Register To Recieve Latest Poems On Your Email or Mobile

Enter your email address:

Click Here To Subscribe On Mobile Bookmark and Share

शनिवार, 2 अप्रैल 2011

शोर मनों में,शोर दिलों में


रात के सन्नाटे में
सुलाने के लिए
माँ लोरी सुनाती
दिन के कोलाहल में
लाडलों को 
नींद कैसे आती ?
किसे चिंता 
नके जीवन की
सब सोचते अपनी 
अपनी 
शोर से बचपन 
शुरू होता
शोर में जीवन कटता
जहन में 
शोर भरा रहता
शांती का बसेरा 
नसीब ना होता  
शोर मनों में,
शोर दिलों में
 कहाँ अब 
कोई किसी को
समझता
प्यार शोर में दबा 
रहता
स्नेह शोर में छुप 
जाता
चैन इंसान निरंतर 
खोता
धन,आडम्बर के 
शोर में
सुकून खोता
02-04--11
586—19 -04-11

दोस्त ही दोस्त की बात समझता


किस्मत वालों को
अच्छा  दोस्त मिलता
दोस्त 
चुना जा सकता
रिश्तेदार
सौगात में मिलता
नहीं भाये
तो भी ढोना पड़ता
उम्र और लिंग से
भेद ना होता  
सारे राज़ दिल में
जज्ब रखता
मुश्किल वक़्त में
साथ निभाता
सोच समझ कर
सलाह देता
बिना दोस्त
दोस्त का मन ना
लगता
मिले बिना दिन
व्यर्थ लगता
दोस्त ही  दोस्त की
बात समझता
निरंतर यकीन सिर्फ
दोस्त पर रखता
02-04--11
583—16 -04-11

कौन साथ किसका निभाता ?


कौन साथ
किसका निभाता ?
साथ किस्मत से
छूटता
दिल नया साथ
ढूंढता
यादों के भंवर में
फिर किनारा
ढूंढता
नया साथ मिल 
भी जाए
पुराना कहाँ भूलता
लम्हा लम्हा लौटता
रहता
निरंतर ज़ख्मों को 
हरा करता रहता
02-04--11
582—15 -04-11

कैसे उनसे कहूं ?

कैसे उनसे कहूं ?
अब भूल जाएँ
सारी कसमें तोड़ दें
फिर कभी ना मिलें
दिल पर पत्थर रख लें
कुछ अश्क बहा लें
 नहीं लड़ सकते
दुनिया से अब
नहीं बच सकते
उसकी
बेदर्द नज़रों से अब
किस्मत का खेल 
समझ
उसका साथ निभाओ
जिसके साथ बंधे
हो तुम 
02-04--11
581—14 -04-11

पौधा मोहब्बत का ,बड़े अरमानों से लगाया



बड़े अरमानों से 
मोहब्बत का पौधा लगाया 
ज़ज्बातों से सींचा
दिल से उसका ख्याल रखा 
फिर भी उसे खो दिया
अब उन बहारों का 
क्या करूँ ?
जब मेरा लगाया 
पौधा मुरझा गया
दुनिया ने हंसी में उड़ाया
वहीँ नया पौधा लगाने 
पुराना भूल जाने का
मशविरा दिया 
मैं खुद गर्ज़ और बेदर्द नहीं 
कब्र पर
नया आशियाना बनाऊँ
वो जगह खाली छोड़ दी 
हसरतें उस में दफ़न कर दी
अब यादों के सहारे जीता हूँ 
उनमें ही सुकून ढूंढता हूँ 
02-04--11

साथी सफ़र के बदल गए ,मंजिल मगर बदली नहीं



साथी सफ़र के बदल गए
मंजिल मगर बदली नहीं
अरमान
मोहब्बत से जीने के बनाए
पूरे ना हुए
रास्ता मगर बदला नहीं
किश्ती
को किनारा ना मिला
मांझी मगर बदला नहीं
निरंतर
इबादत खुदा से करी,
हसरतें पूरी ना हुयी
खुदा मगर बदला नहीं 
  मोहब्बत मेरी फितरत थी
जवाब में नफरत मिली
फितरत मगर बदली नहीं
02-04--11
579—12 -04-11

शुक्रवार, 1 अप्रैल 2011

जीवन सफ़र में मील के पत्थर क्यूं नहीं होते?




जहन में
सदा से सवाल
उठता रहा है 
जीवन सफ़र में 
मील के पत्थर
क्यूं नहीं होते?
कितना चले ,
कितना चलना है
पता चलता रहता 
कितने अवरोध
पार किये
कितने पार करने 
याद रहता
कभी किसी को
पता ना होता
पार होंगे,ना होंगे
छोटे होंगे या बड़े होंगे
पता नहीं चलता  
क्यों मील के
पत्थर नहीं लगाए
जीवन सफ़र में
इश्वर ने मंतव्य
जाना होगा 
बेफिक्र ना चले कोई
निरंतर चौकन्ना रहे
जीवन सफ़र में 
सोच कर मील का 
पत्थर ना लगाया होगा
डा.राजेंद्र तेला,निरंतर
01-04--11

मैं हँसता रहा


दुनिया
ने नकारा कहा
मैं हँसता रहा
लोगों ने खुदगर्ज़ कहा
मैं हँसता रहा
माशूक ने बेवफा कहा
मैं हँसता रहा
गुरुओं ने मूर्ख कहा
मैं हंसता रहा
अपनों ने पराया कहा
मैं हँसता रहा
बेईमानों ने बेवकूफ कहा
मैं हँसता रहा
दोस्तों ने मुंह फट कहा
मैं हँसता रहा
वो थक गए
मैं हँसता रहा
मुझे ढीठ कहा
मैं हँसता रहा
लोगों ने कहना
बंद कर दिया
मैं हँसता रहा
जैसा हूँ,
मंज़ूर किया
निरंतर
उसूलों पर चलता रहा
चाहने वालों ने
फिर भी चाहा
कभी कुछ ना कहा
01-04--11
576—09-04-11
डा.राजेंद्र तेला,निरंतर 

दर्द के साथ जीना सीख लो,दर्द कम हो जाएगा

दर्द के साथ
जीना सीख लो
दर्द कम हो जाएगा
मोहब्बत से रहना
सीख लो
नफरत से नाता टूट
जाएगा
इच्छाओं पर
नियंत्रण करो
मन संतुष्ट हो
जाएगा
कर्म पथ पर
चलते रहो
सफलता का
मुख दिख जाएगा
निरंतर विश्वाश
खुद पर रखो
जीवन रंगों से भर
जाएगा
डा.राजेंद्र तेला,निरंतर 
01-04--11
575—08-04-11

ज़ल्दबाजी


धनलोलुप को
तिजोरी भरने की ज़ल्दी
नेताओं को
कुर्सी की ज़ल्दी
आशिक को माशूक से
मिलने की ज़ल्दी
बीमार को
ठीक होने की जल्दी
बच्चों को
युवा बनने की ज़ल्दी
युवा को
सपना पूरा करने की ज़ल्दी
हर शख्श
ज़ल्दी में नज़र आता
ज़ल्दबाजी में
गलत,सही भूल जाता
तरीका कोई भी अपनाता
निरंतर असंतुष्ट रहता
असंतुष्ट दुनिया से जाता

01-04--11
574—07-04-11

हँसते,हँसते ,धूल में मिलने दे



पहाड़ सी
हसरतें थी मेरी
धीरे धीरे टूटी गयीं
छोटे छोटे टुकड़ों में
ख़त्म होती गयीं
अब
बोझ दिल में बचा
नहीं कोई
दुआ रब से करता हूँ
जाते,
जाते तो सुकून से
रहने दे
हँसते हँसते
धूल में मिलने दे
01-04--11
573—06-04-11
डा.राजेंद्र तेला,निरंतर