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शनिवार, 7 मई 2011

क्यों ना मैं ही पहल करूँ ?



कब तक हर तरफ फ़ैली
गंदगी देखूं ?
कब तक  भ्रष्टाचार के 
किस्से  सुनूं ?
कब तक मार काट की 
खबरें पढूं ?
क्यों किसी और का 
इंतज़ार करूँ ?
कोई और कर लेगा 
यह सोच कर बैठा रहूँ ?
सब की तरह चुपचाप
देखता रहूँ
क्यों ना मैं ही पहल
करूँ ?
कुछ गंदगी मैं भी साफ़
करूँ
भ्रष्टाचार से लड़ाई लडूँ
निरंतर
सोते हुओं को जगाऊँ
बढ़ रही नफरत को
कम करूँ
06-05-2011
818-25-05-11

E

शुक्रवार, 6 मई 2011

कब तक खुद को बेबस कहोगे ?


कब तक खुद को
बेबस कहते रहोगे  ?
माथा पकड़ कर
बैठे रहोगे  ?
चेहरे पर झूठी मुस्कान
चिपकाए रखोगे
अब उठो जाग जाओ
बैलों की तरह हांका है
तुमको
वस्तु सा व्यवहार
हुआ है तुमसे
तिरस्कृत होना छोड़ दो
इस्तेमाल होना बंद करो
अब प्रतीकार करो
अन्याय का विरोध करो
कुशासन से खुद को
मुक्त करो
भ्रष्टाचार को ख़त्म करो
हालात से
लड़ना आरम्भ करो
स्वाभिमान से जीना
प्रारम्भ करो
06-05-2011
817-24-05-11
डा.राजेंद्र तेला,निरंतर
भ्रष्टाचार,कुशासन 

मेरे चुप को मेरी कमजोरी ना समझना


मेरे चुप को 
मेरी कमजोरी ना 
समझना
मजबूरी में चुप 
रहता हूँ 
अपनों की बेवफाई
देख रहा हूँ 
दिल  के हाथों 
मजबूर हूँ 
चाहते हुए भी 
कुछ कह नहीं 
पाता हूँ
खून के अश्क 
बहाता हूँ 
फिर से 
बावफा हो जाएँ
उम्मीद में 
खामोश रहता हूँ
डा.राजेंद्र तेला,निरंतर 
06-05-2011
816-23-05-11

E

हास्य कविता -पानी होठों से लगने से पहले ही गिलास छलकता

बाल बिखरे हुए
आँखों में आंसू लिए
हंसमुख जी उदास बैठे थे
मैंने उदासी का कारण पूछा
तो बोले
कल शाम उनका पैगाम
आया था
मिलना चाहते हैं
बताया था
नये कपडे खरीदे,
बन ठन कर तैयार हुआ,
कपड़ों पर ईत्र लगाया ,
फूलों का गुलदस्ता लाया
उन्हें भेट देने को
तोहफा लाया
वो आये भी ,
दिल खोल कर मिले भी
मगर जाते जाते
अपनी शादी का न्योता
दे गए
मुझे धोखा दे गए
किसी और के हो गए
निरंतर
मेरे साथ ऐसा ही होता
पानी होठों से लगने से
पहले ही गिलास
छलकता
06-05-2011
815-22-05-11

गुरुवार, 5 मई 2011

सूरत कैसे दिखाऊँ उन्हें ?

सख्त नाराज़ था उनसे
लंबा अरसा बीत गया
ना ख़त भेजते
ना ख़त का जवाब देते
ना फ़ोन करते,ना फ़ोन उठाते
क्रोध में लिखना बंद किया
फ़ोन से नंबर हटा दिया
निरंतर उन्हें याद
फिर भी करता रहा
मन ही मन कोसत रहा
कभी खुदगर्ज़
कभी बेवफा कहता रहा
शर्म और ग्लानि से भर गया
जब अरसे बाद पता चला
दुर्घटना के शिकार हुए थे
अस्पताल में भरती थे  
महीनों कोमा में थे
होश में आते ही नाम
मेरा लिया
मिलने की ख्वाइश का
इज़हार किया
किस मुंह से मिलू ?
सूरत कैसे दिखाऊँ उन्हें ?
इस सोच में डूबा हूँ
05-05-2011
813-20-05-11

लेखक,कवी तारीफ़ की होड़ में फंसे

होड़ मची है
होड़ में जोड़ तोड़
मची है
कहीं अपने को बेहतर
बताने की
कहीं दूसरे को नीचा
दिखाने की
होड़ मची है
खिलाड़ी खेलते मैदान में
हिसाब किताब 
मैदान के
बाहर बराबर करते
कौन कितना
बेईमान हो सकता ?
नेता इस होड़ में जीते
कौन  ख़बरों को ज्यादा
सनसनीखेज बनाता ?
चैनल इस होड़ में रहते
लेखक,कवी 
तारीफ़ की होड़ में फंसे
खुद की कमीज़ साफ़
दूसरे की दागदार बताते
निरंतर धब्बे  ढूँढने में लगे हैं
मन व्यथित होता
जब होड़ का खेल देखता
खुद को
मैदान के बाहर पाता  
कहीं इस होड़ में ना
फँस जाऊं ?
इसलिए नादान खुद को
कहता
 05-05-2011
812-19-05-11

तुम उदास क्यों हो ?

लोगों पूछते हैं
तुम उदास क्यों हो ?
क्यों बोझिल से दिखते हो
हँसते हुए भी
रोते से लगते हो
कैसे कहूं?
उदास नहीं मजबूर हूँ
अपनों से बहुत दूर हूँ
जितना पास जाने की
कोशिश करता हूँ
उतना ही
खुद को दूर पाता हूँ
खुद का सहारा खुद हूँ
कहने को बहुत खुश हूँ
डा.राजेंद्र तेला,निरंतर
उदास,मज़बूर,शायरी
05-05-2011
811-18-05-11
E

किसी और को कसूरवार कैसे कहूं ?

मुंह मोड़ लिया
नज़रें फिरा ली
कल तक कसमें
खाते थे
दिल से चाहते हैं
निरंतर कहते थे
आज 
दिल-ऐ-दुश्मन हो गए  
अब किस पर
यकीन करूँ
जब दिल जिससे हारा
वो ही बेगाना हुआ  
किसी को कसूरवार 
कैसे कहूं
05-05-2011
810-17-05-11
E

नयी सुबह की उम्मीद तो रहती

नयी सुबह की
उम्मीद तो रहती
उस से पहले की
काली रात डराती
खामोशी मन में
कई ख्याल लाती
ख़्वाबों में सिर्फ
मुश्किलें नज़र आती
किसी तरह रात
गुजर जाए
सिर्फ एक ही दुआ
खुदा से होती 
हर आवाज़ से
नींद उडती
निरंतर सोते जागते
रात किसी तरह 
गुजरती 
सुबह कैसी होगी ?
चिंता सताती
क्या रोशनी 
ज़िन्दगी में 
आयेगी ?
अपनी 
चमक से उसे
नहलायेगी ?
मन में सवाल 
पैदा करती
ज़िन्दगी यूँ ही
चलती रहती  
 05-05-2011
809-16-05-11

बुधवार, 4 मई 2011

पगडंडियाँ


कभी
ऊपर,कभी नीचे
कभी दायें,कभी बायें
कटीली झाड़ियों और
पत्थरों के बीच
जीवन का अनुभव
कराती हैं 
चलती हैं पगडंडियाँ
कहीं गहरी खाई
मौत का डर बताती
हवा में झूमते
देवदार के लम्बे पेड़
चहचहाते पक्षी
निरंतर
खुशी से जीने का
सन्देश  देते
बिना थके चलने की
शक्ति देते
 पहाड़ों से अठखेलियाँ
 करते बादल
बिना हार माने
आगे बढ़ने की 
प्रेरणा देते
मन करता बिना
हार माने
जीवन की पगडंडी पर
चलता रहूँ
हिम्मत से अपनी
मंजिल पर पहुँच
जाऊं 
04-05-2011
808-15-05-11
E

हँसते हँसते जिबह कर गए

निरंतर
मोहब्बत की कसमें
खाते थे
क्या ऐसा हुआ
तुम्हारे मिजाज़ ही
बदल गए
बेरहमी से जुदा हो गए
हमें जीते जी मार गए
क्या गुनाह किया
ये तक ना बता गए
हसरतें पूरी होने से
पहले ही मिटा गए
हँसते हँसते
जिबह कर गए
04-05-2011
806-13-05-११
डा,राजेंद्र तेला,निरंतर