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शनिवार, 23 अप्रैल 2011

सब चुपचाप देख रहे


शहर बढ़ रहे
जंगल घट रहे
सीमेंट कंक्रीट
दिल के करीब हो गए
फूल पेड़ ख़त्म हो रहे
दरिन्दे खुश हो रहे
जानवर रो रहे
प्रक्रति के साथ
बेहूदा खेल हो रहे
इंसान घुट घुट कर
जी रहे
हवस के गुलाम
हो रहे
जुबान को ताले 
लग गए
सब चुपचाप 
प्रक्रति के साथ होते
बलात्कार को
खुली आँखों से 
देख रहे
ज़मीर सब के 
बिक गए
सब अपने में 
सिमट गए
23-04-2011
747-167-04-11

कैसे सीमाओं में बंध जाऊं ?

लोग चाहते 
मैं रुक जाऊं
निरंतर 
चलना बंद कर दूं
नया सोचना 
नया करना छोड़ दूं
अपने में
सिमट कर रह जाऊं
सीमाओं में बंध जाऊं
दुनिया के 
रेले में मिल जाऊं
मैं ठहरा बहता पानी
कैसे उनके जाल में
फँस जाऊं ?
मुझे बहना है
समुद्र में मिलना है
बादल बन
आकाश को छूना है
निरंतर नया करना है
कैसे सीमाओं में
बंध जाऊं ?
डा.राजेंद्र तेला,निरंतर
23-04-2011
746-166-04-11
E

चाहत

एक लम्हा भी नहीं
तुम्हारे 
पास हमारे लिए
हमारा सारा वक़्त है
सिर्फ तुम्हारे लिए
जितनी नफरत
तुम करते हम से
उतनी मोहब्बत
बढ़ती तुम से
हर बददुआ तुम्हारी
दुआ बन कर लगती
हम को
निरंतर चाहत हमारी
बढाती तुम्हारे लिए 
 23-04-2011
745-165-04-11

दिल-ऐ-सुकून

मुझे मालूम 
वक़्त नहीं मेरे लिए
तुम मिलोगे कभी
उम्मीद नहीं मुझे
छोटी सी इल्तजा
मेरी सुन लो
कभी कभी
याद कर लिया करो
तुमने याद किया
मुझे हिचकी से
पता चल जाएगा
इतना ही काफी है
निरंतर
 दिल-ऐ-सुकून
के लिए
23-04-2011
743-163-04-11
E

बदलनी है तो मेरी फितरत बदल

खुदा से इल्तज़ा है 
मुझे ना बदलना 
बदलनी है तो
मेरी फितरत बदल
नफरत को प्यार में
बदल
अन्दर पल रही
निराशा को बदल
मेरे ख्यालों को बदल
उन्हें उम्मीदों से भर 
चेहरे का नक्शा बदल
उसे हंसी 
मुस्कराहट से भर
निरंतर 
सब को खुश रख सकूं
जहन को  
ऐसे जज्बे से भर
 डा.राजेन्द्र तेला,निरंतर 

23-04-2011
742-162-04-11

अब इंतज़ार मैं भी मज़ा आता

अब इंतज़ार मैं भी
मज़ा आता
नींद से पीछा छूटा
ना किसी से बात करनी
ना किसी से मिलना
एक ही ख्याल होता
एक ही ख्वाब होता
अंजाम भी पता होता
वो अब नहीं आते
आज भी नहीं आयेंगे
फिर भी
दिल कहाँ मानता
निरंतर
इंतज़ार करता रहता
23-04-2011
741-161-04-11

कोशिश

कोशिश
कोशिश
तो बहुत की मैंने
ज़िन्दगी अकेले 
गुजार दूं
उनका अंदाज़ ही
कुछ ऐसा था
कि दिल दे बैठा
दिल तो दिया
खुद को भी भूल बैठा
ये भी ख्याल ना रहा
नज़रें
ज़माने की देख रहीं
बर्दाश्त
लोगों को ना हुआ
उनसे जुदा कर के
दम लिया
निरंतरअकेला रहना
 किस्मत में ना था
उनकी यादों को
साथ बाँध दिया
23-04-2011
740-160-04-11

पानी निरंतर बहता रहेगा

पानी तो पानी है
बहता रहेगा
रुकावट आने पर
रास्ता बनाता रहेगा
पत्थरों  से लडेगा
दीवारों को तोड़ेगा
नदी नालों से बह कर
समुद्र में मिलेगा
समुद्र से उड़ कर
बादल बनेगा
वर्षा बन कर
ज़मीं पर उतरेगा
ज़मीं  पर उतर
फिर से बहेगा
बहना उसका
कभी ना रुकेगा
पानी निरंतर बहता
रहेगा
23-04-2011
739-159-04-11

शुक्रवार, 22 अप्रैल 2011

लाहौल-विला-कुव्वत

मेरी बात
 पर वो कहने लगे
लाहौल-विला-कुव्वत
अमाँ क्या कह रहे हो ?
मुझे समझ नहीं आया
बोला लाहौल स्पिती
हिमाचल में है
जवाब आया,
हिमाचल में बर्फ गिरती है
मैं बोला बर्फ ठंडी होती है
जवाब आया
ठण्ड में सर्दी लगती है
वो बोले  सर्दी से  गर्मी अच्छी
उसमें आम मिलते हैं
मैंने कहा,आम को कौन पूंछता
सब ख़ास को पूछंते
वो बोले ,
कौन सा सवाल पूंछते ?
मैंने जवाब दिया
सवाल इम्तहान में होते
वो झल्ला गए, चिल्ला कर बोले
लाहौल-विला-कुव्वत
निरंतर बकवास कर रहे हो
मैंने जवाब दिया
आप को पहले भी बताया था
लाहौल स्पिति.....
आगे बोलने से पहले ही
वो बाल नोचने लगे
रुआंसे हो कर कहने लगे
लाहौल-विला-कुव्वत
दिमाग खराब कर दिया
अब चुप भी रहो
फिर हिमाचल में है बोले
तो कभी बात नहीं करूंगा
22-04-2011
738-158-04-11

उसकी महक पीछा ना छोडती

उसकी
महक पीछा ना
छोडती
सुबह-ओ-शाम मेरे
जहन में बसती
वो जग रही होगी
ख्याल से रातों को
नींद उडती
आइना देखता सूरत
उसकी दिखती
जज्ब मुझ में हो गयी
सूरत उसकी
वो नहीं रही 
रूह उसकी भटकती
निरंतर मेरे इर्द गिर्द
घूमती 
22-04-2011
736-156-04-11

हठती नहीं निगाहें ,सूरत से उनकी


हठती
नहीं निगाहें सूरत से
उनकी
कोई सूरत भाती नहीं
सिवाय उनकी
बिना कुछ कहे
बहुत कुछ कहती सूरत
उनकी
चुनिन्दा लफ्जों की ग़ज़ल
लगती
किसी साज़ का सुर
लगती
देखते ही सांसें तेज़ होती
निरंतर
 जहन में खलबली मचाती 
दिल को दूर से ही बुलाती  

       सूरत उनकी       
22-04-2011
733-155-04-11