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शनिवार, 21 मई 2011

गलतफहमी


हमें जाना नहीं
पहचाना नहीं
फिर भी तोहमत
से नवाज़ा हमको
बेवफ़ाई का दाग
लगाया हम पर
हमने निरंतर बहन
समझा
तुमने आशिक समझ
ठुकराया हमको
अपनी गलतफहमी
की सज़ा दी दे दी
हमको
21-05-2011
E

भँवरा नहीं हूँ

  भँवरा  नहीं हूँ
कभी इस फूल पर
कभी उस फूल
पर बैठूं
फूल चाहे  मुरझाए
डाली चाहे टूट जाए
साथ ना छोडूंगा
निरंतर तेरे खातिर
जिया हूँ
तेरे खातिर मर
जाऊंगा
मरते दम तक वादा
निभाऊंगा 
21-05-2011
907-114-05-11

फिर चोट ना खाएँगे

चाहता  नहीं  वो 
लौट कर आएँ फिर से
आएँ भी तो मिले ना
हमसे
अब तन्हाई से
दोस्ती कर ली हमने
बहुत मुश्किल से
दिल को सम्हाला हमने
निरंतर बेवफाई देखी
 हमने
ज़ख्मों को हरा ना
होने देंगे
अकेले में रो लेंगे
फिर चोट ना खाएँगे
बिना अपनों के
जी लेंगे
21-05-2011
906-113-05-11

बेचैनी

सूरज के जाने
चाँद के
आने का वक़्त
हो रहा था
नर्म धूप ठंडी 
हवा में
उसके चेहरे की 
शबनम
आँखों से सीधे
दिल में 
उतर रही थी
वो बेखबर
पेड़ के सहारे 
निरंतर
अपने 
गेसूओं से खेल
रही थी 
वो आए बाहों में
भर ले
इंतज़ार में बेचैनी से
इधर उधर देख
रही थी
21-05-2011
905-112-05-11

वही नर्म लहजा

वही नर्म लहजा
वही मुस्कराकर
बात करना
हर बात पर
हाँ में हाँ मिलाना
तारीफ़ में कसीदे
पढ़ना
वो निरंतर ऐसे ही
करते थे
मीठी मीठी बातों से
अपना बनाते
मन भर जाता तो
छोड़ देते
लोग फंसते थे
कुछ अरसे बाद
रोते थे
किसी और को
फंसते देख
खुदा से दुआ
करते रहते थे  
21-05-2011
904-111-05-11

हवस की कोई उम्र नहीं होती

उस बूढ़े को आते देख
मन ही मन खुश हुयी
अस्सी की उम्र लगती थी 
सहारे  के लिए
हाथ में लकड़ी थी
बाल सफ़ेद,आँखों पर  
नज़र का चश्मा लगाए
धीरे धीरे चल रहा था 
उसे देख
खुद से कहने लगी
किसी और काम से
आया होगा ?
कुछ समय तो शांती से
बीतेगा
निरंतर हवस का
शिकार होने से
कुछ पल तो बचेगी
वो आया,
भूखे शेर सा टूट पडा
शरीर को नोचने लगा
उसे पता नहीं था
हवस की कोई उम्र
नहीं होती
हवस इंसान के जहन में
बसती
इंसान की फितरत
चेहरे से नहीं दिखती 
21-05-2011
903-110-05-11