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शनिवार, 19 मार्च 2011

आना ज़रूर,चाहे दर्द -ऐ-दिल बन कर आना





आना ज़रूर चाहे
दर्द -ऐ-दिल बन कर
आना
घर अपना हमारे दिल में
बनाना
आग नफरत की अन्दर ही
जलाना
ना सोने देना, ना जागने देना
चाहे दिन रात हमें रुलाना
खुश फिर भी रहेंगे
कम से कम नज़दीक तो
रहोगे
निरंतर लौटने का
इंतज़ार तो ना कराओगे
19-03-2011
 डा.राजेंद्र तेला"निरंतर",अजमेर
454—124-03-11

अपने को इक्कीसवीं सदी का ,सभ्य और पडा लिखा इन्सान कहते





करीब चालीस वर्ष बाद
मेरे पैदाइश के शहर में पहुंचा
मन वहाँ जाने के नाम से ही
रोमांच से भरा था
कहाँ कहाँ जाऊंगा,
किस किस से मिलूंगा
किस मशहूर दूकान पर
क्या खाना,सब मन में तय था
होटल से पहले ऑटो  वाले को
मेरे पुराने मोहल्ले चलने को कहा
जहां बचपन से कॉलेज तक
समय व्यतीत किया
नज़ारा बदला हुआ था
नए नए बंगलों से इलाका
भरा हुआ था
अंदाज़ से
पुराने घर के पास पहुंचा
एक सज्जन से मथुरा वाले
शर्माजी के घर का पता पूंछा
उन्होंने बिना बोले ही ना में
गर्दन हिलायी,
हाथ से आगे बढ़ने का
इशारा किया,
अगले घर में रहने वाले ने
उन्हें नहीं पता ,कह कर
कुछ और पूंछूं,उस से पहले ही
अन्दर का रास्ता लिया
दो तीन घर आगे
एक बंगले में गेट खोल
अन्दर घुसा ही था
एक साहब ने चिडचिडे
भाव से पूंछा
अन्दर क्यों आ रहे हो
बाहर से काम बताओ
अच्छा नहीं लगा
फिर भी वही सवाल
उनसे भी पूंछा
क्रोध में बोले
डोंट वेस्ट माई टाइम
कहीं और पूँछों
मैं गेट के बाहर निकला,
याद करने लगा
दादाजी बाहर बरामदे में बैठते थे
बीमार थे,दिन भर खांसते थे
हर आने जाने वाले से
राम श्याम करते थे
कोई भूले से अन्दर आ जाए
चाय पानी पूंछते थे
दो बात इधर उधर की भी करते थे
जाते समय फिर आना कहते थे
दादाजी की उम्र के लोग चले गए
साथ ही अनजान से भी प्यार से
बोलने की कला और अपनापन
भी ले गए
अपने पीछे थके,चिढचढ़े
चेहरे छोड़ गए
जो निरंतर अनजान इंसान से
किसी और गृह के प्राणी सा
व्यवहार करते
अपने को इक्कीसवीं सदी का
सभ्य और पडा लिखा 
इन्सान कहते
19-03-2011
डा.राजेंद्र तेला"निरंतर",अजमेर
453—123-03-11

हंसी ठिठोली हर किसी के बस की नहीं होती





मैंने सोचा 
होली पर कुछ
नया किया जाए
भेष बदल कर तमाशा
देखा जाए
नकली मूंछ ,ढाडी लगाईं
ग्रामीण परिवेश के कपडे पहने
जूतियाँ पहनी ,
पगड़ी बाँध,तमाशा देखने
घर से बाहर निकला
गेट पर पाला बाज़ार से
लौट रही पत्नी से पडा
आग उगलते हुए बोली,
किस से पूंछ घर में घुस रहे हो
खबरदार फिर नज़र आए तो
मन में मुस्कराया,
कितना बढ़िया भेष बनाया
पत्नी को भी मूर्ख बनाया
अपनी पीठ को खुद ने 
थपथपाया
कदम आगे बढाया
नज़र पड़ोसी थानेदार की पडी
छूटते ही भद्दी सी गाली
सुननी  पडी
टांगें तोड़ दूंगा,फिर अगर नज़र
तुझ पर पडी
पिटूं उस से पहले ही सर झुकाए
आगे बढ़ गया
बच्चे रंगों से खेल रहे थे
देखते ही जोर से चिल्लाये
होली का भाडू आया ,
रंगों की बौछार से मुझे नहलाया
किसी तरह पीछा छुडाया
तो गली का कुत्ता गुर्राया ,
मुझे अगले मोहल्ले तक दौडाया
रुक कर सांस लेने लगा ,
पता भी ना पडा कब
मोहल्ले के निठल्ले ने,
पीछे से पगड़ी को खींचा ,
मुश्किल से पगड़ी बचाई
थोड़ा और चला तो
हैण्ड पम्प पर पानी भर रही
महिलाओं से पाला पडा,
निठल्ला घूम रहा है,
काम भी किया कर
मुफ्त की रोटी मत तोड़ा कर
पांच रूपये देंगे,
बीस घड़े पानी से भर दे ,
निरंतर हो रहे हमलों से
घबरा गया
फौरन पगड़ी उतारी,
ढाडी मूंछ निकाली
घर की ओर दौड़ लगायी
आज पता चला ,
हर चमकने वाली चीज़
हीरा नहीं होती
हंसी ठिठोली हर किसी के
बस की नहीं होती
अब कभी तमाशा देखने की
इच्छा नहीं होती
19-03-2011
डा.राजेंद्र तेला"निरंतर",अजमेर
452—122-03-11

होली ज़रूर खेलो




होली ज़रूर खेलो
रंगों से नहीं तो
दिलों से खेलो
रंग चाहे ना डालो
गले ज़रूर मिलो
ना चाहो तो मीठा
ना खाओ
मीठा ज़रूर बोलो
मिलो ना मिलो बात
ज़रूर कर लो
होली को यादगार
बना लो
आपस के रंज
दूर कर लो
निरंतर प्यार का
रिश्ता जोड़ो
पानी बचा लो
गुलाल से खेलो
चाहे कुछ भी हो
होली ज़रूर खेलो
19-03-2011
डा.राजेंद्र तेला"निरंतर",अजमेर
451—121-03-11

शुक्रवार, 18 मार्च 2011

क्यों दिल कांच सा होता




क्यों दिल
कांच सा होता
इतनी
ज़ल्दी क्यूं टूटता
सूरत
अपने अन्दर बसाता
किसी का प्यार
किसी का  नफरत से
भरा होता
दिल किसी का पत्थर
किसी का फूल सा
कोमल होता
गम में दिल रोता
खुशी में बल्लियों
उछलता
निरंतर दिल चुप ना
रहता
कहीं ना कहीं लगता
रहता
19-03-2011
डा.राजेंद्र तेला"निरंतर",अजमेर
450—120-03-11