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शनिवार, 14 मई 2011

हसरतों की नाकामी का डर सताने लगा

उनके इंतज़ार में निरंतर
सुबह से रात बैठा रहा
उनका दीदार ना हुआ 
चाँद भी गम में 
बादलों में छुप गया
तारों को अकेला 
छोड़ गया
आसमान खामोश है
सारा जहाँ अँधेरे में 
डूब गया
दिल की मायूसी में
इजाफा कर गया
हसरतों की नाकामी का 
डर सताने लगा
जहन ख्यालों से 
भर गया
मोहब्बत में तड़पने का
मतलब समझ 
आ गया  
14-05-2011
858-65-05-11

खुद को भूलता जाता

वो नदी
 मैं किनारा उसका
वो बहता पानी  मैं
बुलबुला उसका
उसकी धारा में बहता
रहता
हर वक़्त ख्याल उसका
रहता
खुद से  कटता जाता
उस में समाता जाता
निरंतर
उसकी मोहब्बत में
खुद को भूलता जाता
14-05-2011
857-64-05-11

अब गिद्द भी सफेदपोश हो गए

गिद्द बदल गए
पहले मरे जानवरों का
मांस खाते थे
हर गाँव के बाहर
मंडराते थे
आकाश की ऊंचाइयों से
नयी लाश को ताड़ लेते
अब ज़िंदा को भी नहीं
छोड़ते
 अब गिद्द कम दिखते
मुश्किल से पहचाने
जाते
निरंतर वेश बदल
कर रहते
किस पर नज़र है ?
पता नहीं चलने देते
चुपके से वार करते
अब गिद्द भी 
सफेदपोश हो गए
14-05-2011
855-62-05-11

अमलतास



जब भी
उदास होता हूँ
बगीचे में
पीले फूलों से लदे
अमलतास के पेड़ के
नीचे बैठ जाता हूँ
सुर्ख पीले फूल
मुझे बसंत की
याद दिलाते हैं
मन को खुश करते हैं
फूलों की भीनी महक
व्यथा कम करने में
सहायता करती है
ऊपर बैठे
चहचहाते पक्षी
अकेलेपन में
शोर भरते हैं
अमलतास का वृक्ष
मुझे किसी मित्र का
अहसास कराता है
उदासी में
सहारा देता है
डा.राजेंद्र तेला,निरंतर 
14-05-2011
854-61-05-11

शुक्रवार, 13 मई 2011

सत्य से मुंह कैसे छुपाऊँ ?


धैर्य कैसे रखें ?
खुश कैसे रहें ?
सदा  हँसते रहो
कभी निराश ना हो
जैसी बातें समझाते-कहते
सब मुझे ज्ञानी मानने लगे
मुझे कोई कष्ट नहीं
समझने लगे
उन्हें क्या पता
तकिये में मुंह छुपा कर
अकेले में मैं भी रोता हूँ
कब स्थिती सामान्य होगी ?
परमात्मा से पूछता हूँ
क्या कभी
हकीकत में हंसूंगा ?
निरंतर मैं भी सोचता हूँ
कभी कभी मैं भी
धैर्य खोता हूँ
13-05-2011
852-59-05-11

दिल से ज्यादा जिस्म की सोचता

खबर मिली
उसकी शादी तय हो गयी
चेहरा सफ़ेद पड़ गया
मुंह से आवाज़ नहीं निकली
मित्र को मन की व्यथा
समझ आयी
चिंता मत करो
कोई बेहतर जीवन में आयेगा
कह कर सांत्वना देने  लगा
उसे कैसे समझाता ?
दिल बार बार नहीं
लगाया जाता
इक बार जिसका होता
हो जाता
जो निरंतर नया मुकाम
तलाशता
वो मोहब्बत नहीं करता 
मोहब्बत का खेल खेलता
दिल से ज्यादा जिस्म की
सोचता      
13-05-2011
851-58-05-11

इस बार राम राज्य ज़रूर आएगा

चुनाव संपन्न हुआ
जो कुर्सी पर बैठा था
हार गया
जो बाहर था जीत गया
जनता ने फिर
सपना देखना प्राम्भ किया
सब बदल जाएगा
राम राज्य आ जाएगा
पांच साल बीत गए
हालात पहले से ज्यादा
बिगड़ गए
फिर चुनाव आये 
सब निरंतर चिल्लाने लगे
इन्होने कुछ नहीं किया 
इनको हटायेंगे,
 पुरानों को लायेंगे
नए चुनाव हुए
जो कुर्सी पर बैठे थे
हार गए
जो सत्ता से बाहर थे
जीत गए
जनता ने फिर सपना
देखना प्रारम्भ किया
इस बार राम राज्य
ज़रूर आएगा
पांच साल बीत गए .
हालात नहीं बदले
         सब फिर चिल्लाने लगे ....
13-05-2011
850-57-05-11