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शनिवार, 16 अप्रैल 2011

कल की कल देखूंगा

अगर
रो रो कर जीना है
हर पल
कल की सोचना है
जो बीत गया
उसे याद कर के
ही जीना है
तो मुझे नहीं जीना
चाहे काँटों में रहूँ
लोगों के ताने सहूँ
कोई कुछ भी करे
कोई कुछ भी कहे
 हंस कर जीऊँगा
जो बीत गया
उसे जाने दूंगा
निरंतर आज की
सोचूंगा
जब तक जीऊँगा
हँस कर जीऊँगा
कल की कल देखूंगा
डा.राजेंद्र तेला,निरंतर
16-04-2011
688-112-04-11
E     

कब्रिस्तान

हर आने वाले का
आशियाना बसता यहाँ
हर रोज़
नया मेहमान आता यहाँ
खुशी से 

कोई नहीं आता यहाँ
हर शख्श
दिल में दर्द लिए आता यहाँ
सब के 
दर्द अलग अलग
कोई मोहब्बत का मारा
कोई बीमारी से परेशान
कोई ज़िन्दगी से थक गया
किसी को पता नहीं 

कैसे पहुंचा यहाँ
किसी का किसी से
कोई रिश्ता नहीं यहाँ
मिट्टी में दबा हर शख्श
सुकून से सोता यहाँ
16-04-2011
687-111-04-11
E

शुक्रवार, 15 अप्रैल 2011

उम्र क्या इसी तरह कटेगी ?


सुबह,शाम तुम्हें याद करता
वक़्त गुजारना मुश्किल होता 
दिन किसी तरह कट जाता
रात के ख्याल से डर लगता
कैसे कटेगी निरंतर सोचता
जाग कर ख़्वाबों को रोकता
रात भी किसी तरह गुजरती
सुबह फिर मुझे हैरान करेगी,
उम्र क्या इसी तरह कटेगी ?
15-04-2011
685-109-04-11
E

रजा दिल की बता देना

मेरी सूरत देख कर
क्यूं सांस तुम्हारी चढ़ती ?
क्या तुम्हारी
बेवफ़ाई उसे रोकती?
तुम्हारा दिल हकीकत
जानता
वो भी कुछ कहता होगा
सुकून से
कहाँ रहने देता होगा
फिर क्यों जिद पर अड़े हो
क्यूं नहीं
बात दिल की मानते
सामने गर कह ना सको
मिलो जब मुस्करा देना
रजा
दिल की बता देना 
15-04-2011
684-108-04-11
E

हमें शौक नहीं अश्क बहाने का

हमें शौक नहीं
अश्क बहाने का
करें तो भी तो क्या करें
जब भी उनका ज़िक्र होता
दिल यादों  से  भर जाता
माहौल गमगीन हो जाता
ग़मों का सैलाब आता है
कुछ जुबान के जरिए
नज़्मों गीतों बातों से
कुछ आँखों के जरिए
अश्क बन कर निकलता है
डा.राजेंद्र तेला,निरंतर 
15-04-2011
682-106-04-११
डा.राजेंद्र तेला,निरंतर 

निरंतर ख़त लिखता रहता उन्हें



 निरंतर
ख़त लिखता रहता उन्हें
जानता ,जवाब ना देंगे मुझे
वो बदल गए ,हम ना बदले
बस इतना ही बताना मुझे
ना मोहब्बत कम हुयी 
ना जज़्बात बदले
निरंतर अब भी ख़्वाबों  में
उन्हें देखता
कोई ख्याल उनके बिना
ना आता
वो वादे से चाहे मुकर जाएँ 
हम ना मुकरेंगे कभी
जब नाम दिल पर
लिख दिया उनका
कोई और
नाम ना लिखेंगे कभी  
15-04-2011
680-04-2011

बातें दिल लेने देने की करो

जिसने तुम्हें
खूबसूरत सूरत से
नवाज़ा
उसने ही मुझे
मोहब्बत से लबरेज़
दिल दिया
फिर निरंतर क्यूं इतराते
 इतना ?
जब मालिक एक है
फिर क्यों दूर रहते इतना
पता खुदा को
तुम्हारे सुलूक का चलेगा
उसे अच्छा ना लगेगा
उसके नाराज होने से
पहले
गरूर अपना कम करो
अब दूरी को कम करो
बातें दिल लेने देने
की करो  
15-04-2011
679-04-2011
E

मुस्कराकर बात करते रहे

हम बेखबर थे
पता नहीं उन्हें
क्या उनके लिए
हमारे दिल में
हम मुखालते में थे
वो हाल-ऐ-दिल
जानते
मालूम ना था
वो दिल कहीं और
लगाते
हम निरंतर उन्हें
माशूक समझते रहे
वो हमें भाई समझ
मुस्कराकर
बात करते रहे
15-04-2011
678-04-2011
E

दिन मौज के गुजर गए


दिन
मौज के गुजर गए
बहते
पानी से बह गए
याद उस वक़्त की
जब भी आती
मुझे पीछे लौटाती
मन को
ठंडक पहुंचाती
आँखें नम हो जाती
दिल चाहता फिर
वक़्त
पुराना आ जाए
रोना
मेरा रुक जाए
निरंतर मुझे हँसाए
हर पल
खुशी से जिलाए
15-04-2011
677-04-2011

अब आदत कैसे बदलेंगे हम ?


उनके
जुदा होने का गम नहीं
वो अब कभी आयेंगे नहीं
इंतज़ार
की आदत पड़ गयी
वो हैरान करेगी हमें
ख़्वाबों से
कैसे दूर रखेंगे उनको ?
ख्यालों से
 कैसे हटाएँगे उनको ?
निरंतर
आदत हमें उनकी पड़ गयी
अब आदत
कैसे बदलेंगे  हम ?
15-04-2011
676-109-04-11

उन्हें हमारा ख्याल तो आया

वो हमारी मौत पर
चुपके से घर आये
कुछ फूल ज़नाज़े पर
चढ़ाए
कुछ अश्क आँखों से
गिराए
दबे पैर चले गए
हम ऊपर से उन्हें
देखते रहे
उन्हें हमारा ख्याल तो
आया
निरंतर इस में ही खुश
होते रहे 
15-04-2011
675-108-04-11