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शनिवार, 28 मई 2011

कभी फिर हरा होऊँगा

घने  जंगल में
हरे पेड़ों के बीच
किसी निर्जीव पेड़ के
ठूंठ सा खडा हूँ
पक्षियों की
चहचहाहट  सुनता हूँ
उन्हें उड़ते देखता हूँ
खुद चुपचाप रहता हूँ
निरंतर
भाग्य समझ
अकेलापन सहता हूँ
कभी फिर हरा
होऊँगा
उम्मीद में रहता हूँ
डा.राजेंद्र तेला,निरंतर 

जीवन,आशा 
28-05-2011
947-154-05-11

अश्क

दिल के  दर्द
आँखों के ज़रिये
निरंतर
अश्क बन कर
बहते
दिल को दिलासा
मन
को सुकून देते
ग़मों को सहने की
हिम्मत
और ज़ज्बा देते
28-05-2011
946-153-05-11

शुक्रवार, 27 मई 2011

मगर तुम्हें कैसे बताऊँ?

मेरे मन में
तुम बसी
आँखों में सूरत,
दिल में
मूरत तुम्हारी बसी
लबों पे 
तुम्हारा नाम रहता
जुबां से सिर्फ
तुम्हारा नाम निकलता
जहन में सिर्फ 
ख्याल तुम्हारा रहता
सारे शहर को पता
 ख़्वाबों में 
सिर्फ तुम्हें देखता
मगर 
तुम्हें कैसे बताऊँ ?
दिन रात निरंतर
यही सोचता 
डा.राजेंद्र तेला,निरंतर 
27-05-2011
943-150-05-11

अच्छे दिन सुकून से गुजरते

अच्छे दिन
सुकून से गुजरते
बिना तकलीफ के
आगे बढ़ते
हँसते, गाते, खेलते,
गुजरते
फिसल कर गिर भी
जाएँ
बिना चोट के
हँसते हँसते उठ जाते
तेज़ हवा सा
उड़ते जाते
बिना रुके पानी सा
बहते रहते
गम भी होते
ज़िन्दगी में निरंतर
भूलते रहते
27-05-2011
941-148-05-11

गुरुवार, 26 मई 2011

कई मसलों से घिरी ज़िन्दगी में भी

कई मसलों से
घिरी ज़िन्दगी में भी 
बच्चे को हँसते देख
फूल को खिलते देख
तितली को उड़ते देख
मन को राहत मिलती है 
चिड़िया को चहचहाते  देख
दोस्त को आते देख
मन में खुशी होती है 
कर्णप्रिय संगीत सुनने से
सुन्दर तस्वीर देखने से
प्यार के दो शब्दों से
शान्ति मिलती  है 
ज़िन्दगी की ज़द्दोज़हद तो 
निरंतर चलती रहती है 
मगर छोटी छोटी खुशियों से
उम्मीद कायम रहती है 
होठों की मुस्कराहट
बनी रहती है 
ज़िन्दगी की तकलीफें
कम लगती हैं 
© डा.राजेंद्र तेला,निरंतर

26-05-2011
938-145-05-11
 

मन करता फिर से बच्चा बन जाऊं,माँ के पास ही रह जाऊं

जब भी
शहर से घर जाता हूँ
माँ से लिपट जाता हूँ
कौन बैठा है ?
कौन देख रहा है?
सब भूल जाता हूँ
बच्चे की तरह गोद में
मुंह छिपाता हूँ
माँ सर पर हाथ फिराती
आँखों से
आंसूं की बूँदें ढलकाती
कैसा है ?
मुझ से पूछती
बिलकुल ठीक हूँ
जवाब देता तो हूँ
मगर माँ आजकल
ऊंचा सुनती
सो अपनी धुन में
निरंतर
चिंता जताती रहती
कमजोर हो गया है
ठीक से खाया कर
जल्दी आया कर
शहर में क्या रखा है
मेरी छोड़
अपना ध्यान रखा कर
कह कर प्यार ऊँडेलती
अपने
हाथ से मेरे लिए
पसंद का भोजन बनाती
मन करता
फिर से  बच्चा बन
जाऊं
माँ के पास ही
रह जाऊं
26-05-2011
937-144-05-11