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शनिवार, 12 मार्च 2011

ना अब मिलना होता,ना बात कभी होती


ना अब
मिलना होता
ना कभी बात होती
दिल में अब भी बसी
निरंतर उनकी याद आती
जहन में 
जलजला मचाती 
बीते कल में लौटाती
हर लम्हा उनका हँसना 
मुस्कराना याद आता
मन  मिलने का करता
दिल गिला शिकवा 
भूलने को कहता 
ख़त लिखने के लिए 
कलम उठाता
यादों का सिलसिला 
टूट जाता 
तभी ख्याल आता
वो हमसफ़र किसी के 
हो चुके 
क्यूं निरंतर 
मैं यूँ ही बहकता
12—03-2011




जो बस में नहीं इनके,उसकी सज़ा इनको ना दो



417—87-03-11

इंसान की औलाद है
सब जन्मे
वैसे ही जन्म लिया
इश्वर ने
इन्हें अधूरा रख दिया
समाज ने
सदा मज़ाक उड़ाया 
हमने इन्हें
अपने से अलग समझा
सदा व्यवहार तिरस्कार
का करा
घर से दूर अपने जैसों के
साथ रहते
हर खुशी में घर पर आते
नाच गा कर नेक अपना लेते
जीवन अपना उसी से चलाते
 नवाब और राजा भी उन्हें
पालते
युद्ध के मैदान से
राज महल में सेवा देते
किन्नर या हिंजड़ा कहलाते
निरंतर
प्रार्थना परमात्मा से करता
अपनी संतान का तो
ख्याल करो
सम्मान और प्यार का
जीवन इन्हें दो
जो बस में नहीं इनके
उसकी सज़ा इनको ना दो
ना तिरस्कार कोई इनका करे
ना  कोई मज़ाक इनका उड़ाए
सदियाँ बीत गयी इनको सहते 
अब तो इन्हें नया मुकाम दो
आम आदमी का
नाम दे दो
12—03-2011
डा.राजेंद्र तेला"निरंतर",अजमेर

रोता रहूँगा जब तक माफी ना मांगूंगा ऊपर जा कर


416—86-03-11

कहीं दिख जाएँ दो बात हो जाएँ
वजह बेरुखी की मालूम हो जाए

निरंतर दुआ खुदा से करता
सारे शहर में उन्हें ढूंढता

मिलना तो दूर कोई पैगाम भी नहीं
कहाँ खो गए किसी को पता नहीं

हाल-ऐ-दिल ना पूछिए
जब पता
उनके दुनिया छोड़ने का चला

वो ख़त मिला जो हमें उन्होंने लिखा  

उनके ज़न्नत नशीं होने को हमने
बेरुखी समझा

हालात को अपने नज़रिए से देखा


निरंतर रोता हूँ अपनी नादानी पर

रोता रहूँगा
जब तक माफी ना मांगूंगा  
ऊपर जा कर

12—03-2011
डा.राजेंद्र तेला"निरंतर",अजमेर

इतने भी क्या रूठे सनम तुम हमसे



415—85-03-11
  इतने भी
क्या रूठे सनम तुम
हमसे
मिलना तो दूर
अब नाम भी नहीं लेते
हर जगह
बदनाम हमें करते
कोई भूले से
ज़िक्र हमारा कर दे
नफरत से उसे देखते
गुनाह
हमारे ऐसे तो ना थे
फिर क्यूं खार इतना खाते
निरंतर मुस्कराने वाले 
क्यों परेशाँ इतना होते
पता है 
 हमें दिल तुम्हारा  
अब भी हमें चाहता
कैसे कहो जुबां से 
मुंह इस लिए
तमतमाता
12—03-2011
डा.राजेंद्र तेला"निरंतर",अजमेर

कौन है,हसरतें जिसकी सारी पूरी होती

413—83-03-11


कौन है
हसरतें जिसकी सारी
पूरी होती
सब की कुछ ना कुछ
अधूरी रहती
कोई फिर भी निरंतर
हंसता रहता
कोई ज़िन्दगी भर
रोता रहता
निरंतर नयी हसरतें
पालता
दिन रात चिंता में
घुलता
ना ठीक से सोता
ना खुश हो जागता
ज़िन्दगी भर असंतुष्ट
रहता
असंतुष्ट दुनिया से
चले जाता
12—03-2011
डा.राजेंद्र तेला"निरंतर",अजमेर

गम-ऐ-मोहब्बत में,हाल-ऐ-दिल समझा गए



413—83-03-11

हसरत 
थी जिनकी दिल में  
वो ना मिले
मगर रस्में मोहब्बत की
सिखा गए
क्या होता है
बीमारे-ऐ-मोहब्बत को
सब अहसास करा गए
गम-ऐ-मोहब्बत में
हाल-ऐ-दिल समझा गए
हर फूल
निरंतर महकता नहीं
बता गए
12—03-2011
डा.राजेंद्र तेला"निरंतर",अजमेर





लाख रोको,दिल का लगना रुकता नहीं


412—82-03-11

लाख रोको
दिल का 
लगना रुकता नहीं
 कब लगेगा 
कोई जानता नहीं
किस से लगेगा, 
किसी को पता नहीं
क्यूं क़ानून, 
मोहब्बत के बनाते हैं लोग
 बार बार मोहब्बत ना 
करना बताते हैं लोग
कौन है 
दिल जिस का नहीं 
मचलता
  क्यूं फिर इंसान
हकीकत से भागता
निरंतर मोहब्बत में 
रोड़ा बनते हैं लोग
खुद की 
नाकामी का ठीकरा 
दूसरों पर फोड़ते हैं 
लोग
12—03-2011
डा.राजेंद्र तेला"निरंतर",अजमेर

शुक्रवार, 11 मार्च 2011

वो चाहते हैं,हम ये दावा नहीं करते


411—81-03-11



 वो चाहते हैं,हम ये दावा नहीं करते  
हर शख्श जानता,हम उन्हें चाहते

गैरों को यकीन हमारी मोहब्बत पर
उन के ख्याल का पता नहीं अब तक

निरंतर दिल-ओ.जान लुटाएँगे उन पर
ठुकराएं या कबूल करें फैसला उन पर

कबूलेंगे तो हसरत हमारी पूरी करेंगे

ठुकराएंगे  तो ग़मज़दा  हमें  करेंगे
हम तो हर हाल में उन्हें चाहते रहेंगे

सुबह-ओ-शाम नाम उनका लेते रहेंगे
जिएँगे जब तक दिल में उन्हें रखेंगे
11—03-2011
डा.राजेंद्र तेला"निरंतर",अजमेर

बहुत क़र्ज़ है,मुझ पर,कैसे उसे चुकाऊंगा


410—80-03-11

बहुत क़र्ज़ मुझ पर ,
कैसे चुकाऊंगा
माँ की ममता
पिता का प्यार 
कैसे लौटाऊँगा
पत्नी ने हर मोड़ पर
कंधे से कंधा मिलाया 
बच्चों ने पिता के 
कर्तव्य का
अर्थ समझाया
मित्रों ने 
सदा साथ निभाया
चाहा नहीं जिन्होंने,
उन्होंने प्यार का 
महत्व सिखाया
पड़ोसियों ने भाईचारे से
अवगत कराया 
भाई बहनों के स्नेह
गुरुजनों के मार्गदर्शन को
कैसे भूल पाऊंगा
जीवन में लिया ही लिया
दिया नगण्य 
निरंतर सोचता हूँ
क़र्ज़ चुकाए बिना 
दुनिया से कैसे जाऊंगा 
जाते जाते भी बोझ
साथ ले जाऊंगा
डा.राजेंद्र तेला,निरंतर  
11—03-2011
डा.राजेंद्र तेला"निरंतर",अजमेर

कोई सूरत अच्छी लगती तो होगी


409—79-03-11

कोई सूरत
अच्छी लगती तो होगी
किसी को
तुम्हारी भी भाती तो होगी
मिलने की
इच्छा होती तो होगी
दिल में
लहरें उठती तो होगी
लाख रोको ना रुकती होगी
ज़माने की
नज़रों से डरती तो होगी
ख़्वाबों में
मिलती तो होगी
निरंतर ख्यालों
में रहती तो होगी
कभी तो मुलाक़ात होगी
दिल की
लगी कभी तो बुझेगी
उम्मीद में
ज़िन्दगी कटती तो होगी
11—03-2011
डा.राजेंद्र तेला"निरंतर",अजमेर