझे खुदा नज़र आता है 
डा.राजेंद्र तेला,निरंतर
03-06-2011
991-18-06-11