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शनिवार, 26 फ़रवरी 2011

मौसम शादी का आया,बैंडबाजा बजा ,दुल्हे राजा सजा


Ankleshwar
321—02-11
मौसम
शादी का आया
बैंडबाजा बजा
दुल्हे राजा सजा 
यार दोस्तों के साथ
नाचते गाते बारात 
दुल्हन को लेने चला
मन में उमंग
नया जीवन
प्रारम्भ करने चला
दुल्हन सजधज कर तैयार
कर रही इंतज़ार
बाबुल को छोड़
अब पीया संग ससुराल
जाना
सखियाँ गाए मंगलाचार
पिता स्वागत में व्यस्त
मन में चिंता थी व्याप्त 
दिल खुशी से भरा
फिर भी चेहरा उदास
बेटी के बिछड़ने का गम
नहीं लग रहा था मन
निरंतर खुश होने का भाव
चेहरे पर ला रहा
दुल्हे का बाप खुशी में
फूला ना समा रहा
मेहमानों की खातिर पूरी
थाली पकवानों से भरी
माहौल में हंसी खुशी
शादी संपन्न हुयी
जाजम उठी
गीत संगीत की महफ़िल
ख़त्म हुयी
कल फिर यही होगा
बैंड बाजा बजेगा
दुल्हे राजा सजेगा
एक और जोड़ा
विवाह बंधन में बंधेगा
जीवन का क्रम
यूँ ही चलेगा
26-02-2011
डा.राजेंद्र तेला"निरंतर",अजमेर

शुक्रवार, 25 फ़रवरी 2011

अंदाज़ उनका बड़ा निराला समझ ना सके,कोई दिल का मारा


Udaipur
320—02-11 
उनका बड़ा निराला
पानी से भरे
बादल सा होता
गरजता,
मगर कभी ना बरसता
समझ ना सकता
कोई दिल का मारा
रोज़ बात 
मिलने की करते
मिलने पर
लब ना खोलते
नाम पर आहें भरते
देखते तो 
नज़रें ना मिलाते
ना मरने देते,ना जीने देते
निरंतर यूँ ही सताते
 
24-02-2011
डा.राजेंद्र तेला"निरंतर",अजमेर

गुरुवार, 24 फ़रवरी 2011

आग इश्क की बुझेगी,या ख्यालों की किश्ती चलती रहेगी


319—02-11 

इक धड़कन
सीने में छुपा रखी है
हसरत दिल की दबा रखी है
उम्मीदों की
फेहरिश्त बना रखी है
ज़िन्दगी दाव पर लगा रखी है
कैसे मेरी चाहत की खबर
उन्हें होगी
कब हाल -ऐ-दिल समझेंगी
 उनकी रज़ा मिलेगी उठ रही लहेरें थमेंगी इश्क की आग बुझेगी
या ख्यालों की
किश्ती चलती रहेगी
किनारे से दूर रहेगी
ज़िन्दगी अकेले कटेगी
24-02-2011
डा.राजेंद्र तेला"निरंतर",अजमेर

निरंतर चल रही कलम को तोड़ देंगे, मेरी आवाज़ मुझ से छीन लेंगे


318—02-11 

देखता हूँ
सब मगर कुछ कहता नहीं
सहता हूँ
सब मगर बोलता नहीं
रोता हूँ
पर अश्क बहाता नहीं
इश्क करता हूँ
पर ज़ाहिर करता नहीं
जुबान को खामोश रखता हूँ
बात अपनी
कलम से कहता हूँ
ज़माने से डरता हूँ
लोग अफ़साना बनाएँगे
शहर में इश्तहार लगवाएंगे
खामोश सदा को
शोर में बदल देंगे
निरंतर चल रही कलम को
तोड़ देंगे
मेरी आवाज़ मुझ से
छीन लेंगे
24-02-2011
डा.राजेंद्र तेला"निरंतर",अजमेर

दामन मेरा दर्द से भरा,तेरे दर्द मुझे दे दे


317—02-11 
 
दामन 
मेरा दर्द से भरा
तेरे दर्द मुझे दे दे
कम से कम तूं तो 
सुकून से रह ले
तुझे आदत नहीं दर्द
सहने की
ग़मों से लड़ने की
मरहम मुझे लगाने दे
तेरे जख्मों को ठीक
करने दे
जो मुझे ना मिला
तुझे दे दूं
जो ज़माने ने किया
मेरे साथ 
तेरे साथ ना होने दूं
नफरत का सिला
मोहब्बत से दे दूं
निरंतर 
प्यार किया मैंने
अब प्यार करना
कैसे छोड़ दूं
24-02-2011
डा.राजेंद्र तेला"निरंतर",अजमेर

ना हम खफा थे,ना वो खफा थे

310—02-11


ना हम
खफा थे,ना वो खफा थे
ज़माने की 
नज़रों के मारे थे
साथ हँसते थे ,साथ गाते थे
ज़माने को बर्दाश्त ना थे
 उनके दिलों में तीर
चलते थे
जुदा करने की तमन्ना
मन में रखते थे
अब समझते हैं
कामयाब हो गए 
नहीं जानते
दिल के रिश्ते कभी
नहीं टूटते
दूर कितना भी रहे
मोहब्बत करने वाले
कभी अलग नहीं होते
इक दूजे के
ख्यालों में रहते
निरंतर ख़्वाबों में मिलते
ज़मीन पर ना मिल सके
तो ज़न्नत में मिलते
डा.राजेंद्र तेला"निरंतर",अजमेर
22-02-2011
E

क्या कशमकश तुम्हारे जहन में?क्या छुपा रखा अपने दिल में?

Udaipur
316—02-11
क्या कशमकश तुम्हारे
जहन में? 
क्या छुपा रखा अपने
दिल में?
क्या अटका बंद
लबों में?
क्यूं खुल कर बताते
नहीं?
हमराज़ किसी को
बनाते नहीं
चेहरा मुरझा गया,
नूर उसका कम हुआ
  लगता है , 
साजों में सुर नहीं 
आग में गर्मी नहीं
बेरंग लब्जों की नज़्म
हो गए  
निरंतर ख्यालों के
बोझ में दब गए
अब बोझ अपना
उतारो
गुबार दिल का
निकालो
लब्जों से नहीं तो
कलम से लिख दो
हमें हमराज़ अपना
बना लो
नूर चेहरे पर वापस
ला दो
मायूसी हमारी दूर
कर दो
24-02-2011
डा.राजेंद्र तेला"निरंतर",अजमेर

तुम सागर,मैं तल उसका,मैं भाप, तुम पानी हो

315—02-11

ना मैं आशिक हूँ
ना तुम माशूक हो
रूह में बसते हो
निरंतर साथ रहते हो
ना दिखते हो
ना बोलते हो
फिर भी
सब समझते हो
क्या कहता हूँ
सुनते हो
जो सोचता हूँ
जानते हो
मिलते नहीं
फिर भी मुझ में
ज़ज़्ब हो
तुम सागर
मैं तल उसका
मैं भाप
तो तुम पानी हो
तुम किश्ती
मैं मांझी उसका
तुम आकाश,
मैं चाँद हूँ  
मैं तुम
तुम मैं हो
24-02-2011
डा.राजेंद्र तेला"निरंतर",अजमेर
मोहब्बत,प्यार,रिश्ते,शायरी,


निरंतर बुलंदी पर कोई ना रहता


Udaipur
314—02-11

ना कोई आम होता
ना कोई ख़ास होता
आज अर्श पर तो 
कल फर्श पर होगा
आज रंक कल राजा
 होगा
कौन जानता कल
क्या होगा
क्यूं फिर इंसान
बहकता  
अर्श पर घमंड से
चूर होता
निरंतर बुलंदी पर
कोई ना रहता
हर इंसान का वक़्त
बदलता
खेल किस्मत का
चलता रहता
24-02-2011
अर्श =आसमान
डा.राजेंद्र तेला"निरंतर",अजमेर