Register To Recieve Latest Poems On Your Email or Mobile

Enter your email address:

Click Here To Subscribe On Mobile Bookmark and Share

शनिवार, 5 मार्च 2011

दिल उस का हो गया,जो उस में बस गया

362—32-03-11
दिल 
उस का हो गया
जो उस में बस गया
बदकिस्मती मेरी
वो जुदा मुझ से हुआ
खुदा ने वक़्त से पहले
उसे बुला लिया
मंझधार में मुझे
   छोड़ दिया    
दिल अब बहलता नहीं
करीब कितना भी कोई आए
अब मचलता नहीं
मन भी अब लगता नहीं
याद उसकी निरंतर सताती
ना सोने देती, ना जागने देती
दिल पर हाथ रखता हूँ
हर पल धड़कन को ढूंढता हूँ
दिल भी अब धड़कता नहीं
गम में कुछ कहता
नहीं 
05—03-2011
डा.राजेंद्र तेला"निरंतर",अजमेर

कहाँ तो सोचा था,एक आशियाना बनाऊंगा




कहाँ तो सोचा था
एक आशियाना बनाऊंगा
उसमें प्यार की 
दुनिया बसाऊंगा
हर लम्हा खुशी से 
जिऊंगा
वक़्त ने कैसा ये 
बदला लिया 
सब कुछ लूट लिया
हंसने की चाह में
रोना दे दिया 
कैसे मर मर कर 
ज़िंदा रहूँगा 
दिल टूट गया 
उम्मीदें लुट गयी 
क्या मौत भी लुट जाएगी?
आने से पहले 
क्या अश्क भी सुखाएगी?
उतना ही सतायेगी 
जितना 
ज़िन्दगी ने सताया है
मेरे ख़्वाबों के आशियाने को 
धूल में मिलाएगी 
 05—03-2011
E

वो दिन कभी ना भूलता हूँ

360—30-03-11
वो दिन नहीं भूल पाता 
जब एक बच्चे को
हट्टे कट्टे पड़ोसी से
पिटते देखा
गंदी गालियाँ खाते देखा
पेड़ से अमरुद तोड़ने की
सज़ा पाते देखा
इंसान को जानवर
बनते देखा
हैवान को धरती पर
शाक्षात देखा
बच्चे से अधिक
अमरुद का मोल देखा
बच्चे का पिटना याद आता
मन व्यथित हो जाता
कानों में उसका क्रंदन
पिघले सीसे सा लगता
क्यूं उसको
बचाने आगे ना बढ़ा?
क्यूं इतना
कायर हो गया था?
क्या हैवान का साथ
दे रहा था ?
सवाल सदा कचोटता
मुझको
अपराध बोध सताता
मुझको
खुद को माफ़ नहीं
कर पाता हूँ
मन ही मन रोता हूँ
क्या सज़ा अपने को दूं
कैसे प्रायश्चित करूँ
समझ नहीं पाता हूँ
वो दिन नहीं भूल पाता
 05—03-2011
E

मैं तो उन से मिलता हूँ,ख्यालों में उन्हें रखता हूँ


359—29-03-11 
कुछ नहीं
सीखा मैंने खुद से
सब कुछ सीखा लोगों से
कुछ अपनों ने सिखाया
कुछ सीखा परायों से
उम्मीद
जिनसे प्यार की थी
पीठ पर वार किया उन्होंने
डर कर जिनसे रहता था
प्यार मुझे दिया उन्होंने
जिन अनजानों को
जाना मैंने
अपना बनाया मुझे उन्होंने
जो जाने पहचाने थे
अनजान समझा मुझे
उन्होंने
अपने,परायों में उलझा हूँ
दोस्त,दुश्मन में फर्क नहीं
समझता हूँ  
दिल जिससे भी मिल
जाता है
उसे अपना समझता हूँ
दूर रहे या पास,
वो मिले या ना मिले
मैं तो उन से मिलता हूँ
ख्यालों में उन्हें रखता हूँ
निरंतर
   ख़्वाबों में देखता हूँ  
    05—03-2011
 डा.राजेंद्र तेला"निरंतर",अजमेर

ख्यालों में रहते हैं ,कभी जुबान से भी तो बताया करो




कभी याद
हमें भी किया करो
कभी कभी तो मिला
करो
हाल-ऐ-दिल सुनाया
करो
कभी कभी मुस्कराया
करो
कभी कभी रूठा
करो
कभी नखरे भी दिखाया
करो
मनाने पर मान जाया
करो
आँखों से आँखें मिलाया
करो
दिल को 
हमारे गुदगुदाया करो
निरंतर ख़्वाबों में हमें
देखा करो  
कभी अहसास भी
कराया करो
ख्यालों में रहते हैं
कभी जुबान से भी
बताया करो
05—03-2011
 डा.राजेंद्र तेला"निरंतर",अजमेर

सुर हर साज़ का बिखर गया,संगीत ज़िन्दगी का बेसुरा हुआ

357—27-03-11

तेरी महफ़िल से
क्या निकले
खानाबदोश हो गए
दिल तो टूटा ही
अरमान भी टूट गए
आशियाना तो छूटा ही
रास्ता तक भूल गए
कदम खुद-ब-खुद
बढ़ते थे जिधर
नज़रें भी अब
उठती नहीं उधर
हर शख्श हालत पर
 हंस रहा है
अंजाम-ऐ-इश्क
सब को दिख रहा है
चैन तो खोया ही
जीना भी
 मुश्किल हो गया
जहन ख्यालों से
भर गया
दिल अब ग़मों का
घर बन गया
तेरी महफ़िल से
क्या निकले
ज़िन्दगी का संगीत
बेसुरा हो गया
हर साज़ का
सुर बिखर गया

डा.राजेंद्र तेला,निरंतर
05—03-2011

कोई प्यासा ना रहे,निरंतर प्रार्थना परमात्मा से करता




356—26-03-11

बेघरबार,कृशकाय बूढा
लोगों की प्यास बुझाता
चार मटके ले
वृक्ष के नीचे बैठता
नित्य स्वच्छ पानी से
उन्हें भरता
वृक्ष के नीचे  बसेरा
उसका बसता
वहीँ सोता वहीँ जागता
जीवन
उसका वहीँ कटत़ा
कमजोर स्वास्थ्य
कर्तव्य से नहीं रोकता
सुबह से संध्या तक
राहगीरों की प्रतीक्षा करता
आशा से उन्हें देखता
मुस्करा कर बात करता
प्यासों की प्यास बुझाता
सेवा में जो  मिलता
उस से गुजारा करता
कभी भूखा
कभी आधे पेट रहता
रात भर सो ना पाता
प्रात:समय पर जागता
गिला शिकवा मन में
ना रखता
परमात्मा का
आदेश समझ खुश रहता
शिकायत कभी किसी से
ना करता
कोई प्यासा ना रहे
निरंतर प्रार्थना
परमात्मा से करता
एक दिन ऐसा आया
गहरी नींद में सोया
किसी ने ना उठाया
दिन बीत गया
साँय काल
प्यास ने राहगीर को
ध्यान उसका दिलाया
पास आ
उसने उसे उठाया
वो सदा के लिए सो
चुका था
वर्षों बाद गहरी नींद
सोया था
लोगों की प्यास
बुझाते बुझाते
खुद भूखा प्यासा
संसार से चला गया
खामोश रह कर भी
संतुष्टी का सन्देश
दे गया
05—03-2011
 डा.राजेंद्र तेला"निरंतर",अजमेर

शुक्रवार, 4 मार्च 2011

ये रिश्ता रूहानी है , कभी ना टूटेगा , ख्याल तुम्हारा हमेशा रहेगा

355—25-03-11

अब चुप्पी तोड़ दो
बात मन की बता दो
हाथ दिल पर रख लो
दो बात खुद से कर लो
कहने में दिक्कत हो
तो लिख कर दे दो
हमेशा चाहा है
चाहता रहूँगा
फैसला जो भी हो ,
खुशी से कबूलूंगा
मतलब 
कुछ भी निकालो
पाक रिश्ते को 
नाम कुछ भी दो
फर्क नहीं पड़ता
इश्क कभी जहन में
ना था
निरंतर इज्ज़त से
देखा
कुछ तो ऐसा था
दिल से दिल को
जिसने जोड़ा
ज़माना लाख चाहे
कोशिश कोई
कितनी  भी कर ले
ये रिश्ता रूहानी है
कभी ना टूटेगा
ख्याल तुम्हारा हमेशा
रहेगा
0403-2011
डा.राजेंद्र तेला"निरंतर",अजमेर

मेरे ख्यालों को पढने का इंतज़ार ,निरंतर करते तो होंगे


ख्यालों को पढने का
इंतज़ार निरंतर करते तो होंगे
ज़िक्र खुद का,
लकीरों में ढूंढते तो होंगे
कयास अपने लगाते तो होंगे
उनके ज़िक्र पर
,खुश होते तो होंगे
नहीं होता जब ज़िक्र उनका 
क्यों नहीं किया,सोचते तो होंगे
ग़मगीन फिर होते तो होंगे
मायूस दिन भर रहते तो होंगे
कल का,
इंतज़ार फिर करते तो होंगे
क्या आज लिखा,पढ़ते तो होंगे
ज़िक्र आज तो होगा,
सुकून दिल को मिलेगा
उम्मीद करते तो होंगे
04—03-2011
डा.राजेंद्र तेला"निरंतर",अजमेर